मज्झिम निकाय

30. चूल-सारोपम-सुत्तन्त

ऐसा मैंने सुना—

एक समय भगवान् श्रावस्ती में अनाथपिंडिक के आराम जेतवन में विहार करते थे।

तब पिंगलकोच्छ ब्राह्मण, जहाँ भगवान् थे, वहाँ गया, जाकर भगवान् के साथ… …(कुशल प्रश्न पूछ) एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे पिंगलकोच्छ ब्राह्मण ने भगवान् से यह कहा—

“भो गौतम! जो यह संघपति=गण-पति ज्ञात, यशस्वी तीर्थकर (= मतस्थापक) हैं, जैसे कि—पूर्ण काश्यप, मक्खली गोसाल, अजित केश-कम्बली, प्रक्रुध कात्यायन, संजय वेलट्ठि-पुत्त, निगंठ नात-पुत्त, सभी अपनी प्रतिज्ञा (= मत) को समझते हैं; या सभी नहीं समझते या कोई कोई समझते हैं; कोई कोई नहीं समझते?”

“बस ब्राह्मण! रहने दे इसे—‘सभी अपने ॰ नहीं समझते।’ ब्राह्मण तुझे धर्म का उपदेश करता हूँ, उसे सुन अच्छी तरह मन में कर, कहता हूँ।”

“अच्छा, भो!” (कह) पिंगलकोच्छ ब्राह्मण ने भगवान् को उत्तर दिया।

भगवान् ने यह कहा—“जैसे ब्रह्मण! सार चाहने वाला पुरूष ॰ शाखा पत्र को काट, यही सार है—समझ लेकर चला जाय। तो सार (= हीर) से जो काम करना है, वह उससे न होगा।

“जैसे कि ब्राह्मण! सार चाहने वाला पुरूष ॰ छाल को काटकर—‘यही सार है’—समझ लेक चला जाय; तो सार से जो काम करना है वह उससे न होगा।

“जैसे ब्राह्मण! ॰ पपडी को काटकर, यही सार है—समझ लेकर चला जाये। ॰।

“जैसे ब्राह्मण! ॰ फल्गु को काटकर, यही सार है—समझ लेकर चला जाये। ॰।

“जैसे ब्राह्मण! ॰ सार को ही काटकर, ‘यही सार है’—समझ लेकर चला जाये। उसे आँख वाला पुरूष देख कर यह कहे—अहो! आपने सार को समझा है ॰ सार से जो काम आपको करना है वह इससे होगा।

“ऐसे ही ब्राह्मण! कोई पुरूष श्रद्धापूर्वक घर से बेघर हो प्रब्रजित होता है ॰ वह उस लाभ, सत्कार, श्लोक से संतुष्ट हो अपने को परिपूर्ण-संकल्प समझता है। वह उस लाभ, सत्कार श्लोक से अपने लिये अभिमान करता है, और दूसरे को नीच समझता है—मैं लाभ-सत्कार श्लोक वाला हूँ, और ये दूसरे भिक्षु अप्रसिद्ध, शक्ति-हीन हैं। वह उस लाभ, सत्कार श्लोक के कारण, जो दूसरे उत्तम=प्रणीततर पदार्थ (= धर्म) हैं, उनके साक्षात्कार के लिये रूचि नहीं उत्पन्न करता, उद्योग नहीं करता, आलसी और शिथिल होता है। जैसे ब्राह्मण! वह सार चाहने वाला ॰ शाखा पत्र को ॰ लेकर चला जाय ॰ वह बात उससे न हो। उसी के समान, ब्राह्मण! मैं इस मनुष्य को कहता हूँ।

“और फिर ब्राह्मण! यहाँ कोई पुरूष श्रद्धापूर्वक ॰ वह उस शील का आराधन करता है, वह उस शील-संपदा से अपने लिये अभिमान करता है ॰ वह उस शील-संपदा के कारण जो दूसरे उत्तम ॰ पदार्थ हैं, उनके साक्षात्कार के लिये रूचि नहीं उत्पन्न करता, उद्योग नहीं करता ॰। जैसे ब्राह्मण! वह सार चाहने वाला ॰ छाल को ॰ लेकर चला जाय ॰ वह इससे न होगा। उसी के समान ब्राह्मण! मैं इस मनुष्य को कहता हूँ।

“और फिर ब्राह्मण! कोई पुरूष श्रद्धापूर्वक ॰ वह न उस शील-संपदा से अपने लिये अभिमान करता है न दूसरे को नीच समझता है। शील-सम्पदा से जो उत्तम=प्रणीततर पदार्थ हैं, उनके साक्षात्कार के लिये रूचि उत्पन्न करता है, उद्योग करता है, आलसी नहीं होता, शिथिल नहीं होता। (और) वह समाधि-सम्पदा का आराधन करता है। वह उस समाधि-सम्पदा से सन्तुष्ट होता है; (अपने को) परिपूर्ण-संकल्प समझता है ॰ विभ्रान्त-चित्त हैं। समाधि-संपदा से जो दूसरे पदार्थ उत्तम=प्रणीततर हैं, उनके साक्षात्कार करने के लिये रूचि नहीं उत्पन्न करता॰। जैसे ब्राह्मण! वह सार चाहने वाला ॰ पपड़ी को ॰ लेकर चला जाय ॰ वह बात इससे न हो। उसी के समान ब्राह्मण! मैं इस मनुष्य को कहता हूँ।

“और फिर ब्राह्मण! कोई पुरूष श्रद्धापूर्वक ॰ वह उस समाधि-सम्पदा से न अपने लिये अभिमान करता है ॰। समाधि संपदा से उत्तम ॰ पदार्थ है, उनके साक्षात्कार के लिये रूचि उत्पन्न करता है॰। (और) वह ज्ञान-दर्शन का आराधन करता है। वह उस ज्ञान-दर्शन से संतुष्ट होता है ॰। जैसे ब्राह्मण! वह सार चाहने वाला पुरूष ॰ फल्गु को ॰ लेकर चला जाय ॰ उसी के समान ब्राह्मण! मैं इस मनुष्य को कहता हूँ।

“और फिर ब्राह्मण! कोई पुरूष श्रद्धापूर्वक ॰ वह उस ज्ञान-दर्शन से सन्तुष्ट होता है। किन्तु परिपूर्ण-संकल्प नहीं समझता। वह उस ज्ञान-दर्शन से न अपने लिये अभिमान करता है न दूसरे को नीच समझता है। उस ज्ञानदर्शन से जो दूसरे पदार्थ उत्तम ॰ है; उनके साक्षात्कार के लिये रूचि उत्पन्न करता है ॰।

“ब्राह्मण! कौन से पदार्थ ज्ञान-दर्शन से उत्तम=प्रणीततर है?—ब्राह्मण! ॰ प्रथम-ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। ब्राह्मण! यह पदार्थ भी ज्ञान-दर्शन से उत्तम ॰ है। और फिर ब्राह्मण! ॰ द्वितीय-ध्यान को ॰। ॰ तृतीय-ध्यान को ॰। ॰ चतुथ्र-ध्यान को ॰। ॰ आकाशा नन्त्यायतन को ॰। ॰ विज्ञानानन्त्यायतन को ॰। ॰ आकिंचन्यायतन को ॰। ॰ नैवसंज्ञा-नासंज्ञायतन को ॰। ॰ संज्ञावेदित-निरोध को प्राप्त हो विहरता है। प्रज्ञा से देखकर उसे आस्रव (= चित्तमल) नष्ट होते हैं। ब्राह्मण! यह पदार्थ भी ज्ञान-दर्शन से उत्तम ॰ है। जैसे ब्राह्मण! सार चाहने वाला ॰ सार को ही काट कर, ‘यही सार है’—समझ ले जाये। जो उसे सार से काम करना है वह उसका होगा। ब्राह्मण! उसी के समान मै इस पुरूष को कहता हूँ।

“इस प्रकार ब्राह्मण! यह ब्रह्मचर्य लाभ ॰ के लिये नहीं है। ब्राह्मण जो यह न च्युत होने वाली चित्त की मुक्ति है, इसी के लिये ब्रह्मचर्य है, यही सार है, यही अन्तिम निष्कर्ष है।”

ऐसा कहने पर पिंगलकोच्छ ब्राह्मण ने भगवान् से यह कहा—

“आश्चर्य भो गौतम! ॰ आज से आप गौतम मुझे अंजलि-पद्ध शरणागत उपासक स्वीकार करें।”

3—(इति) ओपम्मवग्ग (1।3)