मज्झिम निकाय

22. अलगद्दूपम-सुत्तन्त

‘ ऐसा मैंने सुना—

एक समय भगवान् श्रावस्ती में अनाथ-पिंडिक के आराम जेतवन में विहार करते थे। उस समय गन्धबाधि-पुब्व (= भूतपूर्व गन्धवाधि=गिद्ध मारने वाले) अरिष्ट (= अरिट्ठ) भिक्षु को ऐसी बुरी दृष्टि (= धारणा) उत्पन्न हुई थी—‘मैं भगवान् के उपदेश किये धर्म को ऐसे जानता हूँ, जैसे कि जो (निर्वाण आदि के) अन्तरायिक (= विघ्नकारक) धर्म (= कार्य) भगवान् ने कहे हैं, सेवन करने पर भी वह अन्तराय (= विघ्न्) नहीं कर सकते।’ बहुत से भिक्षुओं नले सुना कि, अरिष्ट भिक्षु को ऐसी बुरी दृष्टि उत्पन्न हुई है—॰ अन्तराय नहीं कर सकते’। तब वह भिक्षु जहाँ ॰ अरिष्ट भिक्षु था, वहाँ गये, जाकर ॰ अरिष्ट भिक्षु से यह बोले—

“आवुस अरिष्ट! सचमुच ही, तुम्हे इस प्रकार की बुरी दृष्टि उत्पन्न हुई है—‘॰ अन्तराय नहीं कर सकते?”

“आवुसो! मै भगवान् के उपदेश किये धर्म को ऐसे जानता हूँ ॰ अन्तराय नहीं कर सकते।”

तब वह भिक्षु ॰ अरिष्ट भिक्षु को उस बुरी दृष्टि (= धारण) से हटाने के लिये कहते, समझाते बुझाते थे—‘आवुस अरिष्ट! मत ऐसा कहो, मत आवुस अरिष्ट ऐसा कहो। मत भगवान् पर झूठ लगाओ (= अम्याख्यान करो), भगवान् पर झूठ लगाना अच्छा नहीं है। भगवान् ऐसा नहीं कह सकते। अनेक प्रकार से भगवान् ने आवुस अरिष्ट! अन्तरायिक (= विघ्नकारक) धर्मों को अन्तरायिक कहा है। सेवन करने पर वह अन्तराय करते है—कहा है। भगवान् ने कामों (= भोगों) को बहुत दुःखदायक, बहुत परेशान करने वाले कहा है। उनमें बहुत दुष्परिणाम (बतलाये हैं)। भगवान् ने कामों को अस्थिकंकाल-समान कहा, मांस-पेशी-समान ॰, तृण-उल्का-समान ॰, अंगारक (= अग्निचूर्ण) के समान ॰, स्वप्न-समान ॰, याचितकोपम (= मगनी के आभूषण के समान)॰, वृक्ष-फल-समान ॰, असिसूनूपम शक्ति-शूल-समान ॰, सर्प-शिर-समान ॰, भगवान् ने कामो को बहुत दुःखदायक ॰ बहुत दुष्परिणामी बतलाये हैं।”

उन भिक्षुओं द्वारा ॰ अरिष्ट भिक्षु ऐसा कहे जाने, समझाये बुझाये जाने पर भी उसी बुरी दृष्टि को दृढता से पकड अभिनिवेश (= आग्रह) करके (उसे) व्यवहार करता था—“मैं भगवान् के उपदेश किये धर्म को ऐसे जानता हूँ ॰ अन्तराय नहीं कर सकते।”

जब वह भिक्षु ॰ अरिष्ट भिक्षु को उस बुरी दृष्टि से नहीं हटा सके; तब वह भगवान् के पास जाकर अभिवादन कर, एक ओर बैठ यह बोले—

“भन्ते!॰ अरिष्ट भिक्षु को इस प्रकार की बुरी दृष्टि उत्पन्न हुई है—‘मैं भगवान् के ॰’ भन्ते! हमने सुना, कि ॰ अरिष्ट भिक्षु को ॰ इस प्रकार की बुरी दृष्टि उत्पन्न हुई है—‘॰’। तब हमने भन्ते!…अरिष्ट भिक्षु के पास…जाकर…यह पूछा—‘आवुस अरिष्ट! सचमुच ॰? ऐसा कहने पर ॰ अरिष्ट भिक्षु ने हमें यह कहा—‘आवुसो! मै भगवान् ॰ नहीं कर सकते’। तब भन्ते! हम ॰ अरिष्ट भिक्षु को ॰ समझाते बुझाते थे—॰। हमारे द्वारा ॰ ऐसा ॰ समझाये जाने पर भी ॰—‘मै भगवान् के ॰। जब हम भन्ते! ॰ अरिष्ट भिक्षुको उस बुरी दृष्टि से नहीं हटा सके, तब हम इसे भगवान् को कह रहे हैं।”

तब भगवान् ने एक भिक्षु को संबोधित किया—“आ भिक्षुृ! तू मेरे वचन से ॰ अरिष्ट भिक्षु को कह—आवुस अरिष्ट! तुझे शास्ता बुला रहे हैं।”

“अच्छा, भन्ते!”—कह उस भिक्षु ने ॰ अरिष्ट भिक्षु के पास…जाकर…यह कहा—

“आवुस अरिष्ट! शास्ता तुम्हे बुला रहे हैं।”

“अच्छा, आवुस!”— (कह) उस भिक्षु को उत्तर दे ॰ अरिष्ट भिक्षु…भगवान् के पास जाकर…अभिवादन कर…एक ओर बैठा। एक ओर बैठे ॰ अरिष्ट भिक्षु को भगवान् ने यह कहा—

“सचमुच अरिष्ट! तुझे इस प्रकार की बुरी दृष्टि उत्पन्न हुई है—मै भगवान् के ॰ अन्तराय नहीं कर सकते हैं?

“हाँ, भन्ते! मैं भगवान् के उपदेश किये धर्म को ऐसे जानता हूँ, जैसे कि जो अन्तरायिक धर्म भगवान् ने कहे हैं, सेवन करने पर भी वह अन्तराय नहीं कर सकते।”

“मोघपुरूष (= निकम्मा आदमी)! किसको मैने ऐसा धर्म उपदेश किया, जिसे तू ऐसा जानता है—मैं भगवान् ॰। क्यों मोघपुरूष! मैने तो अनेक प्रकार से अन्तरायिक धर्मो को अन्तरायिक कहा है ॰ बहुत दुष्परिणाम बतलाये हैं। और तू मोघपूरूष (= मोघिया) अपनी उल्टी धारणाा से हमें झूठ लगा रहा है, और अपनी भी हानि कर रहा हे, बहुत अ-पुण्य कमा रहा है। मोघपुरूष! यह चिरकाल तक तेरे लिये अ-हित और दुःख के लिये होगा।”

तब भगवान् ने भिक्षुओं को संबोधित किया—

“तो क्या मानते हो भिक्षुओ! क्या यह ॰ अरिष्ट भिक्षु उस्मीकत (= छू तक गया) भी इस धर्म में नहीं है?”

“कैसे होगा भन्ते! नहीं भन्ते!”

ऐसा कहने पर ॰ अरिष्ट भिक्षु चुप हो, मूक हो, कन्धा गिरा कर, अधोमुख चिन्ता करते प्रतिभा-शून्य हो बैठा रहा। तब भगवान् ॰ अरिष्ट भिक्षु को चुप ॰ प्रतिभाशून्य जान कर ॰ अरिट्ठ भिक्षु से बोले—

“तु मोघपुरूष! अपनी इस बुरी दृष्टि को जानेगा, जब मैं भिक्षुओं को पूछूँगा।”

तब भगवान् ने भिक्षुओं को संबोधित किया—

“भिक्षुओ! क्या तुम भी मेरे ऐसे उपदेश किये धर्म को जानते हो, जैसो कि वह ॰ अरिष्ट भिक्षु अपनी ही उल्अी धारणा से हमें झूठ लगा रहा है, और अपनी भी हानि कर रहा है, बहुत अपुण्य कमा रहा है?

“नही भन्ते! भगवान् ने तो अनेक प्रकार से अन्तरायिक धर्मो की अन्तरायिक कहा है ॰ बहुत दुष्परिणाम बतलाये हैं।”

“तो यह ॰ अरिष्ट भिक्षु अपनी उल्टी धारणा से हमें झूठ लगा रहा है, और अपनी भी हानि कर रहा है, बहुत अ-पुण्य (= पाप) कमा रहा है। यह इस मोघपुरूष के लिये चिरकाल तक अ-हित और दुःख के लिये होगा। और यह भिक्षुओ! कामों से भिन्न, काम-संज्ञा से भिन्न, काम वितर्क से भिन्न (किसी वस्तु का) सेवन करेगा, यह संभव नहीं।

“यहाँ भिक्षुओ! कोई कोई मोघपुरूष—गेय, व्याकरण, -गाथा, उदान, इतिवृत्तक, जातक, अद्भुत-धर्म, वैदल्य- (इन नौ प्रकार के) धर्म (= उपदेश) को धारण करते है। वह उन धर्मो को धारण करते भी उनके…अर्थ को प्रज्ञा से परखते नहीं है। अर्थ को प्रज्ञा से परखे बिना धर्मो का आशय नहीं समझते। वह या तो उपारम्भ (= सहायता) के लाभ के लिये धर्म को धारण करते हैं; या बाद में प्रमुख बनने के लाभ के लिये धर्म को धारण करते हैं; और उसके अर्थ को नहीं अनुभव करते। उनके लिये यह उल्टी तौर से धारण किये धर्म अहित (और) दुःख के लिये होते हैं। सो किस हेतु?—धर्मों को उल्टा धारण करने से भिक्षुओ! जैसे भिक्षुओ! कोई अलगद्द (= साँप) चाहने वाला अलगद्द-गवेषी पुरूष अलगद्द की खोज में घूमता एक महान् अलगद्द को पाये; और उसे भोग (= देह) से या पूँछ (= नंगुट्ठ) से पकडे; उसको वह अलगद्द उलट कर हाथ में, बाँह में या अन्य किसी अंग में डँस ले। वह उसके कारण मरण या मरण-समान दुःख को प्राप्त होवे। सो किस हेतु?—भिक्षुओ! अलगद्द के दुग्र्रहीत (= उल्टी तरह से पकडा) होने से। ऐसे ही यहाँ भिक्षुओ! कोई कोई मोघपुरूष ॰।

“किन्तु भिक्षुओ! कोई कोई कुलपुत्र—सूत्र ॰ धर्म को धारण करते हैं। वह उन धर्मो को धारण कर उनके अर्थ को प्रज्ञा से परखते है। प्रज्ञा से परखकर धर्मो के अर्थ को समझते हैं। वह उपारम्भ (= धनलाभ) के लिये ॰ या बाद में प्रमुख बनने के लिये धर्मों को धारण नहीं करते। वह उनके अर्थ को अनुभव करते हैं। उनके लिये यह सुग्रहीत (= ठीक तौर से धारण किये) धर्म चिरकाल तक हित और सुख के लिये होते है। जैसे भिक्षुओ! कोई ॰ अलगद्द-गवेषी पुरूष अलगद्द की खोज में घूमता एक महान् अलगद्द को देखे। उसको वह अजपद दंड (= साँप पकड़ने का डंडा जिसके छोर पर बकरी के पैर की तरह चिरवा संडसीनुमा हथियार लगा रहता है) से खूब अच्छी तरह पकडे़। अच्छी तरह पकड़कर गर्दन से ठीक तौर पर पकड़े। फिर भिक्षुओ! चाहे वह अलगद्द उस पुरूष के हाथ, बाँह या किसी और अंग को अपने भोग (= देह) से परिवेष्टित करे, किन्तु वह उसके कारण न मरण न मरण-समान दुःख को प्राप्त होवे। सो किस हेतु!—भिक्षुओ! अलगद्द के सुग्रहीत होने से। ऐसे ही भिक्षुओ! कोई कोई कुल-पुत्र ॰।

“इसलिये भिक्षुओ! मेरे जिस भाषण का अर्थ तुम समझे हो, उसे वैसे धारण करना, और जिस…का अर्थ तुम नहीं समझे, उसे मुझसे पूछना, या (दूसरे) जानकार भिक्षु से।

“भिक्षुओ! मैं बेड़े (= कुल्ल) की भाँति निस्तरण (= निस्तार=पार जाने) के लिये तुम्हंे धर्म को उपदेशता हूँ, पकड़ रखने के लिये नहीं। उसे सुनो, अच्छी तरह मन में करो, कहता हूँ।”

“अच्छा भन्ते!”—(कह) उन भिक्षुओं ने भगवान् को उत्तर दयिा।

भगवान् ने यह कहा—“जैसे भिक्षुओ! पूरूष अ-स्थान-मार्ग (= बे स्थान के रास्ते) पर जाते एक ऐसे महान् जल-अर्णव को प्राप्त हो, जिसका उरला तीर खतरा और भय से पूर्ण हो, और परला तीर क्षेमयुक्त और भयरहित हो। वहाँ न पार ले जाने वाली नाव हो, न इधर से उधर जाने आने के लिये पुल हो। (तब) उस (के मन में) हो—‘अहो! यह महान् जल-अर्णव है, इसका उरला तीर ॰ न इधर से उधर जाने आने के लिये पुल है। क्यों न मैं तृण-काष्ट-पत्र जमाकर बेड़ा बाँधू, और उस बेड़े के सहारे हाथ और पैर से मेहनत करते स्वस्तिपूर्वक पार उतर जाऊँ।’ तब भिक्षुओ! वह पुरूष ॰ बेड़ा बाँध कर, उस बेड़े के सहारे ॰ पार उतर जाये। उत्तीर्ण हो जाने पर, पार चले जाने पर उसके (मन में) ऐसा हो—‘यह बेड़ा मेरा बडा उपकारी हुआ है, इसके सहारे ॰ मैं पार उतरा हूँ क्यों न मैं इस बेड़े को शिर पर रखकर, या कन्धे पर उठाकर जहाँ इच्छा हो वहाँ जाऊँ।’ तो क्या मानते हो भिक्षुओ! क्या वह ऐसा करने वाला पुरूष उस बेड़े में कर्तव्य पालने वाला होगा?”

“नहीं, भन्ते!”

“भिक्षुओ! वह पुरूष उस बेड़े से दुःख उठाने वाला (= कष्टकारी) होगा। भिक्षुओ! यदि उत्तीर्ण पारंगत उस पुरूष को ऐसा हो—‘यह बेडा मेरा बड़ा उपकारी हुआ है, इसके सहारे ॰ मैं पार उतरा हूं, क्यों न मै इसे स्थल पर रखकर, या पानी में डालकर जहाँ इच्छा हो वहाँ जाऊँ।’ भिक्षुओ! ऐसा करने वाला वह पुरूष उस बेड़े मंे कर्तव्य पालने वाला होगा। ऐसे ही भिक्षुओ! मैंने बेड़े की भाँति निस्तरण के लिये तुम्हे धर्मो को उपदेशा है, पकड़ रखने के लिये नहीं। धर्म को बेड़े के समान (= कुल्लूपम) उपदेशा जानकर तुम धर्म को भी छोड दो, अ-धर्म की तो बात ही क्या।

“भिक्षुओ! यह छः दृष्टि (= धारणा)-स्थान हैं कौनसे छः?—भिक्षुओ! आर्यों के दर्शन से वंचित ॰ अज्ञ अनाडी पुरूष (1) रूप (= डंजजमत) को—‘यह मेरा है, ‘ ‘यह मैं हूं’, ‘यह मेरा आत्मा है’—इस प्रकार समझता है। (2) वेदना को ॰। (3) संज्ञा को ॰। (4) संस्कार को ॰। (5) विज्ञान को—‘यह मेरा है, ‘ ‘यह मैं हूँ, ‘ ‘यह मेरा आत्मा है’—इस प्रकार समझता है। (6) जो कुछ भी यह देखा, सुना, याद में आया, ज्ञात, प्राप्त, पर्योषित (= खोजा), और मनद्वारा अनुविचारित (पदार्थ) है, उसे भी (वह)—‘यह मेरा है, ‘ ‘यह मै हूं, ‘ ‘यह मेरा आत्मा है’—इस प्रकार समझता है। जो यह (छः) दृष्टि-स्थान हैं, ‘सो लोक है, सोई आत्मा हूँ, मैं मरकर सोई नित्य, धु्रव, शाश्वर, निर्विकार (= अविपरिणाम धर्मा) आत्मा होऊँगा, और अनन्त वर्षो (= शाश्वती समा) तक वैसे ही स्थित रहूँगा’—इसे भी ‘यह मेरा है, ‘ ‘यह मैं हूँ’, ‘यह मेरा आत्मा है’—इस प्रकार समझता है।

“भिक्षुओ! आर्यों के दर्शन से युक्त, आर्य धर्म से परिचित, आर्य धर्म में विनीत (= प्राप्त); सत्पुरूषों के दर्शन से युक्त, ॰ परिचित, ॰ विनीत, श्रुतवान् (= ज्ञानी) आर्य श्रावक—(1)रूप को—‘यह मेरा नहीं’, ‘यह मैं नहीं हूं’, यह मेरा आत्मा नहीं है, —इस प्रकार समझता है। (2) वेदना को ॰। (3) संज्ञा को ॰। (4) संस्कार को ॰। (5) विज्ञान को ॰। (6) जो कुछ भी यह देखा ॰। जो यह (छः) दृष्टि-स्थान है ॰ ‘यह मेरा आत्मा नहीं है’—इस प्रकार समझता है। वह इस प्रकार समझते हुये अशनि-त्रास (= भय) को नहीं प्राप्त होता।”

ऐसा कहने पर किसी भिक्षु ने भगवान् से यह कहा—“भन्ते! क्या बाहर अशनि-परि-त्रास है?”

भगवान् ने कहा—“होता है भिक्षु! यहाँ! भिक्षु! किसी को ऐसा होता है—‘अहो! (पहले) यह मेरा था’, ‘अहो! अब यह मेरा नहीं है’, ‘अहो! मेरा होवे’, ‘अहो! उसे मैं नहीं पाता हूँ’— (वह) इस प्रकार शोक करता है, दुःखित होता है, रोता है, छाती पीटकर क्रन्दन करता है, मूर्छित होता है। इस प्रकार भिक्षु! बाहर अशनि-परित्रास होता है।”

“किन्तु, भन्ते! क्या बाहर अशनि-अपरित्रास होता है?”

भगवान् ने कहा—“होता है भिक्षु! यहाँ भिक्षु! किसी (पुरूष) को ऐसा नहीं होता—‘अहो! (पहिले यह) मेरा था’, ॰ ‘अहो! उसे मैं नहीं पाता हूँ’—(वह) इस प्रकार शोक नहीं करता ॰ मूर्छित नहीं होता। इस प्रकार भिक्षु! बाहर अशनि का परित्रास नहीं होता।

“कैसे भन्ते! भीतर में अशनि-परित्रासन होता है?”

भगवान् ने कहा—“होता है भिक्षु! यहाँ भिक्षु! किसी की यह दृष्टि (= धारणा) होती है—‘सो लोक है, सोई आत्मा है; मैं मरकर सोई नित्य, धु्रव, शाश्वत, निर्विकार होऊँगा; और अनन्त वर्षांे तक वैसे ही स्थित रहूँगा।’ वह तथागत (= बुद्ध) तथागत-श्रावक (= ॰-शिष्य) को सारे ही दृष्टि-स्थानों, (दृष्टियों के) अधिष्ठान (= रहने के स्थान), पर्युत्थान (= उठने उपजने), अभिनिवेश (= आग्रह) और अनुशयो (= मलो) के विनाश के लिये सारे संस्कारो (= दिल के प्रभावो) के शमन करने के लिये; सारी उपाधियों के परित्याग के लिये; (और) तृष्णा के क्षय के लिये; विराग, निरोध (= राग आदि के नाश) और निर्वाण के लिये धर्म उपदेश करते सुनता है। उसको ऐसा होता है—अहो! मैं उच्छित होऊँगा, अहो! मैं नष्ट हो जाऊँगा; (हाय!) मैं नहीं रहूँगा!’— वह शोक करता है ॰ मूर्छित होता है। इस प्रकार भिक्षु! वह अशनि-परित्रास (= बिजली सा भय) होता है।

“कैसे भन्ते! (चित्त के) भीतर अशनिका-परित्रास नहीं होता?”

भगवान् ने कहा—“होता है भिक्षु! यहाँ भिक्षु! किसी की यह दृष्टि नहीं होती—‘सो लोक है ॰’ न मूर्छित होता है। इस प्रकार भिक्षु! वह अशनि का परित्रास नहीं होता।

“भिक्षुओ! उस परिग्रह (= ग्रहण करने की वस्तु) को परिग्र्रहण (= ग्रहण) करना चाहिये, जो परिग्रह कि नित्य, ध्रुव, शाश्वत, निर्विकार अनन्त वर्ष वैसाही (= एक समान) रहे। भिक्षुओ! देखते हो ऐसे परिग्र्रह को, जो कि ॰ अनन्त वर्ष तक वैसाही रहे?”

“नही भन्ते!”

“साधु, भिक्षुओ! मैं भी ऐसे परिग्रह को नहीं देखता, जो कि ॰ अनन्त वर्ष तक वैसा ही रहे। भिक्षुओ! उस आत्म-वाद (= आत्मा के सिद्धान्त)-स्वीकार को स्वीकारे, जिस आत्मवाद स्वीकार के स्वीकार ने (= सकारने) से शोक, परिदेव (= कलपकर रोना), दुःख=दौर्मनस्य, उपायास (= परेशानी) न उत्पन्न हों। भिक्षुओ! देखते हो, ऐसे आत्मवाद-स्वीकार को, जिस आत्मवाद के स्वीकार से शोक परिदेव ॰ न उत्पन्न हों।

“नही भन्ते!”

“साधु, भिक्षुओ! मैं भी ऐसे आत्मवाद-स्वीकार को नहीं देखता, जिस आत्मवाद-स्वीकार से शोक ॰ न उत्पन्न हों। भिक्षुओ! उस दृष्टि-निश्रय (= धारणा के विषय) का आश्रय लेना चाहिये; जिस दृष्टि-निश्रय के आश्रय लेने पर शोक ॰ न उत्पन्न हों। भिक्षुओ! देखते हो, ऐसे दृष्टि-निश्रय को, जिस ॰?”

“नही, भन्ते!”

“साधु, भिक्षुओ! मैं भी ऐसे दृष्टि-निश्रय को नहीं देखता ॰। भिक्षुओ! आत्मा के होने पर ‘(यह) मेरा आत्मीय है’—यह हो सकता है?”

“हाँ, भन्ते!”

“भिक्षुओ! आत्मीय होने पर, ‘(यह) मतेरा आत्मा (है)’—हो सकता है?”

“हाँ, भन्ते!”

“भिक्षुओ! आत्मा और आत्मीय के ही सत्यतःः=स्थिरतः उपलब्ध होने पर, जो यह दृष्टि-स्थान—‘सोई लोक है, सोई आत्मा हैं, मैं मरकर सोई नित्य ॰ अनन्त वर्षा तक वैसे ही स्थित रहूँगा।’ भिक्षुओ! क्या यह केवल पूरा बाल-धर्म (= बच्चों की सी बात) नहीं है?”

“क्यों नहीं? है भन्ते! केवल पूरा बाल-धर्म।”

“तो क्या मानते हो भिक्षुओ! रूप नित्य है या अनित्य?”

“अनित्य है, भन्ते!”

“जो अ-नित्य है वह दुःख (रूप) है या सुख (रूप)?”

“दुःख (रूप) है भन्ते!”

“जो अ-नित्य, दुःख (स्वरूप) और विपरिणाम-धर्मा (= परिवर्तनशील, विकारी) है, क्या उसके लिये ऐसा देखना—‘यह मेरा है’, ‘यह मैं हूँ’, ‘यह मेरा आत्मा है’—योग्य है?”

“नहीं, भन्ते!”

“तो क्या मानते हो भिक्षुओ! वेदना नित्य है या अनित्य?”

“अ-नित्य है, भन्ते!” ॰।

“॰ संज्ञा ॰, ॰ संस्कार ॰, ॰ विज्ञान नित्य है या अ-नित्य?”

“अ-नित्य है, भन्ते!”

“जो अ-नित्य, दुःख, और विपरिणाम-धर्मा है, क्या उसके लिये ऐसा देखना —॰ ‘यह मेरा है’ ॰—योग्य है?”

“नहीं, भन्ते!”

“इसलिये भिक्षुओ! भीतर (शरीर में) या बाहर, स्थूल या सूक्ष्म, उत्तम या निकृष्ट, दूर या नज़दीक, जो कुछठ भी भूत भविष्य वर्तमान का रूप है, वह सब—‘यह मेरा नहीं है’, ‘यह मैं नहीं हूँ, ‘यह मेरा आत्मा नहीं है’, —ऐसे ही यथार्थतः ठीक से जानकर देखना चाहिये। ॰ जो कुछ भी ॰ वेदना है ॰। ॰ जो कुछ भी ॰ संज्ञा है ॰। ॰ जो कुछ भी ॰ संस्कार है ॰। ॰ जो कुछ भी ॰ विज्ञान है, वह सब—‘यह (= विज्ञान) मेरा नहीं है’, ‘यह मैं नहीं हूँ’, ‘यह मेरा आत्मा नहीं है’—॰ जानकर देखना चाहिये।

पेज नं. 125 पुरी तरह से खराब है। अपठनीय है। तुम्हें चोट, असन्तोष, चित्त-विकार नहीं आने देना चाहिये। और इसलिये भिक्षुओ! यदि दूसरे तुम्हारा सत्कार ॰ करें, तो उसके लिये तुम्हें आनन्द ॰ नहीं करना चाहिये। अतः भिक्षुओ! यदि दूसरे तुम्हारा सत्कार ॰ करें, तो उसके लिये तुम्हें भी ऐसा होना चाहिये—जो पहिले त्याग दिया है, उसी के विषय मंे इस प्रकार के कार्य किये जा रहे हैं।

“इसलिये भिक्षुओ! जो तुम्हारा नहीं है, उसे छोडो, उसका छोडना चिरकाल तक तुम्हारे हित सुख के लिये होगा। भिक्षुओ! क्या तुम्हारा नहीं है?—रूप भिक्षुओ! तुम्हारा नहीं है; उसे छोडो, उसका छोडना चिरकाल तक तुम्हारे हित सुख के लिये होगा। ॰ वेदना ॰। ॰ संज्ञा ॰। ॰ संस्कार ॰। ॰ विज्ञान ॰। तो क्या मानते हो भिक्षुओ! इस जेतवन में जो तृण, काष्ट, शाखा, पत्र हे; उसे (कोई) आदमी अपहरण करे, जलाये या (अपनी) इच्छानुसार (जो चाहे सो) करे, तो क्या तुम्हें ऐसा होना चाहिये—हमारी (चीज़) को (यह) आदमी अपहरण ॰ कर रहा है?”

“नहीें, भन्ते!”

“सो किस हेतु?”

“भन्ते! वह हमारा आत्मा या आत्मीय नहीं है।”

“ऐसे ही भिक्षुओ! जो तुम्हारा नहीं है, उसे छोडो, ॰ उसका छोडना, चिरकाल तक तुम्हारे हित-सुख के लिये होगा। भिक्षुओ! क्या तुम्हारा नहीं है?—रूप ॰। ॰ वेदना ॰। ॰ संज्ञा ॰। ॰ संस्कार ॰। ॰ विज्ञान ॰।

“भिक्षुओ! इस प्रकार मैंने धर्म का उत्तान=विवृत=प्रकाशित, आवरण रहित (= छिन्नविलोतिक) (करके) अच्छी तरह व्याख्यान किया (= स्वाख्यात) है। ऐसे ॰ स्वाख्यात धर्म मे, उन भिक्षुओ के लिये कुछ उपदेश करने की ज़रूरत नहीं है, जो कि (1) अर्हत्, क्षीणास्त्रव (= राम आदि मल जिनके नष्ट हो गये हैं), ब्रह्मचर्यवास पूरा कर चुके, कृतकरणीय, भारमुक्त, सच्चे अर्थ को प्राप्त, परिक्षीण-भव-संयोजन (= जिनके भवसागर में डालने वाले बंधन नष्ट हो गये हैं), सम्यगज्ञाविमुक्त (= यथार्थ ज्ञान से जिनकी मुक्ति हो गई है) हैं। (2) भिक्षुओ! ऐसे ॰ स्वाख्यात धर्म में जिन भिक्षुओं के पाँच अवरभागीय संयोजन नष्ट हो गये हैं, वह सभी औपपातिक (= अयोनिज, देव) हो वहाँ (देवलोक में) जा परिनिर्वाण को प्राप्त होने वाले हैं, (वह) उस लोक से लौटकर नहीं आने वाले (= अनावृत्तिधर्मा=अनागामी) हैं, (3) भिक्षुओ! ऐसे ॰ स्वाख्यात धर्म में जिन भिक्षुओ के तीन संयोजन नष्ट हो गये हैं, राग-द्वेष-मोह निर्बल (= तनु) हो गये हैं, वह सारे सकृदागामी=सकृद् (= एक बार) ही इस लोक में आकर दुःख का अन्त करेंगे।..(4) भिक्षुओ! ऐसे स्वाख्यात धर्म में जिन भिक्षुओ के तीन संयोजन नष्ट हो गये, वह सारे न पतित होने वाले संबोधि (= बुद्ध के ज्ञान)-परायण स्रोत-अपन्न (= निर्वाण की ओर ले जाने वाले प्रवाह में स्थिर रीति से आरूढ़) हैं।…। भिक्षुओ! ऐसे ॰ स्वाख्यात धर्म में जो भिक्षु श्रद्धानुसारी, धर्मानुसारी है, वह सभी संबोधि-परायण है। इस प्रकार मैने धर्म का ॰ अच्छी तरह व्याख्यान किया है। ऐसे ॰ स्वाख्यात धर्म में जिनकी मेरे विषय में श्रद्धा मात्र पे्रम मात्र (भी) है, वह सभी स्वर्ग-परायण (= स्वर्गगामी) हैं।”

भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो उन भिक्षुओ ने भगवान् के भाषण का अभिनन्दन किया।