मज्झिम निकाय

36. महा-सच्चक-सुत्तन्त

ऐसा मैने सुना—

एक समय भगवान् वैशाली में महावन की कूटागार-शाला में विहार करते थे।

उस समय भगवान् पूर्वाह्न समय पहिन कर पात्रचीवर ले वैशाली में भिक्षा के लिये प्रविष्ट होना चाहते थे। तब सच्चक निगंठ-पुत्त जंघाविहार (= टहलने) के लिये अनुचंक्रमण करता, अनुविचरण करता, जहाँ महावन की कूटागार-शाला थी, वहाँ गया। आयुष्मान् आनंद ने दूर से ही सच्चक निगंठ-पुत्त को आते देखा। देखकर भगवान् से यह कहा—

“भन्ते! यह सच्चक निगंठ-पुत्त आ रहा है (जो कि) बहुत बकवादी पंडित-मानी और बहुत जनो द्वारा सम्मानित है। भन्ते! यह बुद्ध की निन्दा चाहने वाला, धर्म की निंदा चाहने वाला, संघ की निन्दा चाहने वाला है। अच्छा हो भन्ते! यदि भगवान् कृपा करके थोडी देर यहीं बैठे।”

भगवान् बिछे आसन पर बैठ गये। तब सच्चक निगंठ-पुत्त जहाँ भगवान् थे वहाँ गया। जाकर भगवान् के साथ यथायोग्य (कुशल प्रश्न पूछ) एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे सच्चक निगंठ-पुत्त ने भगवान् से यह कहा—

“भो गौतम! कोई कोई श्रमण ब्राह्मण कायिक भावना में तत्पर हो विहरते हैं, चित्त की भावना में नहीं (तत्पर होते)। यह शारीरिक दुःखमय, वेदना को पाते है। भो गौतम! पहिले शारीरिक दुःख-वेदना में पडे हुए का उरूस्तंभ (= जाँघो का कठिया जाना) भी होगा, हृदय भी विदीर्ण होगा, मुख से गरम खून भी निकल आयेगा, उन्माद, चित्त-विक्षेप भी होगा। भो गौतम! उसका यह चित्त काय ही तो है, काया के ही वश में तो है। सो क्यों?—चित्त की भावना न करने से। भो गौतम! यहाँ कोई कोई श्रमण ब्राह्मण चित्त की भावना में तत्पर हो विहरते है। काया की भावना में नहीं। भो गौतम! वह चैतसिक दुःख-वेदना में पडते हैं। भो गौतम! चैतसिक दुःख-वेदना में पडने से (उस समय) (उनका) उरूस्तंभ भी होगा ॰ सो क्यों?—काया की भावना न करने से। भो गौतम! मुझे ऐसा होता है, ज़रूर आप गौतम के शिष्य, चित्त की भावना में तत्पर हो विहरते हैं, काया की भावना में नहीं।”

“अग्निवेश! तूने काय-भावना क्या सुनी है?”

“जैसे कि यह नन्द वात्स्य, कृश सांकृत्य, मक्खली-गोसाल (मानते है)। भो गौतम! यह अचेलक (= नग्न), मुक्त-आचार ॰ साप्ताहिक भी आहार करते हैं। ऐसे इस प्रकार बीच में अन्तर देकर अर्धमासिक अहार को प्रहणकर विहरते हैं।”

“अग्निवेश! क्या वह उतने ही से गुज़ारा करते है?”

“नहीं भो गौतम! कभी कभी उत्तम उत्तम भोजनों को खाते हैं। उत्तम उत्तम खाद्यों को ग्रहण करते हैं। उत्तम उत्तम स्वादनीय (पदार्थों) को स्वादन करते हैं। उत्तम उत्तम पानों को पीते हैं। वह इस शरीर को बढ़ाते हैं, पोसते हैं, चरबी पैदा करते हैं। इस प्रकार इस शरीर का संचय-प्रचय होता है।”

“अग्निवेश! चित्त-भावना तूने कैसी सुनी है?”

भगवान् के चित्त-भावना के विषय में पूछने पर सच्चक निगंठ-पुत्त कुछ न बोला। तब भगवान् ने सच्चक निगंठ-पुत्त से यह कहा—

“अग्निवेश! जो तूने वह पहले काय-भावना कही वह भी आर्यविनय (= धर्म) में धार्मिक काय-भावना नहीं है। अग्निवेश! तूने काय-भावना को ही नहीं जाना; चित्त-भावना को तो क्या जानेगा? अग्निवेश! जैसे काया से अमावित, चित्त से अभावित; (एवं) काया से भावित और चित्त से भावित होता है, उसे सुन अच्छी तरह मन में कर कहता हूँ।”

“अच्छा भो!” (वह) सच्चक निगंठ पुत्त ने भगवान् को उत्तर दिया।

भगवान् ने यह कहा—

“अग्निवेश! कैसे (पुरूष) काया से अभावित और चित्त से अभावित होता है?—यहाँ अग्निवेश! अज्ञ अनाडी जन को जब सुख-वेदना (= सुख का अनुभव) होती है तो वह सुख-वेदना से लिप्त हो, सुख में रागी होता है, सुख की रागिता को प्राप्त होता है। (कालान्तर में जब) उसकी वह सुख-वेदना निरूद्ध हो जाती है। सुख-वेदना के निरूद्ध होने से दुःख-वेदना उत्पन्न होती है। दुःख-वेदना में पढ़कर वह शोक करता है, कलपता है, विलाप करता है, छाती पीटकर रोता है, मूर्छित होता है। (इस प्रकार) अग्निवेश! उसके लिये उत्पन्न हुई यह सुख-वेदना काया के भावित न होने से चित्त को पकड़कर ठहरती ळे; चित्त की भावना न करने से उत्पन्न हुई दुःख-वेदना, दोनों ओर से चित्त की भावना न करने से उत्पन्न हुई दुःख वेदना चित्त को पकडकर ठहरती है; अग्निवेश! (वह)-(पुरूष) काया से भावना-रहित और चित्त से भावना-रहित होता है।

“कैसे अग्निवेश! (पुरूष) भावित-काया और भावित-चित्त होता है?—अग्निवेश बुद्धिमान् आर्य श्रावक को जब सुख-वेदना उत्पन्न होती है, तो वह सुख-वेदना को पाकर सुख-रागी नहीं होता, सुख में रागित्व को प्राप्त नहीं होता। (जब) उसकी वह सुख-वेदना नष्ट होती है; सुख-वेदना के निरोध (= नाश) से दुःख-वेदना उत्पन्न होती है; (तब) वह दुःख-वेदना में पडकर न शोक करता है ा॰ न मूर्छा को प्राप्त होता है। अग्निवेश! काया के भावित होने से उसकी वह उत्पन्न हुई सुख-वेदना चित्त को पकडकर नहीं ठहरती; ॰ दुःख-वेदना चित्त को पकडकर नहीं ठहरती। अग्निवेश! इस प्रकार दोनों ओर से काया के भावित होने से जिस किसी की उत्पन्न सुख-वेदना भी चित्त को पकडकर नहीं ठहरती, चित्त के भावित होने से उत्पन्न दुःख-वेदना भी चित्त को पकडकर नहीं ठहरती; अग्निवेश! (वह)…(पुरूष) भवितकाय और भावितचित्त होता है।”

“भो गोतम! मेरा विश्वास है, कि आप गौतम भावित-काय (शरीर की साधना जिसने की है) और भावित-चित्त (= चित्त की साधना जिसने की है) हैं।”

“जरूर, अग्निवेश! तूने ताने से यह बात कही। अच्छा, तो मैं तुझसे कहता हूँ—जब कि, अग्निवेश! मैं केश-दाढी मुँडा, काषाय-वस्त्र पहिन घर से बेघर हो प्रब्रजित हुआ ॰ तो उत्पन्न हुई सुख-वेदना चित्त को पकडकर ठहरेगी उत्पन्न दुःख-वेदना चित्त को पकडकर ठहरेगी—यह संभव नहीं।”

“क्या, आप गौतम वैसी सुख-वेदना उत्पन्न होती है, जैसी उत्पन्न हुई सुख-वेदना चित्त को पकडकर ठहरती है? क्या आप गौतम को वैसी दुःख-वेदना उत्पन्न होती है, जैसी उत्पन्न हुई दुःख-वेदना चित्त को पकडकर ठहरती है?”

“हमें क्या होगा अग्निवेश! यहाँ, अग्निवेश! बुद्ध होने से पूर्व, बुद्ध न हो बोधिसत्व होते समय मुझे ऐसा हुआ—घर का निवास जंजाल है, मल का मार्ग हैं, प्रब्रज्या (= संन्यास) खुला स्थान है। इस सर्वथा परिपूर्ण, सर्वथा परिशुद्ध, छिले शंख से (उज्वल) ब्रह्मचर्य का पालन घर में रहकर सुकर नहीं है; क्यों न मैं केश-दाढी मुँडा, काषाय-वस्त्र पहन घर से बेघर हो प्रब्रजित हो जाऊँ। सो मैं, अग्निवेश! दूसरे समय ॰। सो मैं अग्निवेश! उस धर्म को अपर्याप्त मान, उस धर्म से उदास हो चल दिया। ॰ मगध में क्रमशः चारिका करता, जहाँ उरूवेला सेनानी-निगम था, ॰ वहीं बैठ गया। मुझे, अग्निवेश! (उस समय) अद्भुत, अश्रुत-पूर्व तीन उपमायें भासित हुई—

(1) “जैसे गीला काष्ठ भीगे पानी में डाला हो ॰।

(2) “॰ जैसे स्नेह-युक्त गीला काष्ठ जल के पास स्थल पर फंका हो ॰।

(3) “॰ जैसे नीरस शुष्क काष्ठ जल से दूर स्थल पर फेंका हो ॰।

“तब अग्निवेश! मेरे (मन में) हुआ—‘क्यों न मैं दाँतो के ऊपर दाँत रख, जिह्वा द्वारा तालू को दबा ॰। उस समय मैने न-दबने वाला वीर्य (= उद्योग) आरम्भ किया हुआ था, न-भूली स्मृति मेरी जागृत थी; दुःखमय प्रधान (= साधना) से पीडित होने के कारण मेरी काया चंचल अ-शान्त हो गई।—इस प्रकार अग्निवेश! उत्पन्न हुई वेदना चित्त को पकड कर नहीं ठहरती।

“तब, अग्विेश! मेरे (मन में) हुआ—क्यों न मैं श्वास-रहित ध्यान धरूँ?—सो मैंने अग्निवेश! मुख और नासिका से श्वास का आना जाना रोक दिया। ॰। उसी दुःखमय प्रधान के कारण ॰।

“॰ मैने अग्निवेश! मुख और नासिका से श्वास का आना जाना रोक दिया। ॰। उसी दुःखमय प्रधान के कारण ॰।

“॰ मैने अग्निवेश! मुख, नासिका और कानल से श्वास का आना जाना रोक दिया। ॰ । दसी दुःखमय प्रधान के कारण ॰।

“॰ मैने अग्निवेश! मुख, नासिका और कान से श्वास का आना जाना रोक दिया। ॰ ।

“तब मुझे अग्निवेश! यह हुआ—‘क्यों न मैं आहार को बिल्कुल ही छोड देना स्वीकार करूँ ॰ । अग्निवेश! मेरा वैसा परिशुद्ध, पर्यवदात (= सफेद, गोरा), छविवर्ण (= चमडे का रंग) नष्ट हो गया था। ॰ सो मैं अग्निवेश! स्थूल आहार ओदन कुल्माष ग्रहण करने लगा। ॰ प्रथम ध्यान ॰ । ॰ द्वितीय ध्यान ॰ । ॰ तृतीय ध्यान ॰ । ॰ चतुर्थ ध्यान को प्राप्त कर विहरने लगा। अग्निवेश! उत्पन्न हुई सुखवेदना इस प्रकार मेरे चित्त को पकडकर नहीं ठहरती।

“सो मैंने अग्निवेश! इस प्रकार चित्त के ॰ परिशुद्ध होने पर पूर्वजन्मों की स्मृति के लिये चित्त को झुकायसा ॰ । अग्निवेश! रात्रि के प्रथम याम में यह प्रथम विद्या प्राप्त हुई ॰ ।

“॰ विशुद्ध दिव्य-चुक्षु से ॰ प्राणियों को देखने लगा ॰। रात के बिचले पहर यह द्वितीय विद्या प्राप्त हुई। ।

“॰ आस्रवों के क्षय के ज्ञानल के लिये चित्त को झुकाया ॰ अब यहाँ के लिये कुछ (करणीय) नहीं”—इसे जाना। अग्निवेश! रात के पिछले याम में यह तृतीय विद्या प्राप्त हुई ॰। ॰ इस प्रकार अग्निवेश! उत्पन्न हुई सुखवेदना मेरे चित्त को पकड कर नहीं ठहरती।

“अग्निवेश! मै अनेक सौ की परिषद् में व्याख्यान देता था, और उनमें से हर एक समझता था, कि श्रमण गौतम मेरे ही लिये धर्म-उपदेश कर रहा है। अग्निवेश ऐसा न समझो, कि तथागत केवल विज्ञापन के लिये दूसरों को धर्म-उपदेश करते हैं। मैं अग्निवेश उस कथा के समाप्त होने पर उसी पहिले के समाधि-निमित्त (= चित्त-एकाग्रता के आकार) में, अपने भीतर ही चित्त को ठहराता हूँ, बैठाता हूँ, एकाग्र करता हूँ, समाहित करता हूँ, उसके साथ सदा सर्वदा विहार करता हूँ।”

“अर्हत् सम्यक् संबुद्ध की भाँति आप गौतम को यह योग्य ही है। क्या आप गौतम दिन को सोते है?”

“सोता हूँ, अग्निवेश! ग्रीष्म के अन्तिम मास में भोजनान्तर भिक्षा से निबट कर, चैपेती संघाटी का बिछवा दाहिनी करवट से स्मृति-संप्रजन्य युक्त हो निद्रित होता हूँ।”

“भो गौतम! इसे कोई कोई श्रमण ब्राह्मण संमोह (= मूढता) का विहार करते हैं।”

“अग्निवेश! इतने से संमूढ (= मूढ) या अ-संमूढ नहीं होता। अग्निवेश! जैसे संमूढ या अ-संमूढ होता है, उसे सुन अच्छी तरह मन में कर, कहता हूँ।”

“अच्छा, भो!” (कह) सच्चक निगंठपुत्त ने भगवान् को उत्तर दिया।

भगवान् ने यह कहा—“अग्निवेश! जिस किसी के वह संक्लेशिक (= मलिन करने वाले), पुनर्जन्म देने वाले, दुःख-परिणाम वाले, भविष्य में जन्म-जरा-मरण देने वाले आस्रव (= चित्त-मल) नष्ट नहीं हुये, उसे मैं संमूढ (= मूढ) कहता हूँ। अग्निवेश! आस्रवों के नाश न होने से (पुरूष) संमूढ होता है। अग्निवेश! जिस किसी के वह आस्रव ॰ नष्ट हो गये, उसे मैं अ-संमूढ कहता हूँ। अग्निवेश! आस्रवों के नाश होने से अ-संमूढ होता है। अग्निवेश! तथागत के वह आस्रव—॰—हो गये, उच्छिल-मूल, अभाव को प्राप्त, भविष्य में न उत्पन्न होने लायक सिर-कटे ताड जैसे हो गये। जैसे, अग्निवेश! सिर-कटा ताड़ फिर बढने योग्य नहीं रहता; ऐसे ही अग्निवेश! तथागत के वह आस्रव-॰-॰, उच्छिन्न-मूल ॰ सिरकटे ताड जैसे हो गये।”

ऐसा कहने पर सच्चक निगंठपुत्त ने भगवान् से यह कहा—“आश्चर्य है, भो गौतम! अद्भुत है भो गौतम! इतना चिढ़ा चिढ़ा (ताना दे दे) कर कहे जाने पर, चुभने वाले वचनों के प्रयोग से भी आप गौतम का मुखवर्ण (वैसा ही) स्वच्छ प्रसन्न है, जैसा कि अर्हत् सम्यक् संबुद्ध का। भो गौतम! मैंने पूर्ण कायश्प के साथ वाद किया है। वह दूसरी दूसरी (बात) करने लगता था, वह बात को (विषय से) बाहर ले जाता था; कोप, द्वेष, नाराजगी प्रकट करने लगता था। किन्तु इतना चिढा चिढाकर कहे जाने पर ॰। ॰ मक्खलि गोसाल ॰। ॰ अजित केश-कम्बली ॰। ॰ प्रक्रुध कात्यायन ॰। ॰ संजय वेलट्ठिपुत्त ॰। मैने निगंठ नातपुत्त के साथ वाद किया है ॰। भो गौतम! अब हम जायेंगे। हमें बहुत काम बहुत करणीय हैं।”

“अग्निवेश! जिसका तू इस समय काल समझता है, (उसे कर)।”

तब सच्चक निगंठपुत्त भगवान् के भाषा का अभिनंदन, अनुमोदन कर आसन से उठकर चला गया।