मज्झिम निकाय

18. मधुपिंडक-सुत्तन्त

ऐसा मैने सुना—

एक समय भगवान् शाक्य (देश) में कपिलवस्तु के न्यग्रोधाराम में विहार करते थे। तब भगवान् पूर्वाह्न समय पहिनकर पात्र चीवर ले कपिलवस्तु में पिंडचार के लिये प्रविष्ट हुये। कपिलवस्तु में पिंडचार करके भोजनोपरान्त पिंडपात से निबटकर; जहाँ महावन था, वहाँ दिन के विहार के लिये गये। जाकर महावन में प्रविष्ट हो वेलुव-लट्ठिका (= बाँस) वृक्ष के नीचे बैठे। दण्डपाणि शाक्य भी टहलने (= जंघा विहार) के लिये, जहाँ महावन था वहाँ गया। जाकर, महावन में प्रविष्ट हो, जहाँ वेलुव-लट्ठिका (= वेणुयष्टिका) थी, जहाँ भगवान् थे, वहाँ गया। जाकर भगवान् के साथ……(यथायोग्य कुशल प्रश्न पूछ) डण्डे के सहारे एक ओर खडा हो गया। एक ओर खड़े हो दण्डपाणि शाक्य ने भगवान् से यह कहा—

“श्रमण (आप) किस वाद के मानने वाले, किस (सिद्धान्त) के वक्ता है?”

“आवुस! जिस वाद का मानने वाला, देव-मार-ब्रह्मासहित सारे लोक में श्रमण-ब्राह्मण-देव मानुष सारी प्रजा में, लोक में किसी के साथ विग्रह न करके रहता है; जैसे कामों से रहित विहरते हुये उस अकथंकथी, छिन्न-कोकृत्य (= संदेह-रहित), भव-अभव में तृष्णारहित उस ब्राह्मण को संज्ञा (= सोच) नहीं पीछा करती; आवुस! मै ऐसे वाद-वाला ऐसे (सिद्धान्त का) वक्ता हूँ।”

ऐसा कहने पर दण्डपाणि शाक्य शिर को हिला, जीभ चला, ललाटपर तीन बलें चढ़ाकर, डंडा उठा चल दिया।

तब भगवान् सायंकाल प्रतिसँल्लयन (= एकान्त चिन्तन) से उठकर जहाँ न्यग्रोधाराम था वहाँ गये, जाकर बिछे आसन पर बैठे। बैठ कर भगवान् ने भिक्षुओं को संबोधित किया—

“भिक्षुओ! आज मै पूर्वाह्न समय पहिन कर पात्रचीवर ले ॰ डंडा उठा चल दिया।”

ऐसा कहने पर एक भिक्षु ने भगवान् से यह कहा—“भन्ते! क्या वादी हैं भगवान्, कि, देव-मार-ब्रह्मासहित सारे लेक में ॰ संज्ञा नहीं पीछा करती?”

“भिक्षुओ! जिसके कारण पुरूष को प्रपंच संज्ञा का ज्ञान (= संख्या) आती हैं, जहाँ अभिनन्दन योग्य नहीं, अभिवान योगय नहीं, गवेषण योग्य नहीं, वही है अन्त राग-अनुशयों (= रागरूपी मलों) का; ॰ प्रतिघ (= प्रतिहिंसा)-अनुशयों का ॰; ॰ दृष्टि-अनुशयों ॰; ॰ विचिकित्सा-अनुशयो ॰; ॰ मान-अनुशयो ॰; ा॰ भवराग-अनुशयों ॰; ॰ अविद्या-अनुशयों ॰; यहीं अन्त है दण्ढग्रहण, शस्त्रग्रहण, कलह, विग्रह, विवाद, ‘तु तु मैं मैं’, पिशुनता (= चुगली), और मृपावाद (= झूठ) का। यहाँ यह पापक=अकुशल धर्म (= बुराइयाँ) निःशेषतया नष्ट हो जाते हैं!”

भगवान् ने यह कहा, यह कहकर सुगत (= बुद्ध) आसन से उठकर विहार (= कोठरी) मंे चले गये।

तब, भगवान् के जाने के थोडी ही देर बाद उन भिक्षुओं को यह हुआ—“आवुसो! भगवान्—’भिक्षुओ! जिसके कारण ॰ नष्ट हो जाती है।’ इसे संक्षेप से गिनाकर, विस्तार से अर्थ को बिना विभाजित किये ही आसन से उठकर विहार में चले गये। कौन है, जो इस संक्षेप से कहे ..विस्तार से न विभाजित किये (उपदेश) का विस्तार से अर्थ-विभाग करेगा?”

तब उन भिक्षुओं को हुआ-“यह आयुष्मान् महाकात्यायन शास्ता (= बुद्ध) द्वारा प्रशंसित, विज्ञ सब्रह्मचारियों द्वारा सम्मानित हैं। आयुष्मान् महाकात्यायन शास्ता द्वारा इस संक्षेप से कहे…विस्तार से न विभाजित किये (उपदेश) का विस्तार से अर्थ-विभाग करने में समर्थ हैं। क्यों न हम आयुष्मान् महाकात्यायन से इसके अर्थ को पूछें।”

तब वह भिक्षु जहाँ आ.महाकात्यायन थे, वहाँ गये। जाकर आ. महाकात्यायन के साथ…(यथायोग्य कुशल प्रश्न पूछ) एक ओर…बैठकर ..आ. महाकात्यायन से यह बोले—“आवुस कात्यायन! भगवान्—’भिक्षुओ! जिस कारण से ॰; जो यह संक्षेंप से कह विस्तार से विभाजित किये बिना ही ॰ विहार में चले गये। तब आवुस कात्यायन! भगवान् के जाने के थोडी ही देर बाद ॰। तब हमे हुआ—यह आयुष्मान् महाकात्यायन ॰ पूछें’। आयुष्मान् कात्यायन (आप) इसका विभाजन करें।”

“जैसे आवुसो! सारार्थी, सारगवेषी पुरूष सार को खोजते, सार वाले खड़े महावृक्ष के मूल को छोड, स्कन्ध को छोड, शाखा-पत्र को छोड, सार खोजना चाहे; ऐसे ही अब शास्ता (= बुद्ध) के सामने रहने पर उन भगवान् को छोड आयुष्मानों की हम लोगों (जैसे) से पूछने की इच्छा है। आवुसो! वह भगवान् जानकर हैं, देखनहार हैं। वह भगवान् चक्षुर्भूत (= आँख समान), ज्ञानभूत, धर्मभूत, ब्रह्मभूत (हैं)। वक्ता प्रवक्ता (हैं)। अर्थ के निर्णेता, अमृत के दाता, धर्मस्वामी, तथागत हैं। इसी का काल था, कि भगवान् को ही इसका अर्थ पूछते, जैसे भगवान् इसका व्याख्यान करते, वैसा धारण करते।”

“ठीक आवुस कात्यायन!—’भगवान् जाननहार हैं ॰ वैसा धारण करते’। आयुष्मान् महाकात्यायन भी तो शास्ता द्वारा प्रशंसित ॰ विस्तार से अर्थ विभाग करने में समर्थ हैं। आयुष्मान् कात्यायन (आप) इसे सरल करके विभाजन करें।”

“तो आवुसो! सुनो अच्छी तरह मन में करो, कहता हूँ।”

“अच्छा आवुस!” (कह) उन भिक्षुओं ने आयुष्मान् महाकात्यायन को उत्तर दिया।

आ. महाकात्यायन ने यह कहा—“आवुसो! हमारे भगवान्—’भिक्षु! जिस कारण से ॰; जो यह संक्षेप से कह, विस्तार से विभाजित किये बिना ही ॰ विहार में चले गये। आवुसो! भगवान् के इस संक्षेप से कहे विस्तार से न विभाजित किये उपदेश का अर्थ मैं इस प्रकार जानता हूँ। आवुसो! चक्षु करके, रूप में चक्षु-र्विज्ञान उत्पन्न होता है। तीनों (= चक्षु-इन्द्रिय, रूप-विषय और विज्ञान) का समागम स्पर्श (कहा जाता है)। स्पर्श करके वेदना (होती है)। जिसे वेदन (= अनुभव) करता है, उसका संज्ञान (= समझना) करता है। जिसे संज्ञान करता है, उसके (बारे में) वितर्क करता है। जिसे वितर्कता है, उसे प्रपंचन करता है। इसके कारण पुरूष को भूत भविष्य-वर्तमान संबंधी चक्षु-द्वारा-विज्ञेय रूपों में प्रपंच-संज्ञा का संख्यान आता है। आवुसो! श्रोत्र करके शब्द में-श्रोत्र विज्ञान उत्पन्न होता है। तीनों का समागम स्पर्श है ॰। ॰ घ्राण करके गंध में ॰। ॰ जिव्हा करके रस में ॰। ॰ काया करके स्प्रष्टव्य में काय-विज्ञान उत्पन्न होता है। ॰। ॰ मन करके धर्म में ॰ मनो-विज्ञान ॰।

“आवुसो! यदि चक्षु, रूप और चक्षुर्विज्ञान है, तभी स्पर्श का प्रज्ञापन (= जानना) संभव है। स्पर्श की प्रज्ञप्ति होने पर वेदना का प्रज्ञापन संभव है। ॰ संज्ञा का प्रज्ञापन संभव है। ॰ वितर्क प्रज्ञप्ति ॰। वितर्क-प्रज्ञप्ति के होने पर प्रपंच-संज्ञा सख्या-समुदाचरण-प्रज्ञप्ति (= ज्ञान के उपचार का जानना) संभव है। आवुसो! श्रोत्र, शब्द, और श्रोत्रविज्ञान के होने पर स्पर्श की प्रज्ञप्ति है। ॰ घ्राण, गंध और घ्राण-विज्ञान ॰। ॰ जिव्हा, रस, और जिव्हा-विज्ञान ॰। ॰ काया, स्प्रष्टव्य, और काय-विज्ञान ॰। ॰ मन, धर्म और मनोविज्ञान के होने पर स्पर्श की प्रज्ञप्ति संभव है। स्पर्श की प्रज्ञप्ति होने पर वेदना का प्रज्ञापन संभव है। ॰ संज्ञा ॰। ॰ वितर्क ॰। ॰ प्रपंच-संज्ञा-संख्या-समुदइाचरण-प्रज्ञप्ति संभव है।

“आवुसो! चक्षु, रूप और चक्षुर्विज्ञान के न होने पर स्पर्श की प्रज्ञप्ति संभव नहीं। स्पर्श-प्रज्ञप्ति के बिना वेदना-प्रज्ञप्ति संभव नहीं। ॰ संज्ञा-प्राप्ति संभव नहीं। ॰ वितर्क-प्रज्ञप्ति ॰ वितर्क-प्रज्ञप्ति के बिना प्रपंच-संज्ञा-संख्या-समुदाचरण-प्रज्ञाप्ति संभव नहीं।

“आवुसो! श्रोत्र, शब्द, और श्रोत्रविज्ञान के न होने पर ॰। ॰ घ्राण ॰। ॰ जिव्हा ॰ं। ॰ काय ॰ । ॰ मन ॰। ॰ समुदाचरण-प्रज्ञप्ति संभव नहीं।

“आवुसो! भगवान्—’भिक्षु! जिस कारण से ॰; जो यह संक्षेप से कह, विस्तार से विभाजित किये बिना ही ॰ विहार में चले गये। आवुसो! ॰ उपदेश का अर्थ मैं इस प्रकार जानता हूँ। चाहे, तो आप आयुष्मान् भगवान् के पास भी जाकर इस अर्थ को पूछें; जैसा हमारे भगवान् व्याख्यान करें, वैसा धारण करें।”

तब वह भिक्षु आ. महाकात्यायन के भाषण का अभिनन्दन=अनुमोदन कर आसन से उठ जहाँ भगवान् थे, वहाँ गये; जाकर भगवान् को अभिवादन कर ..एक ओर बैठ ..यह बोले—

“भन्ते! भगवान्—’भिक्षु जिस कारण से ॰ नष्ट हो जाती है’, जो यह संक्षेप से कह, विस्तार से विभाजित किये बिना ही ॰ विहार मंे चले गये। तब भगवान् के जाने के थोडी ही देर बाद ॰ महाकात्यायन से (इसे) अर्थ को पूछे। तब हम भन्ते! जहाँ आ. महाकात्यायन थे, वहाँ गये ॰ आ. महाकात्यायन से इस अर्थ को पूछा। हमारे वैसा पूछने पर आ. महाकात्यायन ने इस आकारों से, इन पदो से, इन व्यंजनों से अर्थ-विभाग किया।”

“भिक्षुओ! पंडित है महाकात्यायन, महाप्राज्ञ है ॰। यदि भिक्षुओ! तुमने मुझे इस अर्थ को पूछा होता, तो मै भी वैसे ही इसका व्याख्यान करता, जैसे कि महाकात्यायन ने इसका अर्थ व्याख्यान किया। यही इसका अर्थ है, ऐसे ही इसे धारण करो।”

ऐसा कहने पर आयुष्मान् आनन्द से भगवान् से यह कहा—

“जैसे भन्ते! भूख की दुर्बलता से पीड़ित पुूरूष मधु-पिंड (= लड्डु) पा जाये; वह जहाँ जहाँ से खाये (वहीं वहीं से उसमें) स्वादु, तृप्ति-कर रस को पाये, ऐसे ही भन्ते! चेतक (= होशियार) दर्भजातिक (= कुशाग्र-बुद्धि) भिक्षु इस धर्मपर्याय (= धर्मोपदेश) के अर्थ को जिधर जिधर से प्रज्ञा से परखे; उधर उधर से ही सन्तोष को पावेगा, चित्त की प्रसन्नता को ही पावेगां भन्ते! क्या नाम है, इस धर्मपर्याय का?”

“तो आनन्द! तू इस धर्मपर्याय को मधु-पिड-धर्मपर्याय ही के नाम से धारण कर।”

“भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो आयुष्मान् आनन्द ने भगवान् के भाषण को अभिनंदित किया।