दीध-निकाय

24. पाथिक-सुत्त (३।१)

१—सुनक्खत्तका बौद्धधर्म त्याग । २—अचेल कोरखत्तियकी मृत्यु । ३—अचेल

कोरमट्टककी सात प्रतिझायें । ४—अचेल पाथिक पुत्रकी पराजय ।

५— ईश्वर-निर्माणवादका खंडन । ६—शुभविमोक्ष ।

ऐसा मैने सुना—एक समय भगवान् मल्ल देशमे अनूपिया नामक मल्लोके निगममे विहार कर रहे थे ।

तब भगवानने पूर्वाहृ समय पहनकर, पात्र चीवर ले भिक्षाके लिये अनूपियामे प्रवेश किया । तब भगवानके मनमे यह हुआ—अनूपियामे भिक्षाटन करनेके लिये यह बहुत सबेरा है । क्यो न मै जहॉ भार्गव-गोत्र परिब्राजकका आराम है, और जहॉ भार्गव-गोत्र परिब्राजक है, वहॉ चलूँ ।

तब भगवानन् जहॉ ० भार्गवगोत्र परिब्राजक था वहॉ गये । भार्गवगोत्र परिब्राजकने भगवानसे कहा—“भन्ते । भगवान् पधारे, भगवानका स्वागत है, बहुत दिनोके बाद भगवानका दर्शन हुआ है । यह आसन बिछा है, भगवान् बैठे ।” भगवान् बिछे आसनपर बैठ गये । भार्गव-गोत्र परिब्राजक भी एक नीचा आसन लेकर एक ओर बैठ गया ।

१—सुनक्खत्तका बौद्धधर्म-त्याग

एक ओर बेठे हुए भार्गव-गोत्र परिब्राजकने भगवानसे यह कहा—“भन्ते । कुछ दिन हुए कि सुनक्खत्त लिच्छवि-पुत्र जहाँ मै था वहॉ आया । आकर मुझसे बोला—‘हे भार्गव । मैने भगवानको छोळ दिया, अब मै भगवानके धर्मको नही मानता ।’

“भन्ते । क्या जो सुनक्खत्त ० कहता है वह ठीक है ?”

“भार्गव । ० ठीक है । कुछ दिन हुए कि सुनक्खत्त ० जहॉ मै था वहॉ आया । आकर मेरा अभिवादन कर एक ओर बैठ गया । एक ओर बेठ सुनक्खत्त ० लिच्छविपुत्रने मुझसे यह कहा—‘भन्ते मै अब भगवानको छोळ देता हूँ, मै अब आपके धर्मको नही मानता ।’

“ऐसा कहनेपर मैने ० यह कहा—‘सुनक्खत्त । क्या मैने तुझसे कभी कहा था—सुनक्खत्त । आ, मेरे धर्मको स्वीकार कर ?’

‘नही भन्ते ।’

‘तुमने भी क्या मुझसे कहा था—‘भन्ते । मै भगवानके धर्मको स्वीकार करता हूँ ?’

‘नही भन्ते ।’

‘सुनक्खत्त । न तो मैने कहा—सुनक्खत्त । आ, मेरे धर्मको स्वीकार कर, और न तूने ही मुझसे कहा—भन्ते । मै भगवानके धर्मको स्वीकार करता हूँ । तब मूर्ख । तू किसको मानकर किसको छोळता है ? मूर्ख । देख यह तेरा ही अपराध है ।’

‘भन्ते । भगवान् मुझे अलौकिक ऋद्धिबल नही दिखाते ।’

‘सुनक्खत । क्या मैने तुझसे ऐसा कहा था―सुनक्खत । मेरे धर्मको स्वीकार कर, मै तुझे अलौकिक ऋद्धि-बल दिखाऊँगा ?’

‘नही, भन्ते ।’

‘तो क्या तूने मुझसे कभी ऐसा कहा था―मै भन्ते । आपके धर्मको मानता हूँ, आप मुझे अलौकिक ऋद्धि-बल दिखावे ?’ ‘नही, भन्ते ।’

‘सुनक्खत । न मैने ऐसा कहा ० और न तूने ऐसा कहा ० । तब, मूर्ख । किसका होकर तू किसको छोळता है ?’

“सुनक्खत । तब क्या तू समझता है―मेरे अलौकिक ऋद्धि-बलके दिखानेसे या न भी दिखाने से

दुखोके बिलकुल क्षयके लिये उपदिष्ट मेरा धर्म पूरा होगा ?’

“भन्ते । आपके अलौकिक ऋद्धि-बलके दिखाने या न दिखानेसे भी ० पूरा होगा ।’

‘सुनक्खत । जब मेरे ० पूरा नही होगा तब मै क्यो ० ऋद्धि-बल दिखलाऊँ ? मूर्ख । देख, यह

तेरा ही अपराध है ।’

‘भन्ते । भगवान् मुझे लोगोमे आगे करके उपदेश नही देते ।’

‘क्या सुनक्खत्त । मैने ऐसा कहा था―सुनक्खत्त । आ ० ।’

‘नही, भन्ते ।’

‘सुनक्खत । मैने भी ऐसा नही कहा ० और तूने भी ऐसा नही कहा ० । तब मूर्ख । तू किसका होकर किसको छोळता है ? क्या तू समझता है, सुनक्खत्त । लोगोमे आगे करके उपदेश देनेसे भी न देनेसे भी दुखोके बिलकुल क्षयके लिये उपदिष्ट मेरा धर्म पूरा होगा ?’

‘भन्ते । ० पूरा हो ।’

‘सुनक्खत । ० जब पूरा हो जाता है तो लोगोमे आगे करके उपदेश देनेका क्या अर्थ ? मूर्ख । देख, यह तेरा ही अपराघ है । सुनक्खत्त । तूने बज्जी ग्राममे अनके प्रकारसे मेरी प्रशंसा की थी―वे भगवान् अर्हत् सम्यक् सबुद्ध ०१ है । ‘सुनक्खत । इस तरह तूने बज्जी ग्राममे मेरी प्रशंसा अनके प्रकारसे की थी । ० धर्मकी प्रशसा की थी―भगवानका धर्म स्वाख्यात, ०१ है । सुनक्खत्त । इस तरह ० धर्मकी प्रशसा ० की थी । ० सघकी ०―भगवानका श्रावक-सघ सुप्रतिपन्न ०१ । सुनक्खत्त । इस तरह ० सघकी प्रशसा ० की थी ।

‘सुनक्खत्त । तुम्हे कहता हूँ―लोग तुम्हे ही दोष देगे―सुनक्खत लिच्छविपुत्र श्रमण गौतमके शासनमे ० ब्रह्मचर्य पालन करनेमे असमर्थ रहा । वह असमर्थ हो, शिक्षाको छोळ, गृहस्थ बन गया । सुनक्खत्त । इस तरह लोग तुम्हे ही दोष देगे ।’

“भार्गव मेरे इस प्रकार कहनेपर सुनक्खत्त ० लिच्छविपुत्र आपायिक=नैरयिक (=नारकीय) के ऐसा इस धर्म-विनयसे चला गया ।

२―अचेल कोरखत्तियकी मृत्यु

“भार्गव । एक समय मै थुलू देशमे उत्तरका नामवाले थुलुओके कस्बेमे विहार कर रहा था । भार्गव। मै पूर्वाह्ह समय पहनकर पात्र चीवर ले सुनक्खत ० लिच्छविपुत्रको साथ ले उत्तरकामे भिक्षा-

टनके लिये गया । उस समय अचेल कोरखत्तिय कुक्कुर-व्रतिक (कुत्तेके जैसा) दोनो घुटनो और हाथोके बल बैठा, जमीनपर फेके हुए अन्नको मुँहसे खा और चबा रहा था ।

“भार्गव । सुनक्खत्त लिच्छबिपुत्रने उस कुक्कुरव्रतिक अचेल कोरखत्तियको ० खाते और चबाते देखा । देखकर उसके मनमे यह आया—‘यह बळा पहुँचा हुआ अर्हत् श्रमण है, जो दोनो घुटने और हाथोके बल ० खा और चबा रहा है ।

“भार्गव । तब मैने सुनक्खत्त लिच्छविपुत्रके चित्तको चित्तसे जान उससे कहा—‘मूर्ख । क्या तू भी अपनेको शाक्य-पुत्रीय श्रमण समझेगा ॽ’

‘भन्ते । भगवानने ऐसा क्यो कहा—मूर्ख । क्या तू भी ० ॽ’

‘सुनक्खत्त । इस ० अचेल कोरखत्तिय ०को खाते चबाते देखकर तेरे मनमे क्या यह नही आया—यह बळा ० अर्हत् श्रमण है ॽ’

‘हाँ, भन्ते । भगवान् दूसरेके अर्हत् होनेसे क्यो डाह करते है ।’

‘मूर्ख । मै उसके अर्हत् होनेसे डाह नही करता । किन्तु जो तेरी यह बुरी धारणा (=पापदृष्टि) उत्पन्न हुई है, उसे छोळ दे, जिसमे कि तेरा भविष्य अहित और दुखके लिये न हो । सुनक्खत्त । जिस अचेल कोरखत्तियको तू समझ रहा है—यह ० अर्हत् श्रमण है ०, वह आजसे सातवे दिन अलसक रोगसे मरकर कालकञ्जिका नामक निकृष्ट असुर-योनिमे उत्पन्न होगा । मर जानेपर लोग उसे वीरणत्थम्भक नामक श्मशानमे छोळ देगे । यदि चाहे तो सुनक्खत्त । अचेल कोरखत्तियके पास जाकर पूछ—आवुस अचेल । अपनी गति तुम्हे मालूम है ॽ सुनक्खत्त । यह बात है जिसे वह ० बतलावेगा—आबुस सुनक्खत । मै अपनी गति जानता हूँ । कालकञ्जिका नामक असुर ० होऊँगा ।’

“भार्गव । तब सुनक्खत्त लिच्छविपुत्र जहाँ अचेल कोरखत्तिय था वहाँ गया । ० बोला—आवुस कोरखत्तिय । श्रमण गौतम कहते है—अचेल कोरखत्तिय आजसे सातवें दिन ० । ० श्मशानमे छोळ देगे । अत, आवुस ० । तुम बहुत हिसाबसे खाओ और पीओ, जिससे श्रमण गौतमका कहना झूठा हो जावे ।

“भार्गव । तब सुनक्खत्त लिच्छविपुत्र तथागतमे अविश्वास करके एक दो दिन करके सात दिन गिनने लगा । भार्गव । तब सातवें दिन अचेल ० अलसक रोगसे मर गया ० लोग उसे ० श्मशानमे छोळ आये । भार्गव । तब सुनक्खत लिच्छविपुत्रने सुना—अचेल कोरखत्तिय मर गया है ०, लोग उसे ० श्मशानमे छोळ आये है । भार्गव । तब सुनक्खत लिच्छविपुत्र जहाँ ० श्मशानमे अचेल कोरखत्तिय था, वहॉ गया । जाकर अचेल कोरखत्तियको उसने तीन बार थपथपाया—आबुस कोरखत्तिय । अपनी गति जानते हो ॽ’

“भार्गव । तब अचेल कोरखत्तिय पीठ पीछते हुए उठ खळा हुआ—‘आवुस ० । मैं अपनी गति जानता हूँ । कालकञ्जिका नामक निकृष्ट असुर-योनिमे उत्पन्न हुआ हूँ ।’ इतना कहकर वही चित्त गिर गया ।

“भार्गव । तब सुनक्खत लिच्छविपुत्र जहाँ मैं था, वहाँ आया । आकर मेरा अभिवादनकर एक ओर बैठ गया । भार्गव । एक ओर बैठे सुनक्खत लिच्छविपुत्रसे मैंने कहा—‘सुनक्खत्त । तो क्या समझता है—जैसा मैंने अचेल कोरखत्तियके विषयमे कहा था, वैसा ही हुआ या दूसरा ॽ’

‘भन्ते । भगवानने ० जैसा कहा था वैसा ही हुआ, दूसरा नही ।’

‘सुनक्खत्त । तो तू क्या समझता है—ऐसा होनेपर यह अलौकिक ऋद्धि-बल हुआ या नही ॽ’

‘भन्ते । ऐसा होनेपर ० ऋद्धि-बल हुआ, ‘नही नही’ हुआ ।’

‘मूर्ख । इस तरह मेरे ० ऋद्धि-बल दिखानेपर भी तू कैसे कहता है—भन्ते । भगवान् मुझे ० ऋद्धि-बल नही दिखाते है ? मूर्ख । देख, यह, तेरा ही अपराघ है ।’

“भार्गव । मेरे ऐसा कहनेपर भी सुनक्खत्त लिच्छविपुत्र, अपायिक—नारकीयकी भाँति इस धर्मसे चला गया ।

३—अचेल कोरमट्टककी सात प्रतिज्ञायें

“भार्गव । एक समय मै वैशालीके पास महावनकी कूटागारशालामे विहार करता था । उस समय अचेल कोरमट्टक वज्जियोके ग्राम वैशालीके बळे लाभ और बळे यशको प्राप्त हो निवास करता था । उसने सात व्रत ग्रहण किये थे—(१) जीवन भर नंगा रहूँगा, वस्त्र-धारण नही करुँगा, (२) जीवन भर ब्रह्मचारी रहूँगा, मैथुन-धर्मका सेवन नही करूँगा, (३) जीवन भर मास खाकर और सुरा पीकर ही रहूँगा, भात दाल नही खऊँगा, (४) वैशालीमे पूरबकी ओर उदयन नामक चैत्यके आगे न जाऊँगा, (५) ० दक्षिणमे गोतमक नामक चैत्य ० । (६) ० पश्चिममे सप्ताम्रक नामक चैत्य ० । (७) ० उत्तरमे बहुपुत्रक नामक चेत्यके आगे न जाऊँगा । वह इन सात व्रतोको लेनेके कारण वज्जियोके ग्रममे बळे लाभ और यशको प्राप्त था ।

“भार्गव । तब सुनक्खत्त लिच्छविपुत्र जहॉ अचेल कोरमट्टक था, वहॉ गया । जाकर उसने अचेल कोरमट्टकसे कुछ प्रश्न पूछे । उन प्रशनोके पूछे जानेपर अचेल कोरमट्टक उत्तर न दे सका । उत्तर न वह क्रोध, द्वेष और असंतोष प्रगट करने लगा ।

“भार्गव । तब सुनक्खत्त लिच्छविपुत्रके मनमे यह आया—ऐसे पहुँचे हुए अर्हत् श्रमणको मैने चिटा दिया, कही मेरा भविष्य अहित और दुखके लिये न हो ।

“भार्गव । तब सुनक्खत्त लिच्छविपुत्र जहॉ मे था वहॉ आया । आकर मुझे अभिवादन करके एक ओर बैठ गया । एक ओर बैठे सुनक्खत्त लिच्छविपुत्रको मैने कहा —‘मूर्ख’ क्या तू भी अपने को शाक्यपुत्रीय श्रमण कहेगा ?’ ‘भन्ते । भगवानने ऐसा क्यो कहा ० ?’

‘सुनक्खत्त । क्या तूने अचेल कोरमट्टकके पास जाकर प्रश्न नही पूछे ० । वह प्रकट करने लगा तब तेरे मनमे यह आया—ऐसे पहुँचे ० मेरा भविष्य अहित और दुखके लिये न हो ।’

‘हॉ भन्ते ’ । ० क्यो डाह करते है ?’

‘मूर्ख । मै ० डाह नही करता । किन्तु जो तुझे यह बुरी धारणा उत्पन्न हुई हे, उसे छोळ दे । जिसमे कि तेरा भविष्य अहित और दुखके न हो । सुनक्खत्त । जिस अचेल कोरमट्टकको तू ऐसा समझता है—पहुँचा हुआ ० वह शीघ्र ही कपळे पहन, स्त्रीके साथ, दाल भात खाते, वैशालीके सभी चैत्योको पारकर अपने सारे यशको खो विचरते हुए मर जायेगा ।’

“भार्गव । तब कुछ ही दिनोके बाद अचेल कोरमट्टक ० विचरते हुए मर गया । सुनक्खत्त लिच्छवि-पुत्रने सुना —‘अचेल कोरमट्टक ० विचरते हुए मर गया ।’

“भार्गव । तब सुनक्खत्त लिच्छविपुत्र जहॉ मे था वहॉ आया ० एक ओर बैठ गया । एक ओर बैठे सुनक्खत्त लुच्छविपुत्रको मैने कहा—सुनक्खत्त । तो क्या समझता है, जैसा मैने अचेल कोरमट्टकके विषयमे कहा था, वैसा ही उसका फल हुआ या दूसरा ?

‘भन्ते । भगवानने जैसा कहा था, वैसा ही उसका फल हुआ, दूसरा नही ।’

‘सुनक्खत्त । ० ऋद्धि-बल हुआ या नही ?’ ‘भन्ते । ० ऋद्धि-बल हुआ ० ।’

‘मूर्ख । इस तरह मेरे ० ऋद्धि-बल दिखानेपर भी तू कैसे कहता है—भन्ते । भगवान मुझे ०

ऋद्धि-बल नही दिखाते है ॽ मूर्ख । देख यह तेरा ही अपराध है ।’

“भार्गव । मेरे ऐसा कहनेपर भी सुनखत्त ० चला गया ।

४—अचेल प्राथिक-पुत्रकी पराजय

“भार्गव । एक समय मैं वही वैशालीके महावनकी कूटागारशालामे विहार करता था । उस समय अचेल पाथिक-पुत्र बळे लाभ और बळे यशको प्राप्तकर वज्जियोके ग्राम वैशालीमे वास करता था । वह वैशालीमे सभाओके बीच ऐसा कहा करता था—श्रमण गौतम ज्ञानवादी है, मैं भी ज्ञानवादी हूँ । ज्ञानवादीको ज्ञानवादीके साथ अलौकिक ऋद्धि-बल दिखाना चाहिये । श्रमण गौतम आधा मार्ग आवे और मैं भी आधा मार्ग जाऊँ । हम दोनो वहॉ मिलकर अलौकिक ऋद्धि-बल दिखावे । यदि श्रमण गोतम एक ऋद्धि-बल दिखायेंगे तो में दो दिखाऊँगा, यदि श्रमण गौतम दो ० तो मैं चार, यदि ० चार ० तो मैं आठ ० । इस तरह श्रमण गौतम जितना ० दिखलायेंगे, मैं उसका दूना दिखलाऊँगा ।

“भार्गव । तब सुनक्खत्त लिच्छविपुत्र जहॉ मैं था वहॉ आया । ० बैठ गया । एक ओर बैठे ० कहा—‘भन्ते अचेल पाथिकपुत्र ० ऐसा कहता है ० । इस तरह श्रमण गौतम जितना ० उसका मैं दूना ० ।’

“भार्गव । ऐसा कहनेपर मैंने सुनक्खत्त ० से यह कहा—‘सुनक्खत्त । अचेल पाथिकपुत्रका ऐसा कहना अनुचित है, यदि वह इस बातको बिना छोळे, इस चित्तको बिना छोळे, इस दृष्टिको बिना छोळे ० मेरे सामने आये । यदि उसके मनमे ऐसा भी हो—मैं उस बातको बिना छोळे ० श्रमण गौतम के निकट चलूँ, तो उसका शिर भी फट जायेगा ।’

‘भन्ते । भगवान् रहने दे इस वचनको, सुगत रहने दे इस वचनको ।’

‘सुनक्खत्त । तूने मुझसे ऐसा क्यो कहा—भन्ते । भगवान् रहने दे ० ॽ’

‘भन्ते । भगवानने तो पक्की तौरसे कह दिया—अचेल पाथिकपुत्रका ऐसा कहना अनुचित है ० शिर भी फट जायेगा । भन्ते । यदि अचेल पाथिकपुत्र विरूप वेशमे भगवानके सामने आ जाये तो यह भगवानकी बात झूठ हो जायेगी ।’

‘सुनक्खत्त । तथागत क्या ऐसी बात बोलते है जो अन्यथा हो ॽ’

‘भन्ते । क्या भगवानने अचेल पाथिकपुत्रके चित्तको अपने चित्तसे जान लिया है—अचेल पाथिकपुत्रका ऐसा कहना अनुचित है ० ॽ या किसी देवताने भगवानसे यह कह दिया है—अचेल पाथिकपुत्रका ऐसा कहना ० ॽ

‘सुनक्खत्त । मैंने अपने चित्तसे उसके चित्तको जान लिया है—अचेल पाथिकपुत्रका ऐसा कहना ० ।’ और देवताओने भी मुझे कहा है—अचेल पाथिकपुत्रका ऐसा कहना ० । अजितनामक लिच्छवियोका सेनापति अभी अभी मरकर त्रायस्त्रिश लोकमे उत्पन्न हुआ है । उसने भी मेरे पास आकर कहा है—भन्ते । अचेल पाथिकपुत्र निर्लज्ज है, झूठा है । अचेल पाथिकपुत्रका ऐसा कहना ० । सुनक्खत्त । मैंने अपने चित्तसे भी जान लिया है—अचेल पाथिकपुत्र का ऐसा कहना ० । देवताने भी ० । सुनक्खत्त । कल मैं वैशालीमे भिक्षाटनसे लौट, भोजनोपरान्त दिनके विहारके लिये जहाँ अचेल पाथिकपुत्रका आराम है, वहाँ चलूँगा । सुनक्खत्त । जो तू चाहता है सो कर ।’

“भार्गव । तब मैं पूर्वाहृ समय पहनकर ० जहाँ अचेल पाथिकपुत्रका आराम था, वहाँ गया ।

“भार्गव । तब सुनक्खत्त घबळाया हुआ सा वैशालीमे प्रविष्ट हो, जहाँ बळे बळे लिच्छवी थे वहाँ गया । जाकर ० बोला—‘यह भगवान् वैशालीमे भिक्षाटनके बाद दिनके विहारके लिये जहाँ अचेल पाथिकपुत्रका आराम है, वहाँ गये हुए है । आप लोग चले—पहुँचे हुए श्रमण अलौकिक ऋद्धि-बल दिखायेंगे ।’

‘हाँ । हम लोग चलेगे ।’

“(फिर वह) ‘जहाँ बळे बळे ब्राह्मणमहाशाल, धनी वैशय, नाना प्रकार के साधु, श्रमण और ब्राह्मण थे वहॉ गया । जाकर ० बोला—ये भगवान् ० जहाँ अचेल०का आराम ०।० चले । ० ऋद्धि-बल दिखायेगे ।’

‘हाँ, हम लोग चलेगे ।’

“भार्गव । तब बळे बळे लिच्छवि, बळे बळे ब्राह्मण महाशाल, ० जहाँ अचेल पाथिकपुत्रका आराम था, वहॉ पहुँचे । कई सौ और कई हजारोका जमघट हो गया ।

“भार्गव । तब अचेल पाथिकपुत्रने सुना—बळे बळे लिच्छवी० बळे बळे ब्राह्मण० आये हुए है । श्रमण गौतम मेरे आराममे दिनके विहारके लिये बैठे है । सुनकर उसे भय, कप, और रोमाञ्च होने लगे । भार्गव । तब अचेल पाथकपुत्र भयभीत, सविग्न, और रोमाञ्चित हो जहाँ तिन्दुकखाणु (नामक) परिब्राजकोका आराम था, वहाँ चला गया ।

“भार्गव । उस सभाने यह सुना—अचेल पाथिकपुत्र भयभीत हो ० चला गया है । भार्गव । तब उस सभाने किसी पुरूषसे कहा—जहॉ ० परिब्राजको का आराम है और जहॉ अचेल पाथिकपुत्र है वहाँ जाओ । जाकर ० यह कहो—पाथिकपुत्र । चले, बळे बळे लिच्छवी ० आये हुए है, और श्रमण गौतम भी आयुष्यमानके आराममे दिनके विहारके लिये बैठे है । आवुस पाथिकपुत्र । आपने वैशालीमे सभाके बीच यह बात कही थी—श्रमण गौतम भी ज्ञानवादी ० उससे दुगुना ऋद्धि-बल दिखाऊँगा । आवुस ० । आधे मार्गको छोळ श्रमण गौतम सर्वप्रथम ही आयुष्यमानके आराम मे आकर दिनके विहारके लिये बैठे है ।’

‘बहुत अच्छा ’ कह वह पुरुष ० जहॉ अचेल पाथिकपुत्र था वहाँ गया । जाकर ० बोला—‘आवुस ० । चले, बळे बळे लिच्छवी ० ।’

“भार्गव । ऐसा कहनेरपर अचेल पाथिकपुत्र ‘आवुस, चलता हूँ । आवुस, चलता हूँ ।’ कहकर वही रुक गया, आसनसे उठ भी नही सका । भार्गव । तब वह पुरुष अचेल पाथिकपुत्रसे यह बोला—‘आवुस ० । आपको क्या हो गया है ॽ क्या आपकी देह पीढेमे सट गई है, या पीढा ही आपकी देहमे सट गया है ॽ जो ‘आवुस,चलता हूँ ०’ कहकर वही रुक जाते हो, आसनसे उठते भी नही ।’

“भार्गव । ऐसा कहनेपर ० उठ भी नही सका । भार्गव । जब उस पुरुषने समझ लिया—यह अचेल पाथिकपुत्र हारा ही सा है, ‘चलता हूँ चलता हूँ’ कहकर ० उठ भी नही सकता, तब उसने सभामे आकर कहा—‘यह अचेल पाथिकपुत्र हारा ही सा है । ‘चलता हूँ, चलता हूँ’—कहकर ० उठ भी नही सकता ।’

“भार्गव । उसके ऐसा कहनेपर मैने सभासे यह कहा—‘अचेल पाथिकपुत्रका ऐसा कहना अनुचित है ० शिर भी फट जायगा ।’

(इति) प्रथम भाणवार ॥१॥

“भार्गव । तब लिच्छवियोके एक अफसरने आसनसे उठकर सभामे कहा—‘तो आप लोग थोळी और प्रतिक्षा करे । मै जाता हूँ, शायद मै अचेल पाथिकपुत्रको इस सभामे ला सकूँ ।’

“भार्गव । तब वह लिच्छवियोका मन्त्री ० जहॉ अचेल पाथिकपुत्र था वहॉ गया । जाकर अचेल पाथिकपुत्रसे बोला—‘आवुस पाथिक-पुत्र । चले, आपका चलना बळा अच्छा होगा । बळे–बळे लिच्छवी ० आये है । आपने ० सभाके बीच यह बात कही थी—श्रमण गौतम ज्ञानवादी ० ।

आवुस ।० । श्रमण गौतमने सभामे यह बात कही है—अचेल ०का ऐसा कहना अनुचित ० । आवुस ० । चले । चलनेहीसे हम लोग आपको जिता देगे, श्रमण गौतमकी हार हो जायेगी ।’

“भार्गव । ऐसा कहनेपर अचेल पाथिकपुत्र ‘आवुस । चलता हूँ ०’ कहकर ० उठ भी नही सका । भार्गव । तब ० अफसरने अचेल पाथिकपुत्रसे कहा—क्या ० पीढा सट गया है ० । जब मन्त्रीने जान लिया—अचेल ० हार सा गया है, ‘चलता हूँ ०’ कहकर ० उठ भी नही सकता, तो सभामे आकर कहा—‘अचेल हारसा गया ० उठ भी नही सकता ।’

“भार्गव । उसके ऐसा कहनेपर मैने सभामे कहा—० अनुचित था ० । यदि आप आयुष्मान् लिच्छवियोके मनमे यह हो—हम लोग अचेल पाथिकपुत्रको रस्सीसे बॉघ, बैलकी जोळीसे खीच लावेगे, तौ भी चाहे तो रस्सी ही टुट जायेगी या पाथिकपुत्र ही टूट जायेगा (कितु वह अपने आसनको नही छोळेगा) अचेल पाथिकपुत्रका ऐसा कहना अनुचित ० ।’

“भार्गव । तब, दारुपत्तिकका शिष्य जालिय आसनसे उठकर सभामे बोला—तो आप लोग थोळी और प्रतीक्षा करे ० । जहाँ अचेल वहाँ गया ० चले । ० तुमने यह बात कही थी ० ज्ञानवादी ० । ० आवुस पाथिक-पुत्र । आप चले । चलनेहीसे हम लोग आपको जिता देगे, श्रमण गौतमकी हार हो जायेगी ।’

“भार्गव । ‘चलता हूँ, चलता हूँ ।’ कह ० आसनसे भी नही उठ सका ।

“भार्गव । तब जालिय ० ने अचेल पाथिकपुत्रसे यह कहा—० क्या सट गया है ॽ ० आसनसे भी नही उठता ॽ’

“भार्गव । ० आसनसे भी नही उठ सका । जब ० जालियने समझ लिया—अचेल नही मानेगा—‘चलता हूँ, चलता हूँ ।’ कहकर ० आसनसे उठना भी नही, तब उससे कहा—‘आवुस पाथिकपुत्र । पुराने समयमे एक बार मृगराज सिंहके मनमे यह आया—मै किसी बनमे जाकर वास करूँ, वहाँ वासकर सायकाल अपनी मॉदसे निकलूँगा । मॉदसे निकलकर जँभाई लूँगा । जँभाई लेकर चारो ओर देखूँगा । चारो ओर देखकर तीन बार सिह-नाद करुँगा । तीन बार सिंह-नाद करके गोचर-(=शिकार)के लिये प्रस्थान करुँगा । वहॉ अच्छे अच्छे जानवरोको मार, नरम नरम मास खा, उसी माँदमे चला आऊँगा ।

तब वह मृगराज सिह किसी वनमे जाकर वास करने लगा, ० नरम नरम मास खा, उसी माँदमे आकर रहने लगा । पाथिकपुत्र । उसी मृगराज सिंहके जूठे छूटे मॉसको खाकर एक बूढा स्यार मोटा और बलवान् हो गया ।

“आवुस पाथिकपुत्र । तब उस बूढे स्यारके मनमे यह आया—कया मै हूँ, कया मृगराज सिंह है ॽ मै भी क्यो न किसी वनमे जाकर वास करूँ ० सायकाल माँदसे निकलूँगा ० सिह-नाद करूँगा ० अच्छे अच्छे जानवरोको मार, नरम नरम मास खा, उसी माँदमे चला आऊँगा । ‘आवुस । तब वह बूढा स्यार किसी वनमे जाकर वास करने लगा, ० सायकाल माँदसे निकता, ० जँभाई ली, ० चारो ओर देखा, चारो ओर देखकर ‘तीन बार सिह-नाद करुँगा’ करके कर्कश स्यारोका ही शब्द (हुँवा, हुँवा) करने लगा । भला, कहाँ सिह-नाद और कहॉ एक तुच्छ स्यारका हुँवा हुँवा ।

‘आवुस पाथिक । इसी तरह सुगतकी ही शिक्षाओसे जीनेवाले और उनका जूठा खानेवाले आप सम्यक्-सम्बुद्ध, अर्हत्, तथागतका सामना कैसे करना चाहते थे ॽ कहाँ तुच्छ पाथिक-पुत्र और कहाँ सम्यक्-सम्बुद्ध अर्हत् तथागतोका सामना करना ॽ’

“भार्गव । दारुपत्तिकका शिष्य जालिय, इस उपमासे भी अचेल पाथिकपुत्रको उस आसनसे हिला नही सका । तब, बोला—

‘अपनेको सिह मान स्यारने समझा कि मै मृगराज हूँ, और ऐसा कह’ ।

“हुँवा, हुँवा” करने लगा, कहॉ तुच्छ स्यार और कहॉ सिह-नाद ॥१॥

‘आवुस ० । उसी तरह सुगतकी ही शिक्षाओसे जीनेवाले ० आप मानो अहत् तथागत सम्यक् सम्बुद्धका सामना करना चाहते थे । कहॉ तुच्छ पाथिक-पुत्र और कहॉ ० सम्बुद्धोका सामना करना ?

“भार्गव । तब भी जालिय ० अचेल पाथिकपुत्र को उस आसनसे नही हिला सका । तो बोला―

‘जूठेको खा, अपनेको (मोटा) देख, जब तक अपने स्वरूपको नही पहचानता, तब तक स्यार अपनेको व्याध्र समझता है ।

वह उसी तरह स्यारके ऐसा ‘हुँवा, हुँवा’ करता है ।

कहॉ तुच्छ स्यार और कहॉ सिह-नाद । ॥२॥

“आवुस । उसी तरह सुगरकी ही ० सामना करना चाहते थे । कर्हा ० पाथिकपुत्र ० । तब बोला―

‘मेढक, चूहो, श्मशानमे फेके मुर्दोको खाकर बूढा (स्यार) छोटे या बळे जगलमे रहता था ।

स्यारने समझा―मै मृगराज हूँ । उसी तरह वह ‘हुँवा, हुँवा’ करने लगा ।

कहॉ एक तुच्छा स्यार और कहॉ सिह-नाद ।’ ॥३॥

“० इस उपमा से भी अचेल पाथिकपुत्रको अपने आसनसे नही हिला सका ।

“तब वह उस सभामे आकर यह बोला―अचेल पाथिकपुत्र हार ही गया है । ‘चलता हूँ’ ‘चलता हूँ’ कहकर ० आसनमे नही उठता ।

“मार्गव । ऐसा कहनेपर मैने सभाम यह कहा―० अचेल पाथिकपुत्रका ऐसा कहना अनुचित ० । या रस्मी टूट जायेगी या अवेल पाथिकपुत्र ही टूट जायेगा । ० अनुचित ०’ ।

“भार्गव । तब मैने उस सभाको घार्मिक उपदेशोसे समझाया, बुझाया, उत्साहित तथा प्रसन्न- किया । उस सभाको घार्मिक उपदेशोसे ० प्रसन्नकर, ससारके बळे बन्धनसे मुक्त किया । चौरासी हजार प्राणियोको भवसागरसे उवारा, फिर अग्नितत्त्व (=तेजो धातु) को (घ्यानसे) ग्रहणकर, सात ताल आकाशमे ऊपर उठ और सात ताल ऊँचा अपने तेजको फैला और (स्वय) धुँआ देते, प्रज्बलित हो महावन की कूटागारशालाके ऊपर उठा ।

“भार्गव । तब सुनक्खत्त लिच्छविपुत्र जहाँ मै था वहाँ गया । ० एक ओर बैठे सुनक्खत्त ०-वो मैने कहा―‘सुनक्खत्त । तो तू क्या समझता है―अचेल पाथिक-पुत्रके विषयमे जैसा मैने कहा था वैसा ही हुआ या दुसरा ?’

‘भन्ते । ० जैसा आपने कहा था वैसा ही हुआ, दूसरा नही ।’

‘सुनक्खत्त । तो तू क्या समझता है―०ऋद्धि-बल दिखाया गया या नही ?’

‘भन्ते । ० दिखाया गया ० ।’

मूर्ख । ० दिखानेपर भी तू कैसे कहता है―भन्ते । भगवान् ० (ऋद्धि) नही दिखाते । मूर्ख । देख यह तेरा ही दोष है ।’ भार्गव । ० सुनक्खत्त ० चला गया ।

“भार्गव । मै अग्र (श्रेष्ठ)को जानता हूँ । मै उसे जानता हूँ, उससे भी अधिक जानता हूँ । उसे जानकर वैसा अभिमान भी नही करता । अभिमान न करते हुये मै अपने भीतरही भीतर मुक्तिका अनुभव करता हूँ, जिस अनुभव के करनेसे तथागत किर कभी दुख नही पाते ।

५—ईश्वर निर्माणवादका खंडन

“भार्गव । जो श्रमण ब्राह्मण ईश्वर (=इस्सर) या ब्रह्माक (सृष्टि) कर्त्तापनके मत (=आचार्यक)को अग्रणी (=श्रेष्ठ) बतलाते है, उनके पास जाकर मै यो कहता हूँ—क्या सचमुच आप लोग ईश्वर०के (सृष्टि)कर्त्तापनको श्रेष्ठ बताते है ॽ’ मेरे ऐसा पूछनेपर वे ‘हाँ’ कहते है ।

“उन्हे मै ऐसा कहता हूँ—‘आप लोग कैसे ईश्वर ०के (सृष्टि) कर्त्तापनको श्रेष्ठ बताते है ॽ’ मेरे ऐसे पूछने पर वे उत्तर नही दे सकते । उत्तर न देकर वे मुझहीसे पूछने लगते है । उन लोगोके पूछनेपर मै उनका उत्तर देता हूँ ।—‘आवुसो । बहुत दिनोके बीतनेपर कोई समय आवेगा जब इस लोकका प्रलय होगा । प्रलय हो जानेपर (भी) जो आभास्वर योनिमे जन्मे प्राणी मनोमय, प्रीति भोजी, स्वयप्रभ, अन्तरिक्षगामी और शुभस्थायी होते है वही चिरकाल तक रहते है ।

“आवुसो । बहुत काल बीतनेपर कोई समय आवेगा, जब इस लोककी उत्पत्ति (=विवर्त) होती है । लोकके विवर्त हो जानेपर, शून्य ब्रह्म-विमान (=ब्रह्मलोक) प्रकट होता है । तब (आभास्वर देवलोकका) कोई प्राणी आयुके क्षीण होनेसे, या पुण्यके क्षीण होनेसे, (आभास्वर लोक) से च्युत हो शून्य ब्रह्म-विमानमे उत्पन्न होता है । वह वहॉ मनोमय प्रीतिभोजी ० होता है । वह वहॉ बहुत दिनो तक रहता है । वहॉ बहुत दिनो तक अकेले रहनेके कारण उसका जी ऊब जाता है और उसे भय मालूम होने लगता है—‘अहो । दूसरे प्राणी भी यहाँ आवे’ । उसी समय दूसरे प्राणी भी आयु ० पुण्यके क्षय होनेसे ० पहिलेवाले प्राणीके साथी हो शून्य ब्रह्म-विमानमे उत्पन्न होते है । वे भी वहॉ मनोमय ० होते है । ० बहुत दिन तक रहते है ।

“आवुस । जो प्राणी वहॉ पहले उत्पन्न होता है, उसके मनमे यह होता है—‘मै ब्रह्मा, महा-ब्रह्मा, अभिमू (=विजेता) अन्-अभिभूत, सर्वज्ञ, वशवर्ती, ईश्वर, कर्ता, निर्माता, श्रेष्ठ, स्वामी (=वशी) और भूत तथा भविष्यके प्राणियोका पिता हूँ । मैने ही इन प्राणियोको उत्पन्न किया है । सो किस हेतु ॽ मेरे ही मनमे यह पहले हुआ था—अहो । दूसरे भी प्राणी यहॉ आवे । अत मेरे ही मनसे उत्पन्न होकर ये प्राणी यहॉ आये है । और जो प्राणी पीछे उत्पन्न हुये, उनके मनमे भी यह आता है—‘यह ब्रह्मा, महाब्रह्मा ० ईश्वर, (सृष्टि) कर्त्ता, ० पिता है । इसने०ही हम लोगोको उत्पन्न किया है । सो किस हेतु ॽ इसको हम लोगोने यहॉ पहलेहीसे विद्धमान पाया, हम लोग (तो) पीछे उत्पन्न हुये ।’

“आवुसो । जो प्राणी पहले उत्पन्न होता है, वह दीर्घ-आयु, अधिक रोबवाला और अधिक सम्मानित होता है। और जो प्राणी पीछे उत्पन्न होते है, वे अल्प-आयु कमरोबवाले, कम सम्मानित होते है । आवुसो । यही कारण हे कि दूसरा प्राणी (जब) उस कायाको छोळ कर इस (लोक) मे आता है । यहॉ आकर घरसे बेघर हो प्रब्रजित होता है । ० प्रब्रजित होकर समय, वीर्य, अध्यवसाय, अप्रसाद और स्थिर चित्तसे उस प्रकारकी चित्तसमाधिको प्राप्त करता है, जिससे कि एकाग्रचित्त होनेपर उससे पूर्वके जन्मका स्मरण करता है, उसके आगेका नही स्मरण करता । वह ऐसा कहता है—जो वह ब्रह्मा, महाब्रह्मा ० है, जिस ब्रह्माने हमे उत्पन्न किया है, वह नित्य, ध्रुव, शाश्वत, निर्विकार (=अविपरिणामधर्मा) और सदाके लिये वैसा ही रहनेवोला है । और जो हम लोग उस ब्रह्मा द्वारा उत्पन्न किये गये है, अनित्य, अध्रुव, अल्पायु, मरणशील है । इस प्रकार आप लोग ईश्वरका (सृष्टि-) कर्त्ता-पन ० बतलाते है ॽ’ वह लोग ऐसा कहते है—‘आवुस गौतम । जैसा आयुष्मान् गौतम बतलाते है, वैसा ही हम लोगोने (भी) सुना है ।

“भार्गव । मै अग्र जानता हूँ ० जिसके जाननेसे तथागत फिर दुखमे नही पळते ।”

“भार्गव । कितने श्रमण और ब्राह्मण कीडाप्रदोषिक (=खिड्डापढोसिक)का आदिपुरुष होना—इस मत (=आचार्यक) को मानते है । उनके पास जाकर मै ऐसा कहता हुँ—‘वण सचमुच आप

आयुष्मान् लोग कीडाप्रदोषिकको आदि पुरूष ० बतलाते है ॽ’ मेरे ऐसा पूछनेपर वे ‘हाँ’ कहते है । उन्हे मै यह कहता हूँ—‘आप आयुष्मान् कैसे ० आदिपुरूष ० मानते है ॽ मेरे ऐसा पूछनेपर वे उत्तर नही देते । उत्तर न देकर मुझसे ही पूछते है । उन लोगोके पूछने पर मै उत्तर देता हूँ—‘आवुसो । कीडाप्रदोषिक नामक सात देवता है । वे बहुत दिनो तक कीडामे रत रह, लगे रह विहार करते है । ० विहार करनेसे उनकी स्मृति नष्ट हो जाती है । स्मृति के नष्ट हो जानेपर वे देव उस कायासे च्युत हो जाते है । आवुस । यही कारण है कि कोई प्राणी उस कायासे च्युत होकर इस (लोक)मे आता है। यहॉ आकर घरसे बेघर ० एकाग्रचित्त हो उससे पूर्वके जन्मको स्मरण करता है, उसके पहले को स्मरण नही करता । वह ऐसा कहता है—‘जो देवता क्रीडाप्रदोषिक नही है वे क्रीडा और रतिमे बहुत लगे नही रहते । ० उनकी स्मृति नष्ट नही होती । स्मृतिके नष्ट नही होनेसे वे उस कायासे च्युत नही होते, नित्य ध्रुव ० । और जो हम लोग क्रीडाप्रदोषिक देवता है, ० रतिमे लगे रहे । ० स्मृति नष्ट हो गई । ० उस कायासे च्युत हो गये । (अत हम लोग) अनित्य, अध्रुव ० ’। ० जैसा आपने कहा ।

“भार्गव । मै अग्रको जानता० ।

“भार्गव । कितने श्रमण और ब्राह्मण मन प्रदोषिक (=मनोपदोसिक) देवताके आदिपुरुष होनेके मतको मानते है । उनके पास जाकर मै यो कहता हूँ—कैसे ० । ० । ० मै यह कहता हूँ—आवुसो । मन प्रदोषिक नामक देवता है । वे (जब) एक दूसरेको बहुत ऑख लगाकर देखते है । ० (उससे) उनके चित्त एक दूसरेके प्रति दूषित हो जाते है । वे एक दूसरेके प्रति दूषित चित्तवाले, क्लान्त-काय और क्लान्त-चित्त हो जाते है । (तब) वे देवता उस कायासे च्युत हो जाते है । आवुस । यह कारण है कि (उनमेंसे जब) कोई प्राणी उस कायासे च्युत होकर यहाँ आता है । घरसे बेघर ० । ० एकाग्र चित्त हो उससे पूर्वके जन्मको स्मरण करता है, उसके पहिलेकी नही स्मरण करता । वह ऐसा कहता है—‘जो मन प्रदोषिक देवता नही है ० वे नित्य ० है । और हम लोग ० अनित्य, अध्रुव ० है । आप लोग ऐसे ही मन प्रदोषिक देवताको आदिपुरुष होनेके मतको न मानते है ॽ वह लोग कहते है —‘आवुस गौतम । हम लोगोने भी ऐसा ही सुना है, जैसा आयुष्मान् गौतम कह रहे है ।’

“भार्गव । मै अग्रको ० ।

“भार्गव । कितने श्रमण और ब्राह्मण है, जो अधीत्यसमुत्पन्न (=अधिच्चसमुप्पन्न) देवताके आदिपुरुष होनेके मत मानते है । मै उनके पास जाकर ऐसा कहता हूँ—क्या सचमुच०ॽ’ उन लोगोके पूछनेपर मै इस प्रकार उत्तर देता हूँ—‘आवुसो । असज्ञी सत्त्व (=असञ्ञिसत्त) नामक देवता है । सज्ञा (=होश)के उत्पन्न होनेसे वे देवता उस कायासे च्युत हो जाते है । आवुसो । यह कारण है कि (जब) कोई प्राणी उस कायासे च्युत ही यहाँ आता है । यहाँ आकर घरसे बेघर ० एकाग्रचित्त हो वह सज्ञाके उत्पन्न होनेको स्मरण करता है, उसके पहिलेकी नही स्मरण करता। वह ऐसा कहता है—आत्मा और लोक दोनो अधीत्यसमुत्पन्न (=अभावसे उत्पन्न) है । सो किस हेतु ॽ मै पहले नही था, और अब हूँ । न होकर भी (अब) मै हो गया ।’ आवुसो । आप लोग इसीलिये अधीत्यसमुत्पन्नके आदिपुरुष होनेके मतको मानते है ।’ वह लोग कहते है—‘० जैसा आप गौतम कह रहे है ।’

“भार्गव । मै अग्रको जानता ० जिससे तथागत फिर दुखमे नही पळते ।

६—शुभ विमोक्ष

“भार्गव । मेरे इस तरह कहनेपर कुछ श्रमण और ब्राह्मण मुझपर असत्य, तुच्छ, मिथ्या और अयथार्थ दोषका आक्षेप करते है—‘श्रमण गौतम और भिक्षु लोग उलटे है ।’ श्रमण गौतम ऐसा कहता

है—‘जिस समय शुभ विमोक्ष१ उत्पन्न करके (योगी) विहार करता है, उस समय (योगी) सब कुछ-को अशुभ ही अशुभ देखता है ।’

“भार्गव । (किंतु) मै ऐसा नही कहना—जिस समय ० अशुभ ही अशुभ देखता है ।’ भार्गव । बल्कि मै तो ऐसा कहता हूँ—‘जिस समय शुभ विमोक्ष उत्पन्न करके विहार करता हे, उस समय (योगी) शुभ ही शुभ समझता हे ।”

“वे ही उल्टे है, जो भगवान् ओर भिक्षुओपर मिथ्या दोषारोपण करते है । भन्ते । मै आपपर इतना प्रसन्न हूँ । आप मुझे उस धर्मका उपदेश करे, जिससे शुभ विमोक्षको उत्पन्नकर मै विहार करुँ ।”

“भार्गव । दूसरे मतवाले, दूसरे विचारवाले, दूसरी रुचिवाले, दूसरे आयोगवाले, दूसरे मत (=आचार्यक)को माननेवाले तुम्हारेलिये शुभ विमोक्ष उत्पन्नकर विहार करना दुष्कर है । भार्गव । जो तुम मुझपर प्रसन्न हो उसीको ठीकसे निभाओ ।”

“भन्ते । यदि दूसरे मतवाले ० होनेसे मेरे लिये शुभ विमोक्ष उत्पन्न होकर विहार करना दुष्कर हे, तो मै जो आपसे इतना प्रसन्न हूँ उसीको ठीकसे निभाऊँगा ।”

भगवानने यह कहा ।

भार्गव-गोत्र परिव्राजकने भगवानके भाषणका अभिनन्दन किया ।