मज्झिम निकाय

26. पास-रासि

ऐसा मैंने सुना—

एक समय भगवान् श्रावस्ती में अनाथ-पिंडिक के आराम जेतवन में विहार करते थे। भगवान् पूर्वाह्न के समय पहिनकर, पात्र चीवर ले श्रावस्ती में पिंड (= भिक्षाचार) के लिये प्रविष्ट हुये। तब बहुत से भिक्षु…आयुष्मान् आनन्द के पास…जाकर…बोले—

“आवुस आनन्द! भगवान् के मुख से धर्मोपदेश सुने देर हो गई। अच्छा हो आवुस आनन्द! हमे भगवान् के मुख से धर्मोपदेश सुनने को मिले।”

“तो आयुष्मानों! जहाँ रम्यक (= रम्मक) ब्राह्मण का आश्रम है, वहाँ चलें, शायद भगवान् के मुख से धर्मोपदेश सुनने को मिले।”

“अच्छा, आवुस!” (कह) उन भिक्षुओं ने आयुष्मान् आनन्द को उत्तर दिया।

तब भगवान् ने श्रावस्ती में पिंडचार कर, भोजनोपरान्त पिंडपात से निबटकर आयुष्मान् आनन्द को संबोधित किया।—

“चलो, आनन्द! दिन के विहार के लिये (वहाँ चलें) जहाँ, मृगारमाता (= मिगारमाता=विशाखा) का प्रासाद पूर्वाराम है।”

“अच्छा, भन्ते!” (कह) आयुष्मान् आनन्द ने भगवान् को उत्तर दिया।

तब भगवान् आयुष्मान् आनन्द के साथ दिन के विहार के लिये मृगारमाता के प्रासाद पूर्वाराम…गये। तब भगवान् ने सायंकाल प्रतिसँल्लयन (= एकान्त चिन्तन, भावना) से उठ आयुष्मान् आनन्द को संबोधित किया—

“चलो, आनन्द! गात्र-परिसिचन (= नहाने) के लिये जहाँ पूर्वकोष्ठक है, वहाँ (चलें)।”

“अच्छा, भन्ते!” (कह) आयुष्मान् आनन्द ने भगवान् को उत्तर दिया।

तब भगवान् आयुष्मान् आनन्द के साथ…पूर्वकोष्टक गये। पूर्व कोष्ठक में गात्र-परिसिचन कर, निकल कर शरीर को सुखाते एक चीवर धारण किये खड़े हुये। तब आयुष्मान् आनन्द ने भगवान् से यह कहा—

“भन्ते! यह पास में रम्यक ब्राह्मण का आश्रम है। भन्ते! रम्यक ब्राह्मण का आश्रम रमणीय है= ॰ प्रसादनीय है। अच्छा हो भन्ते! यदि भगवान् कृपाकर जहाँ रम्यक ब्राह्मण का आश्रम है (वहाँ) चलें।”

भगवानृ ने मौन रह स्वीकृत दी। तब भगवान् जहाँ रम्यक ब्राह्मण का आश्रम था, (वहाँ) गये। उस समय बहुत से भिक्षु रम्यक ब्राह्मण के आश्रम में धर्मकथा कहते बैठे थे। भगवान् कथा की समाप्ति की प्रतीक्षा करते बाहर वाले द्वारकोष्ठक (= फाटक) पर ठहरे। तब भगवान् ने कथा की समाप्ति जानकार खाँसकर जंजीर (= अर्गल) खटखटाई। उन भिक्षुओं ने भगवान् के लिये द्वार खोल दिया। भगवान् रम्यक ब्राह्मण के आश्रम में प्रविष्ट हो बिछे आसन पर बैठे। बैठकर भगवान् ने भिक्षुओं को सम्बोधित किया—

“भिक्षुओं! किस कथा को लेकर तुम बैठे थे, क्या तुम्हारे बीच में कथा उठी थी?”

“भन्ते! भगवान् के सम्बन्ध ही धार्मिक-कथा लेकर हम बैठे थे, भगवान् के विषय की कथा ही हमारे बीच में उठी थी। इतने में भगवान् पहूँच गये।”

“साधु, भिक्षुओ! भिक्षुओ! श्रद्धापूर्वक घर से बेघर हो प्रब्रजित हुये तुम कुल-पुत्रों के लिये यही उचित है, कि तुम धार्मिक-कथा में बैठो। एकत्रित होने पर भिक्षुओ! तुम्हारे लिये दो ही कर्तव्य है—(1) धार्मिक कथा, या (2) आर्य तूष्णीभाव (= उत्तम मौन)।

“भिक्षुओं! दो प्रकार की पर्येषणा (= खोज, गवेषणा) हैं—(1) आर्य (= उत्तम, ज्ञानियों की) पर्येषणा, और (2) अनार्य पर्येषणा। क्या है भिक्षुओ! अनार्य पर्येषणा?—भिक्षुओ! कोई (पुरूष) स्वयं जाति-धर्मा (= जन्म ने स्वभाव वाला) होते जाति धर्म का ही पर्येषण (= खोज) करता है। स्वयं जराधर्मा (= बूढा होना जिसका स्वभाव है) होते, जराधर्म का ही पर्येषण करता है। स्वयं व्याधिधर्मा ॰। स्वयं मरण-धर्मा ॰। स्वयं शोक-धर्मा ॰। स्वयं संक्लेश (= मल)-धर्मा संक्लेश धर्म का ही पर्येषण करता है।

“भिक्षुओ! किसी जातिधर्मा कहे?—पुत्र, भार्या भिक्षुओ! जातिधर्मा हैं; दासी, दास जातिधर्मा हैं; भेड़-बकरी जातिधर्मा हैं; मुर्गी-सुअर (= कुक्कुट-शुकर) ॰; हाथी, गाय, घोडा-घोडी ॰; सोना-चाँदी। भिक्षुओ! यह उपधियाँ (= भोग-पदार्थ) जातिधर्मा हैं, इनमें यह (पुरूष) ग्रथित, मूर्छित, आसक्त हो, स्वयं जातिधर्मा हो दूसरे जाति-धर्मा (पदार्थो) की पर्येषणा करता है।

“भिक्षुओ! किसको जराधर्मा कहे?—पुत्र, भार्या ॰ जराधर्मा (पदार्थो) की पर्येषणा करता है।

“॰ व्याधि-धर्मा ॰ ? ॰।

“॰ मरण-धर्मा ॰ ? ॰।

“॰ शोक-धर्मा ॰ ? ॰।

“॰ संक्लेश-धर्मा ॰ ? ॰।

“भिक्षुओ! क्या है आर्य पर्येषणा?—भिक्षुओ! कोई (पुरूष) स्वयं जातिधर्मा होते, जातिधर्म में दुष्परिणाम देख, अ-जात (जन्म-रहित), अनुत्तर (= सर्वोत्तम), योग-क्षेम (= मंगलमय) निर्वाण की पर्येषणा करता है। स्वयं जराधर्मा, जराधर्म में दुष्परिणाम देख, अ-जर (= जरारहित) अनुत्तर, योग-क्षेम, निर्वाण की पर्येषणा करता है। स्वयं व्याधिधर्मा ॰ व्याधि-रहित ा॰ स्वयं मरण-धर्मा ॰ अ-मृत ॰ स्वयं शोक-धर्मा ॰ अ-शोक ॰। स्वयं सक्लेश-धर्मा ॰ अ-संक्लिष्ट (= मलरहित) अनुत्तर, योगक्षेम, निर्वाण की पर्येषण करता है। भिक्षुओ! यह है आर्य पर्येषणा।

“मैं भी भिक्षुओ! सम्बोध (= बुद्ध-पद-प्राप्ति) से पूर्व, अ-संबुद्ध बोधिसत्व (= बुद्ध-पद का उम्मेदवार) होते समय, स्वयं जातिधर्मा होते जाति-धर्मा (पदार्थो) की ही पर्येषणा करता था ॰। जराधर्मा ॰। ॰ व्याधि-धर्मा ॰। ॰ मरणधर्मा ॰। ॰ शोकधर्मा ॰। ॰ संक्लेश-धर्मा ॰। तब मुझे…ऐसा हुआ—‘क्या मैं जाति-धर्मा होते जाति-धर्मा (पदार्थो) की पर्येषणा करता हूँ? ॰ ॰ संक्लेशधर्मा ॰? क्यों न मैं स्वयं जाति-धर्मा होते जातिधर्मा (पदार्थो) में दुष्परिणाम देख, अ-जात, अनुत्तर, योगक्षेम, निर्वाण की पर्येषणा करूँ? ॰ ॰ क्यों न मैं स्वयं संक्लेश-धर्मा होते, संक्लेश-धर्मा (पदार्थो) में दुष्परिणाम देख, अ-संक्लिष्ट (= निर्मल), अनुत्तर, योगक्षेम, निर्वाण की पर्येषणा करूँ?

“तब मैं भिक्षुओ! दूसरे समय तरूण, अत्यन्त काले केशोवाला, भद्र (= सुन्दर) यौवन से युक्त, पहिले वयस् में अनिच्छुक माता-पिता को अश्रुमुख रोते (छोड), केश श्मश्रु (= दाढी-मूँछ) मुँडा, काषाय वस्त्र पहिन घर से बेघर वन प्रब्रजित (= संन्यासी) हुआ। सो इस प्रकार प्रब्रजित हो किंकुशल (= क्या उत्तम है) की गवेषणा करते, उत्तम शान्ति-पद को खोजते (= पर्येषणा करते) जहाँ आलार कालाम रहते थे, वहाँ पहूँचा। पहूँचकर आलार कालाम से यह बोला—‘आवुस कालाम! इस (तुम्हारे) धर्म-विनय (= धर्म) में ब्रह्मचर्यवास करना चाहता हूँ’। ऐसा कहने पर भिक्षुओ! आलार कालाम ने मुझे यह कहा—‘विहरो आयुष्मान्! यह ऐसा धर्म-विनय है, (जहाँ) विज्ञ-पुरूष न चिर में अपने आचार्यक (= विशेषज्ञता) को स्वयं जानकर साक्षात्कर प्राप्तकर विहरेगा’। सो मैंने भिक्षुओ! न चिर में ही=क्षिप्रही उस धर्म (= अभ्यास) को पूरा कर लिया। सो मै भिक्षुओ! उतने मात्र से ओठ लगे मात्र से, कहने-कहाने मात्र से ज्ञानवाद भी झाडता था; ‘मैं स्थविर (= वुद्धों के) वाद को जानता देखता (= बूझता) हूँ’—दावा करता था, और दूसरे भी। तब भिक्षुओ! मुझे ऐसा हुआ—आलार कालाम ‘श्रद्धा मात्र से मैं इस धर्म को स्वयं जानकर, साक्षात्कर, प्राप्तकर, विहरता हूँ’—यह नहीं जतलाता। जरूर आलार कालाम इस धर्म को जानकर देखकर विहरता है। तब मैने भिक्षुओ! ..आलार कालाम के पास जाकर यह कहा—‘आवुस कालाम! कितना तक इस धर्म को स्वयं जानकरी साक्षात्कर, प्राप्तकर हमें बतलाते हो?’ ऐसा कहने पर भिक्षुओ! आलार कालाम ने आकिंचन्यायतन बतलाया।

“तब भिक्षुओ! मुझे ऐसा हुआ—‘आलार कालाम के पास ही श्रद्धा नहीं है, मेरे पास भी श्रद्धा है। आलार कालाम के पास ही वीर्य (= उद्योग) नहीं है, मेरे पास भी वीर्य है। ॰ स्मृति ॰। ॰ समाधि ॰। ॰ प्रज्ञा ॰। क्यों न मैं, जिस धर्म को—‘आलार कालाम स्वयं तब मैं भिक्षुओ! न चिर मे=क्षिप्र ही उस धर्म को स्वयं जान, साक्षात् कर, प्राप्तकर विहरने लगा। तब मैं भिक्षुओ! आलार कालाम के पास जाकर…यह बोला—‘आवुस कालाम! इतने ही मात्र इस धर्म को स्वयं जान, साक्षात् कर, प्राप्तकर हमे बतलाते हो?”

“इतने ही स्रात्र आवुस! मै इस धर्म को स्वयं जानकर, साक्षात्कर, प्राप्तकर बतलाता हूँ।”

“मैं भी आवुस! इतने मात्र इस धर्म को स्वयं जानकर ॰ विहरता हूँ।”

“लाभ है हमें आवुस! सुन्दर लाभ हुआ हमें आवुस! जो हम आप जैसे सब्रह्मचारी को देखते है, (जो कि) जिस धर्म को मैं स्वयं जानकर ॰ बतलाता हूँ, उस धर्म को तुम स्वयं जानकर ॰ विहरते हो। जिस धर्म को तुम स्वयं जानकर ॰ विहरते हो, उस धर्म को मैं स्वयं जानकर ॰ बतलाता (= उपदेशता) हूँ। जिस धर्म को मैं जानता हूूँ, उस धर्म को तुम जानते हो। जिस धर्म को तुम जानते हो, उस धर्म को मैं जानता हूँ। इस प्रकार जैसे तुम, तैसा मैं, । जैसा मैं वैसे तुम। आओ अब आवुस! (हम) दोनों इस गण (= सन्यासियों की जमायत) को धारण करें।”

“इस प्रकार भिक्षुओ! आलार कालाम ने आचार्य होते भी मुझ अन्तेवासी (= शिष्य) को समसमान (पद) पर स्थापित किया। बड़े सन्मान से सन्मानित किया। तब भिक्षुओ! मुझे ऐसा हुआ—‘यह धर्म न निर्वेद (= उदासीनता) के लिये (है), न विराग के लिये, न निरोध के लिये, न उपशम के लिये, न अभिज्ञा (= दिव्य ज्ञान) के लिये, न संबोध के लिये, न निर्वाण के लिये है, केवल आकिंचन्य-आयतन (= दिव्य स्थान) में उत्पन्न होने के लिये है।’ तब मैं उस धर्म को अपर्याप्त (समझ) कर, उस धर्म से विरक्त हो चल दिया।

“सो मैं भिक्षुओ! किकुशल-गवेषी, अनुत्तर शंाति के श्रेष्ठ पद को खोजते जहाँ उद्रक (= उद्दक) रामपुत्र था, वहाँ गया। जाकर उद्रक रामपुत्र से बोला—

“आवुस राम! इस धर्म-विनय में मैं ब्रह्मचर्य-वास करना चाहता हूँ।”

“ऐसा करने पर भिक्षुओ! उद्रक रामपुत्र ने मुझे यह कहा—‘विहरो आयुष्मान्! यह ऐसा धर्म-विनय है, जिसमें विज्ञ पुरूष न-चिर में अपने आचार्यक (= विशेषज्ञता) को स्वयं जानकर, साक्षात् कर, प्राप्त कर विहरेगा”। ॰। तब मैंने भिक्षुओ! ..उद्रक रामपुत्र.. के पास जाकर यह कहा—‘आवुस राम! कितने तक इस धर्म को स्वयं जानकर ॰ हमे बतलाते हो?’ ऐसा कहने पर भिक्षुओ! उद्रक रामपुत्र ने नैवसंज्ञा-नाऽसंज्ञा-आयतन बतलाया।

“तब भिक्षुओ! मुझे ऐसा हुआ—‘उद्रक रामपुत्र के पास ही श्रद्धा नहीं है, मेरे पास भी श्रद्धा है। ॰ वीर्य ॰। ॰ स्मृति ॰। ॰ समाधि ॰। ॰ प्रज्ञा ॰। क्यों न मैं ॰। तब मैं उद्रक रामपुत्र के पास जाकर बोला—

“आवुस राम! इतने ही मात्र इस धर्म को स्वयं जानकर ॰ हमें बतलाते हो?”

“इतना ही मात्र आवुस! मैं इस धर्म को स्वयं जानकर ॰ बतलाता हूँ।”

“मैं भी आवुस! ॰ लाभ है आवुस! ॰। इस प्रकार जिस धर्म को मैं स्वयं जानकर ॰ बतलाता हूँ; उस धर्म को तुम स्वयं जानकर ॰ विहरते हो। जिस धर्म को तुम स्वयं जानकर ॰ विहरते हो, उसे राम स्वयं जानकर ॰ बतलाता है ॰। इस प्रकार जैसा राम है, वैसे तुम हो, जैसे तुम (हो) तैसा राम है। ॰ आओ आवुस! हम दोनो इस गण (= भिक्षुओ की जमायत) को धारण करें।”

“इस प्रकार भिक्षुओ! सब्रह्मचारी हाते भी, ..मुझे आचार्य के पद पर स्थापित किया, (और) बड़े सन्मान से सन्मानित किया। तब भिक्षुओ मुझे ऐसा हुआ—‘यह धर्म न निर्वेदके लिये है ॰। सो मैं भिक्षुओ! उस धर्म को अपर्याप्त (समझ) कर, उस धर्म से विरक्त हो चल दिया।

“सो मै भिक्षुओ! किकुशल-गवेषी ॰ शांति के श्रेष्ठ पद को खोजते, मगध में क्रमशः चारिका (= रामत) करते जहाँ उरूवेला सेनानी निगम था वहाँ पहूँचा। वहाँ मैने एक रमणीय=प्रासादिक भूमि-भाग में, वन खंड में एक नदी को बहते देखा जिसका घाट, रमणीय और श्वेत था। चारों ओर फिरने के लिये गाँव थे। वहाँ मुझे यह हुआ—यह भूमि-भाग रमणीय है। यह वनखंड प्रासादिक है। श्वेत, सुन्दर घाटवाली रमणीय नदी बह रही है। चारों ओर फिरने के लिये गाँव हैं। परमार्थ मंे उद्योगी कुलपुत्र के लिये ध्यान-रत होने के वास्ते यह बहुत उपयोगी है। तब मैं, भिक्षुओ!—यही ध्यान योग्य स्थान है (सोच) वहाँ बैठ गया। सो भिक्षुओ! स्वयं जन्म ने के स्वभाव वाले मैंने जन्म ने दुष्परिणाम को जानकर अजन्मा, अनुपम, योगक्षेम निर्वाण को खोजता अजन्मा, अनुपम, योगक्षेम निर्वाण को पा लिया। स्वयं जरा-धर्म वाला होते मैंने जरा-धर्म के दुष्परिणाम को जानकर जरा-रहित, अनुपम, योगक्षेम निर्वाण को खोज अजर, अनुपम, योगक्षेम निर्वाण पा लिया। स्वयं व्याधि-धर्मा ॰ व्याधि धर्म-रहित ॰ स्वयं मरण-धर्मा ॰ अमर ॰। स्वयं शोकधर्म-वाला ॰ शोक रहित ॰। स्वयं संक्लेश (= मल)-युक्त ॰ संक्लेश रहित ॰। मेरा ज्ञान, दर्शन (= साक्षात्कार) बन गया, मेरे चित्त की मुक्ति अचल हो गई; यह अन्तिम जन्म है, फिर अब (दूसरा) जन्म नहीं (होगा)।

“तब भिक्षुओ! मुझे ऐसा हुआ—

“मैंने गंभीर, दुर्दर्शन, दुर्-ज्ञेय, शांत, उत्तम, तर्क से अप्राप्य, निपुण, पण्डितों द्वारा जानने योग्य, इस धर्म को पा लिया। यह जनता काम-तृष्णा (= आलय) में रमण करने वाली, काम-रत, काम में प्रसन्न है। काम में रमण करने वाली इस जनता के लिये, यह जो कार्य-कारण रूपी प्रतीत्य-समुत्पाद है, वह दुर्दर्शनीय है। और यह भी दुर्दर्शनीय हैं, जो कि यह सभी संस्कारों का शमन, सभी मन्त्रों का परित्याग, तृष्णा-क्षय, विराग, निरोध (= दुःख-निरोध), और निर्वाण हैं। मैं यदि धर्मोपदेश भी करूँ और दूसरे उसको न समझ पावें, तो मेरे लिये यह तरद्दुद और पीड़ा (मात्र) होगी।

“उसी समय मुझे पहिले कभी न सुनी यह अद्भूत गाथायें सुझ पडीं—

‘यह धर्म पाया कष्ट से, इसका न युक्त प्रकाशना।
नहिं राग-द्वेष-प्रलिप्त को है सुकर इसका जानना।।
गंभीर उल्टी-धार-युत दुर्दृश्य सूक्ष्म प्रवीणका।
तम-पुंज-छादित रागरतद्वारा न संभव देखना।।’

“मेरे ऐसा समझने के कारण, मेरा चित्त धर्म प्रचार की ओर न झुक अल्पउत्सुकता की ओर झुक गया। तब सहापति ब्रह्मा ने मेरे चित्त की बात को जानकर ख्याल किया—‘लोक नाश हो जायेगा रे! लाक विनाश हो जायेगा रे! जब तथागत अर्हत् सम्यक् संबुद्ध का चित्त धर्म-प्रचार की ओर न झुक, अल्प-उत्सुकता (= उदासीनता) की ओर झुक जाये’ (ऐस ख्यालकर) सहापति ब्रह्मा, जैसे बलवान् पुरूष (बिना परिश्रम) फैली बाँह को समेट ले, समेटी बाँह को फैला दे, ऐसे ही ब्रह्मलोक से अन्तर्धान हो, मेरे सामने प्रकट हुआ। फिर सहापति ब्रह्मा ने उपरना (= चद्दर) एक कंधे पर करके, दाहिने जानु को पृथिवी पर रख, जिधर मैं था उधर हाथ जोड, कहा—‘भन्ते! भगवान् धर्मोपदेश करें, सुगत! धर्मोपदेश करें। अल्प मल वाले प्राणी भी हैं, धर्म के न सुनने से वह नष्ट हो जायेंगे। (उपदेश करें) धर्म को सुनने वाले (भी होवेंगे)’। सहापति ब्रह्मा ने यह कहा, और यह कहकर यह भी कहा—

‘मगध में मलिन चित्तवालो से चिन्तित, पहिले अशुद्ध धर्म पैदा हुआ। अमृत के द्वार को खोलने वाले विमल (पुरूष) द्वारा जाने गये इस धर्म को (अब लोक) सुने। पथरीले पर्वत के शिखर पर खडा (पुरूष) जैसे चारो ओर जनता को देखे। उसी तरह हे सुमेघ! हे सर्वत्र नेत्र वाले! धर्मरूपी महल पर चढ सब जनता को देखो। हे शोक-रहित! शोक-निमग्न जन्म-जरा से पीडित जनता की ओर देखो। उठो वीर! हे संग्रामजित्! हे सार्थवाह! उऋण-ऋण! जग में विचरो! धर्मप्रचार करो! भगवान्! जानने वाले मिलेंगे।’

“तब मैंने ब्रह्मा के अभिप्राय को जानकर, और प्राणियो पर दया करके, युद्ध-नेत्र से लोक का अवलोकन किया। बुद्ध-चक्षु से लोक को देखते हुये मैंने जीवों को देखा, उनमें कितने ही अल्प-मल, तीक्ष्ण-बुद्धि, सुन्दर-स्वभाव, समझाने में सुगम, प्राणियों को भी देखा। उनमें कोई कोई परलोक और दोष से भय करते, विहर रहे थे। जैसे उत्पलिनी, पद्मिनी (= पद्मसमुदाय) या पंुडरीकिनी में से कितने ही उत्पल, पद्म या पुंडरी उदक में पैदा हुये उदक में बँधे उदक से बाहर न निकल (उदक के) भीतर ही डूबकर पोषित होते हैं। कोई कोई उत्पल (= नीलकमल), पद्म (= रक्तकमल) या पुंडरीक (= श्वेतकमल) उदक में उत्पन्न, उदक में बँधे (भी) उदक के बराबर ही खड़े होते हैं। कोई कोई उत्पल, पद्म या पुंडरीक उदक में उत्पन्न, उदक में बँधे (भी), उदक से बहुत ऊपर निकलकर, उदक से अलिप्त (हो) खड़े होते है। इसी तरह भगवान् ने बुद्धचक्षु से लोक को देखते हुये—अल्पमल, तीक्ष्णबुद्धि, सुस्वभाव, सुबोध्य प्रणियों को देखा; जो परलोक तथा बुराई से भय खाते विहर रहे थे। देखकर सहापति ब्रह्मा से गाथा द्वारा कहा—

‘उनके लिये अमृत का द्वार बंद हो गया है, जो कान वाले होने पर भी, श्रद्धा को छोड़ देते है। हे ब्रह्मा! (वृथा) पीडा का ख्यालकर मैं मनुष्यों को निपुण, उत्तम, धर्म को नहीं कहता था।’

“तब ब्रह्मा सहापति—‘भगवान् ने धर्मोपदेश के लिये मेरी बात मान ली’ यह जान, मुझको अभिवादन कर प्रदक्षिणाकर वहीं अन्तर्धान हो गया। उस समय मेरे (मन में) हुआ—‘मैं पहिले किसे इस धर्म की देशना (= उपदेश) करूँ; इस धर्म को शीघ्र कौन जानेगा?’ फिर मेरे (मन में) हुआ—‘यह आलार-कालाम पण्डित, चतुर, मेधावी चिरकाल से अल्प-मलिन-चित्त है; मैं पहिले क्यों न आलार-कालाम को ही धर्मोपदेश करूँ? वह इस धर्म को शीघ्र ही जान लेगा।’ तब (गुप्त) देवता ने मुझसे कहा—‘भन्ते! आलार-कालाम को मरे सप्ताह हो गया।’ मुझको भी ज्ञान-दर्शन हुआ—‘आलार कालाम को मरे सप्ताह हो गया।’ तब मेरे (मन में) हुआ—‘आलार कालाम महा आजानीय था, यदि वह इस धर्म को सुनता, तो शीघ्र ही जान लेता।’ फिर मेरे (मन में) हुआ—‘यह उद्दक-रामपुत्र पण्डित, चतुर, मेधावी, चिरकाल से अल्प-मलिन चित्त है, क्यों न मैं पहिले उद्दक रामपुत्र को ही धर्मोपदेश करूँ? वह इस धर्म को शीघ्र ही जान लेगा।’ तब (गुप्त=अन्तर्धान) देवता ने आकर कहा—‘भन्ते! रात ही उद्दक रामपुत्र मर गया। मुझको भी ज्ञान-दर्शन हुआ।…। फिर मेरे (मन में) हुआ—‘पंचवर्गीय भिक्षु मेरे बहुत काम करने वाले थे, उन्होंने साधना में लगे मेरी सेवा की थी। क्यों न मैं पहिले पंचवर्गीय भिक्षुओं को ही धर्मोपदेश करूँ।’ मैने सोचा—‘इस समय पंचवर्गीय भिक्षु कहाँ विहर रहे है?” मैने अ-मानुष विशुद्ध दिव्य चक्षु से देखा—“पंचवर्गीय भिक्षु वाराणसी के ऋषिपतन मृग-दाव में विहार कर हरे है।’

“तब मैं उरूबेला में इच्छानुसार विहारकर, जिधर वाराणसी है, उधर चारिका (= रामत) के लिये निकल पडा। उपक आजीवक ने देखा—मै बोधि (= बोधगया) और गया के बीच में जा रहा हूँ। देखकर मुझसे बोला—“आयुष्मान् (आवुस)! तेरी इन्द्रियाँ प्रसन्न हैं, तेरा छविवर्ण (= कांति) परिशुद्ध तथा उज्वल है। किसको (गुरू) मानकर हे आवुस! तु प्रब्रजित हुआ है? तेरा शास्ता (= गुरू) कौन? तू किसके धर्म को मानता है? ‘यह कहने पर मैंने उपक आजीवक से गाथा में कहा—

‘मैं सबको पराजित करने वाला, सबका जानने वाला हूँ; सभी धर्मो में निर्लेप हूँ। सर्वत्यागी (हूँ), तृष्णा के क्षय से विमुक्त हूँ; मैं अपने ही जानकर उपदेश करूँगा।

मेरा आचार्य नहीं है मेरे सदृश (कोई) विद्यमान नहीं।
देवताओं सहित (सारे) लोक में मेरे समान पुरूष नहीं।

मैं संसार में अर्हत् हूँ, अपूर्व शास्ता (= गुरू) हूँ।
मैं एक सम्यक् संबुद्ध, शीतल तथा निर्वाणप्राप्त हूँ।
धर्म का चक्का घुमाने के लिये काशियों के नगर को जा रहा हूँ।
(वहाँ) अन्धे हुये लोक में अमत-दुन्दुभी बजाऊँगा।।’

‘आयुष्मन्! तू जैसा दावा करता है, उससे तो अनन्त जिन हो सकता है।’

‘मेरे ऐसे ही सत्व जिन होते हैं, जिनके कि आस्रव (= क्लेश=मल) नष्ट हो गये हैं।

मैने पाप (= बुरे)-धर्मो को जीत लिया है, इसलिये हे उपक! मैं जिन हूँ।’ ऐसा कहने पर उपक आजीवक—‘होवोगे आवुस!’ कह, शिर हिला, बेरास्ते चल दिया। “तब मैं, भिक्षुओ! क्रमशः यात्रा (= चारिका) करते हुए, जहाँ वाराणसी ऋषि-पतन मृग-दाव था, जहाँ पंचवर्गीय भिक्षु थे, वहाँ पहूँचा। दूर से आते हुये मुझे पंचवर्गीय भिक्षुओ ने देखा। देखते ही आपस में पक्का किया—‘आवुसो! यह बाहुलिक (= बहुत जमा करने वाला) साधना-भ्रष्ट बाहुल्य-परायण (= जमा करने में लगा) श्रमण गौतम आ रहा है। इसे अभिवादन नहीं करना चाहिये, न प्रत्युत्थान (= सत्कारार्थ खडा होना) करना चाहिये। न इसके पात्र चीवर को (आगे बढ़कर) लेना चाहिये, केवल आसन रख देना चाहिये, यदि इच्छा होगी तो बैठेगा।’

“जैसे जैसे मैं पंचवर्गीय भिक्षुओं के समीप आता गया, वैसे ही वैसे वह…अपनी प्रतिज्ञा पर स्थिर न रह सके। (अन्त में) मेरे पास आ, एक ने मेरे पात्र चीवर लिये, एक ने आसन बिछाया; एक ने पादोदक (= पैर धाने का जल) पादपीठ (= पैर का पीढ़), पादकठलिका (पैर रगडने की लकडी) ला पास रक्खी। मैं बिछाये आसन पर बैठा। बैठकर मैंने पैर धोये। वह मेरे लिये ‘आवुस’ शब्द का प्रयोग करते थे। ऐसा करने पर मैंने कहा—‘नहीं भिक्षुओ! तथागत को नाम लेकर या ‘आवुस’ कहकर मत पुकारो। भिक्षुओ! तथागत अर्हत् सम्यक्-सम्बुद्ध है। इधर कान दो, मैंने जिस अमृत को पाया है, उसका तुम्हें उपदेश करता हूँ। उपदेशानुसार आचरण करने पर, जिसके लिये कुलपुत्र घर से बेघर हो संन्यासी होते हैं, उस अनुत्तम ब्रह्मचर्य फल को, इसी जन्म में शीघ्र ही स्वयं जान कर=साक्षात्कार कर=लाभ कर विचरोगे।’

“ऐसा कहने पर पंचवर्गीय भिक्षुओं ने मुझे कहा—‘आवुस गौतम! उस साधना में, उस धारणा में, उस दुष्कर तपस्या में भी तुम आर्यो के ज्ञानदर्शन की पराकाष्ठा की विशेषता, उत्तर-मनुष्य-धर्म (= दिव्य शक्ति) को नहीं पा सके; फिर अब बाहुलिक साधना-भ्रष्ट, बाहुल्य परायण तुम आर्य-ज्ञान-दर्शन की पराकाष्ठा, उत्तर-मनुष्य-धर्म को क्या पाओगे?’

“यह कहने पर मैंने पंचवर्गीय भिक्षुओं से कहा—“भिक्षुओ! तथागत बाहुलिक नहीं हैं, और न साधना से भ्रष्ट हैं, न बाहुल्य परायण हैं। भिक्षुओ! तथागत अर्हत् सम्यक् संबुद्ध हैं ॰। ॰ लाभकर विहार करोगे।

“दूसरी बार भी पंचवर्गीय भिक्षुओं ने मुझे कहा—‘आवुस! गौतम ॰।’ दूसरी बार भी मैंने फिर (वही) कहा ॰। तीसरी बार भी पंचवर्गीय भिक्षुओं ने मुझसे (वही) कहा ॰। ऐसा कहने पर मैंने पंचवर्गीय भिक्षुओं को कहा—‘भिक्षुओ! इससे पहिले भी क्या मैंने कभी इस प्रकार कहा है?’

‘भन्ते! नहीं’

‘भिक्षुओ! तथागत अर्हत् ॰ विहार करोगे।’

“(तब) मैं पंचवर्गीय भिक्षुओं को समझाने में समर्थ हुआ।

“वहाँ मैं दो भिक्षुओं को उपदेश करता था, तो तीन भिक्षु भिक्षा के लिये जाते थे। तीन भिक्षु भिक्षाचार करके जो लाते थे, उसी से छःआंे जने निर्वाह करते थे। (जब) तीन भिक्षुओं को मैं उपदेश करता था, तो दो भिक्षु भिक्षा के लिये जाते थे। दो भिक्षु भिक्षाचार करके जो लाते थे, उसी से छःओ जने निर्वाह करते थे। तब भिक्षुओ! इस प्रकार मेरे उपदेश करने से, अववाद करने से पंचवर्गीय भिक्षु स्वयं जन्मने के स्वभाव वाले, जन्मने के दुष्परिणाम को जानकर ॰ फिर अब (दूसरा) जन्म नहीं।’

“भिक्षुओ! यह पाँच कामगुण (= काम-भोग) हैं। कौन से पाँच?—(1) चक्षुद्वारा ज्ञेय इष्ट=कान्त=मनाप=प्रियरूप=कामोपसंहित, रंजनीय रूप। (2) श्रोत्रद्वारा ज्ञेय ॰ शब्द। (3) घ्राणद्वारा ज्ञेय ॰ गंध। (4) जिह्वा द्वारा ज्ञेय ॰ रस। (5) काया (= त्वक्) द्वारा ज्ञेय ॰ स्प्रष्टव्य। भिक्षुओ! यह पाँच कामगुण है। भिक्षुओ! जो कोई श्रमण या ब्राह्मण इन पाँच कामगुणों में बँधे, मूर्छित (= ग़र्क), लिप्त हो, (उनके) दुष्परिणाम को न देख, निकलने की बुद्धि न रख (उनका) उपभोग करते हैंः उनके लिये समझना चाहिये कि वह अ-नय (= बुराई) में पड़े हैं, दुःख में पड़े हैं, पापी (= दुर्भावनाओं की इच्छानुसार करने वाले) हैं। जैसे, भिक्षुओ! जंगली मृग पाश-राशि (= जाल के ढेर) में बँधा सोवे; उसे समझना होगा—(यह मृग) बुराई में पडा है, व्यसन में पडा है। शिकारी की इच्छानुसार करने वाला है। शिकारी के आने पर (अपनी) इच्छा के अनुसार नहीं भाग सकेगा। इसी प्रकार भिक्षुओ! जो कोई श्रमण या ब्राह्मण इन पाँच कामगुणों में बँधे ॰ पापी (= दुर्भावनाओं) के इच्छानुसार करने वाले हैं।

“भिक्षुओ! जो कोई श्रमण या ब्राह्मण इन पाँच काम-गुणों में न-बँधे, अ-मुर्छित, अ-लिप्त हो, दुष्परिणाम को देख, निकलने की बुद्धि रख उपभोग करते हैं; उनके लिये समझना चाहिये; कि वह अ-नय में पडे़ नहीं है, व्यसन में पडे नहीं हैं; पापी की इच्छानुसार करने वाले नहीं हैं। जैसे भिक्षुओं! जंगली मृग पाश-राशि से बंँधा सोवे, उसके लिये समझना होगा—यह मृग अ-नय में नहीं पडा है। व्यसन में नहीं पडा है। शिकारी की इच्छानुसार नहीं करने वाला है। शिकारी के आने पर अपनी इच्छा के अनुसार भाग सकेगा। इसी प्रकार भिक्षुओ! जो कोई श्रमण या ब्राह्मण इन पाँच कामगुणो में न बँधे ॰ पापी की इच्छानुसार करने वाले नहीं हैं। जैसे, भिक्षुओ! जंगली मृग पवन के चलने पर निश्चिन्त चलता है, निश्चिन्त खडा होता है, निश्चिन्त बैठता है, निश्चिन्त लेटता है। सो क्यो?—भिक्षुओ! (वह) शिकारी की पहूँच से बाहर है। इसी प्रकार भिक्षुओ! भिक्षु ॰ प्रथम ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। भिक्षुओ! उस भिक्षु के लिये इसलिये कहा जाता है—इसने मार को अंधा कर दिया; मार की आँख को ..मारकर, वह पापी के सामने से अन्तर्धान हो गया।

‘और फिर, भिक्षुओ! भिक्षु ॰ द्वितीय ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। भिक्षुओ! इस भिक्षु के लिये कहा जाता है—॰ पापी के सामने से अन्तर्धान हो गया।

“॰ तृतीय ध्यान ॰।

“॰ चतुर्थ ध्यान ॰।

“॰ आकाशानन्त्यायतन ॰।

“॰ विज्ञानानन्त्यायतन ॰।

“॰ आकिचन्यायतन ॰।

“॰ नैवसंज्ञा-नासंज्ञायतन ॰।

“॰ संज्ञावेदित-निरोध को प्राप्त हो विहरता है। प्रज्ञा से देखकर उसके आस्रव (= चित्तसल) नष्ट हो गये। भिक्षुओ! इस भिक्षु के लिये कहा जाता है—॰ पापी के सामने से अन्तर्धान हो गया। वह लोक में फन्दे के पार हो गया। वह निश्चिन्त चलता है, निश्चिन्त खड़ा होता है, निश्चिन्त बैठता है, निश्चिन्त सोता है। सो क्यों?—भिक्षुओ! वह पापी की पहूँच से बाहर हो गया।”

भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो उन भिक्षुओं ने भगवान् के भाषण को अभिनंदित किया।