मज्झिम निकाय

32. महा-गोसिंग-सुत्तन्त

ऐसा मैने सुना—

एक समय भगवान् गोसिंग-साल वनदाय में बहुत से प्रसिद्ध प्रसिद्ध स्थविर (= वृद्ध) शिष्यों के साथ विहार करते थे; जैसे कि—आयुष्मान् सारिपुत्र, आयुष्मान् महामौद्गल्यायन, आयुष्मान् महाकाश्यप, आयुष्मान् अनुरूद्ध, आयुष्मान् रेवत, और आयुष्मान् आनंद तथा दूसरे भी प्रसिद्ध प्रसिद्ध स्थविर शिष्यों के साथ। तय आयुष्मान् महामौद्गल्यायन सायंकाल ध्यान से उठकर जहाँ आयुष्मान् महाकाश्यप थे वहाँ गये। जाकर आयुष्मान् महाकाश्यप से यह बोले—

“चलो आवुस काश्यप! जहाँ आयुष्मान् सारिपुत्र हैं वहाँ धर्म सुनने के लिये चलें।”

“अच्छा आवुस!” (कह) आयुष्मान् महाकाश्यप ने आयुष्मान् महामौद्गल्यायन को उत्त दिया।

तब आयुष्मान् महामौद्गल्यसायन और आयुष्मान् महाकाश्यप और आयुष्मान् अनुरूद्ध जहाँ आयुष्मान् सारिपुत्र थे वहाँ धर्म सुनने के लिये गये। आयुष्मान् आनंद ने दूर से ही आ महामौदगल्यायन, आ. महाकाश्यप, और आ. अनुरूद्ध को जिधर आ. सारिपुत्र थे उधर धर्म सुननंे के लिये जाते देखा। देखकर जहाँ आयुष्मान् रेवत थे वहाँ गये। जाकर आयुष्मान् रेवत से यह बोले—

“आवुस! यह सत्पुरूष जहाँ आ. सारिपुत्र हैं वहाँ धर्म सुनने के लिये जा रहे हैं। चलो आवुस! जहाँ आ. सारिपुत्र हैं वहाँ हम भी धर्म सुनने के लिये चलें।”

“अच्छा आवुस!” (कह) आ. रेवत ने आ. आनंद को उत्तर दिया।

तब आयुष्मान् रेवत और आ. आनंद जहाँ आ. सारिपुत्र. थे वहाँ धर्म सुनने के लिये चले। आयुष्मान् सारिपुत्र ने दूर से ही आ. रेवत और आयुष्मान् आनंद को आते देखा। देखकर आ. आनंद से कहा—

“आइये आ. आनंद! स्वागत है भगवान् के उपस्थाक (= निरंतर-सेवक) भगवान् के सदा समीप रहने वाले आनंद का। आवुस आनंद! रमणीय है गोसिंग सालबन। चाँदनी रात है। सारी पाँतियों में साल फूले हुए है। मानो दिव्य गंध बह रहे है। आवुस आनंद! किस प्रकार के (भिक्षु) से यह गोसिंग सालवन शोभित होवेगा?

“आवुस सारिपुत्र! भिक्षु यदि बहुश्रुत, श्रुतधर, श्रुत-संचयी (= सुनी शिक्षाओं का संचय करने वाला) हो। जो वह धर्म आदि में कल्याण, मध्य में कल्याण और अन्त में कल्याण रखने वाले, सार्थक स-व्यंजन केवल परिपूर्ण, परिशुद्ध, ब्रह्मचर्य को बखानने वाले हैं, वैसे धर्मो को उस (भिक्षु) ने बहुत सुना हो, धारण किया हो, वचन से परिचय किया हो, मन से परखा हो, दृष्टि (= साक्षात्कार) में धँसा लिया हो; (ऐसा भिक्षु) चार (प्रकार) की परिषद् को सर्वांग पूर्ण, पद-व्यंजन-युक्त, स्वतन्त्रता पूर्वक धर्म को अनुशयों (= चित्तमलो) के नाश के लिये उपदेशे। आवुस सारिपुत्र! इस प्रकार के भिक्षु द्वारा गोसिंग सालवन शोभित होगा।”

ऐसा कहने पर आयुष्मान् सारिपुत्र ने आ. रेवत से यह कहा—“आवुस रेवत! आ. आनंद ने अपने विचार के अनुसार कह दिया। अब मैं आ. रेवत से पूछता हूँ। आ. रेवत रमणीय है गोसिंग सालवन। ॰ आवुस रेवत! किस प्रकार (के भिक्षु) से यह गोसिंग सालवन शोभित होगा?”

“यहाँ आवुस सारिपुत्र! भिक्षु यदि ध्यान-रत, ध्यान-प्रेमी होवे, अपने (मन के) भीरत चित्त की एकाग्रता में तत्पर और ध्यान से न हटने वाला, विपश्यना (= साक्षात्कार किये गये ज्ञान) से युक्त, शून्य गृहो को बढ़ाने वाला होवे। आवुस सारिपुत्र! इस प्रकार के भिक्षु द्वारा गोसिंग सालवन शोभित होगा।”

ऐसा कहने पर आ. सारिपुत्र ने आ. अनुरूद्ध से कहा—

“आवुस अनुरूद्ध! आ. रेवत ने अपने विचार के अनुसार कह दिया ॰ किस प्रकार (के भिक्षु) से गोसिंग सालवन शोभित होगा?”

“आवुस सारिपुत्र! भिक्षु अ-मानव विशुद्ध दिव्यचक्षु से सहस्रो लोकों को अवलोकर करे; (वैसे ही) जैसे कि आवुस सारिपुत्र! आँख वाला पुरूष महल के ऊपर खड़ा सहस्रों चक्कों के समुदाय को देखे; वैसे ही आवुस सारिपुत्र! ॰ दिव्यचक्षु से सहस्रों लोको को देखे। आवुस सारिपुत्र! ऐसे भिक्षु से गोसिंग सालवन शोभित होगा।”

ऐसा कहने पर आ. सारिपुत्र ने आ. महाकाश्यप से यह कहा—“आवुस काश्यप! आ. अनुरूद्ध अपने विचार के अनुसार कह दिया ॰?”

“आवुस सारिपुत्र! भिक्षु स्वयं आरण्यक (= वन में रहने वाला) हो और आरण्यकता का प्रशंसक हो। स्वयं पिंडपातिक (= मधूकरी माँगने वाला) हो और पिंडपातिकता का प्रशंसक हो। स्वयं पांसुकूलिक (= फंेके चिथडों को पहिनने वाला) हो ॰। स्वयं त्रैचीवरिक (= सिर्फ तीन वस्त्रों को पास में रखने वाला ॰। स्वयं-अल्पेच्छ ॰। स्वयं-संतुष्ट ॰। प्रनिविक्त (= एकान्त चिंतन-रत) ॰। ॰ संसर्गरहित ॰। ॰ उद्योगी ॰। ॰ सदाचारी ॰। ॰ समाधियुक्त ॰। ॰ प्रज्ञायुक्त ॰। ॰ विमुक्ति-युक्त ॰। ॰ विमुक्ति ज्ञान-दर्शन (= साक्षात्कार) से युक्त ॰। आवुस सारिपुत्र! इस प्रकार के भिक्षु से ॰।”

ऐसा कहने पर आ. सारिपुत्र ने आ. मौद्गल्यायन से यह कहा—

“आवुस महामौद्ग्ल्यायन! आ. महाकाश्यप ने अपने विचार के अनुसार कह दिया ॰?”

“आवुस सारिपुत्र! दो भिक्षु अभिधर्म (= धर्म-संबंधी) कथा कहे, वह एक दूसरे से प्रश्न पूछें, एक दूसरे के प्रश्न का उत्तर दें, जिद न करें, उनकी कथा धर्म-संबंधी चले। आवुस सारपिुत्र! इस प्रकार के भिक्षु से ॰।”

तब आ. महामौद्गलयायन ने आ. सारिपुत्र से यह कहा—“आवुस सारिपुत्र! हमने अपने विचार के अनुसार कह दिया। अब हम आ. सारिपुत्र से पूछते हैं ॰?”

“आवुस मौद्गल्यायन! एक भिक्षु चित्त को वश में करता है, (स्वयं) चित्त के वश में नहीं होता। वह जिस विहार (= ध्यान-प्रकार) को प्राप्त कर पूर्वाह्न समय विहरना चाहता है उसी विहार से पूर्वाह्न समय विहरता है। जिस विहार से मध्याह्न समय ॰। ॰ सन्ध्या समय ॰। जैसे आवुस महामौद्गल्यायन! किसी राजा या राज-मंत्री के पास नाना रंग के दुशालो के करंडक (= बक्स) भरे हो; वह जिस दुशाले को पूर्वाह्न समय धारण करना चाहे उसे पूर्वाह्न समय धारण करे; जिस दुशाले को मध्याह्न समय ॰। ॰ सायंकाल ॰। ॰ ऐसे ही आवुस महामौद्गल्यायन! जो भिक्षु चित्त को वश में करता है स्वयं चित्त के वश में नहीं होता वह जिस विहार को प्राप्त कर ॰। आवुस महामौद्गल्यायन! इस प्रकार के भिक्षु से ॰।”

तब आ. सारिपुत्र ने उन आयुष्मानों से यह कहा—

“आवुसो! हमने अपने विचारों के अनुसार कह दिया। आओ आवुसो! जहाँ भगवान् हैं वहाँ चलें। चलकर भगवान् से यह बात कहें। जैसे हमे भगवान् बतलाएँ वैसे उसे धारण करें।”

“अच्छा आवुस!” (कह) उन आयुष्मानों ने आयुष्मान् सारिपुत्र को उत्तर दिया।

तब वह आयुष्मान् जहाँ भगवान् थे वहाँ गये। जाकर भगवान् को अभिवादन कर एक ओर बैठे। आयुष्मान् सारिपुत्र ने भगवान् से कहा—

“भन्ते! आ. रेवत और आ. आनंद जहाँ मैं था धर्म सुनने के लिये आये। भन्ते! मैने दूर से ही ॰। दो भिक्षु अभिधर्म कथा कहें, ॰।”

“साधु, साधु, सारिपुत्र! मौद्गल्यायन ही ठीक से कथन करेगा क्योंकि सारिपुत्र! मौद्गल्यायन धर्म-कथिक (= धर्म का वक्ता) है।”

ऐसा कहने पर आ. महामौद्गल्यायन ने भगवान् से यह कहा—

“तब मैंने भन्ते! आ. सारिपुत्र को यह कहा—‘आवुस सारिपुत्र। ॰ । ऐसे ही आवुस मौद्गल्यायन ॰।”

“साधु साधु मौद्गल्यायन! सारिपुत्र ही ठीक से कथन करेगा क्योंकि मौद्गल्यायन! सारिपुत्र चित्त को वश में रखता है। स्वयं चित्त के वश में नहीं होता। वह जिस विहार ॰ सायंकाल विहरता है।”

ऐसा कहने पर आ. सारिपुत्र ने भगवान् से यह कहा—

“भन्ते! किसका (भाषित=कथन) सुभाषित है?”

“सारिपुत्र! तुम सभी का (भाषित) एक एक करके सुभाषित है। और मेरी भी सुनो। किस प्रकार के भिक्षु से गोसिंग सालवन शोभित होगा?—यहाँ सारिपुत्र! भिक्षु भोजन के बाद भिक्षा से निबटकर, आसन मार शरीर को सीधा रख, स्मृति को सामने उपस्थित कर, (= यह संकल्प करता है—) मैं तब तक इस आसन को नहीं छोडूँगा, जब तक कि मेरे चित्त-मल चित्त को न छोड देंगे। सारिपुत्र! ऐसे भिक्षु से गोसिंग सालवन शोभित होगा।”

भगवान् ने यह कहा। संतुष्ट हो उन आयुष्मानों ने भगवान् के भाषण का अभिनंदन किया।