मज्झिम निकाय

43. महा-वेदल्ल-सुत्तन्त

ऐसा मैंने सुना—

एक समय भगवान् श्रावस्ती में अनाथपिंडिक के आराम जेतवन में विहार करते थे।

तब आयुष्मान् महाकोष्ठिल (= कोट्ठित) सायंकाल प्रतिसल्लयन (= एकान्त चिन्तन, ध्यान) से उठ जहाँ आयुष्मान् सारिपुत्र थे, वहाँ गये। जाकर आयुष्मान् सारिपुत्र के साथ…यथायसोग्य संमोदन कर एक ओर बैठ गये। एक ओर बैठे आयुष्मान् महाकोट्ठित ने आयुष्मान् सारिपुत्र से यह कहा—

“आवुस! ‘दुष्प्रज्ञ’ ‘दुष्प्रज्ञ’ कहा जाता है, किस (कारण) से वह……दुष्प्रज्ञ कहा जाता है?”

“चूँकि नहीं समझता, (= न प्रजानाति) इसलिये आवुस! वह दुष्प्रज्ञ कहा जाता है।”

“क्या नहीं समझता?”

“यह दुःख है’—इसे नहीं समझता; ‘यह दुःख-समुदय (= दुःख का कारण) है’—इसे नहीं समझता; ‘यह दुःख-निरोध है’—इसे नहीं समझता; ‘यह दुःख-निरोध-गामिनी प्रतिपद् (= मार्ग) है’—इसे नहीं समझता। नहीं समझता है, इसलिये आवुस! वह दुष्प्रज्ञ कहा जाता है।”

“साधु, आवुस!”—(कह) आयुष्मान् महाकोट्ठित ने आयुष्मान् सारिपुत्र के भाषण का अभिनन्दन कर अनुमोदन कर, आयुष्मान् सारिपुत्र से आगे का प्रश्न पूछा—

“आवुस! ‘प्रज्ञावान्’ ‘प्रज्ञावान्’ कहा जाता है, किस (कारण) से प्रज्ञावान् कहा जाता है?”

“चूँकि वह समझता है (= प्रजानाति), इसलिये आवुस! वह प्रज्ञावान् कहा जाता है।”

“क्या समझता है?”

“यह दुःख है’—इसे समझता ॰; ॰ ‘यह दुःख-निरोध-गामिनी प्रतिपद् है’—इसे समझता। समझता है, इसलिये आवुस! वह प्रज्ञावान् कहा जाता है।”

“आवुस! ‘विज्ञान’ ‘विज्ञान’ कहा जाता है, किससे विज्ञान कहा जाता हे?”

“चूँकि आवुस! (वह) जानता है (= विजानाति), इसलिये विज्ञान कहा जाता है?”

“क्या जानता है?—

“‘(यह) सुख है—(इसे) जानता है; (यह) दुःख है’—(इसे) जानता है; ‘(यह) न-सुख-न-दुःख है’—(इसे) जानता है। जानता है, इसलिये आवुस! विज्ञान कहा जाता है।”

“आवुस! जो यह प्रज्ञा है, और यह जो विज्ञान, यह दोनों पदार्थ मिले-जुले (= संसृष्ट) हैं, या अलग अलग? इन (दोनों) पदार्थों (= धर्मों) को विलग विलग कर उनका भेद जतलाया जा सकता है?”

“आवुस! यह जो प्रज्ञा है, और यह जो विज्ञान है, यह दोनों पदार्थ मिले जुले हैं, अलग अलग नहीं हैं; किन्तु इन (दोनों) पदार्थों को विलग विलग कर उनका भेद नहीं जतलाया जा सकता।”

“आवुस! जो यह प्रज्ञा है, और जो यह विज्ञान है; इन (दोनों) मिले-जुले न-विलग पदार्थो का क्या भेद है?”

“आवुस! ॰ इन दोनों ॰ पदार्थो का यह भेद है—प्रज्ञा भावना (= मनोयोग) करने योग्य है, और विज्ञान परिज्ञेय (= ज्ञेय) है।”

“आवुस! ‘वेदना’ ‘वेदना’ कही जाती है; किस (कारण) से वेदना कही जाती है?”

“चूँकि आवुस! (यह) वेदन (= अनुभव) करती हे, इसलिये वेदना कही जाती है?”

“क्या वेदन करती है?”

“सुख को भी वेदन करती है। दुःख को भी वेदन करती है, न दुःख न सुख को भी वेदन करती है। वेदन करती है इसलिये ॰।”

“आवुस! ‘संज्ञा’ ‘संज्ञा’ कही जाती है; ॰?”

“चूँकि आवुस! (यह) संजानन (= पहिचान) करती है ॰।”

“क्या संजानन करती है?”

“नीले को भी संजानन करती है, पीले को भी ॰, लाल को भी ॰, सफेद को भी ॰। संजानन करती है, इसलिये ॰।”

“आवुस! जो संज्ञा है, जो वेदना है, और जो विज्ञान है; यह धर्म (= पदार्थ) मिले-जुले है, या अलग? इन धर्मों को विलग विलग कर इनका भेद जतलाया जा सकता है?”

“आवुस! ॰ यह (तीनों) धर्म मिले जुले हैं, विलग नहीं है। और इन (तीनों) पदार्थो को विलग विलग करके उनका भेद नहीं जतलाया जा सकता।”

“आवुस! ॰ इन (तीनों) धर्मो का क्या भेद है?”

“आवुस! जिसको वेदन (= अनुभव) करता है, उसक संजानन करता है; उकस विजानन करता है। इसलिये यह धर्म मिले-जुले हैं, विलग नहीं; और उन्हे ॰ विलग करके, उनका भेद नहीं जतलाया जा सकता है।”

“आवुस! पाँच (चक्षु आदि बाह्य) इन्द्रियों से असंबद्ध शुद्ध मनो-विज्ञान द्वारा क्या विज्ञेय (= जानने योग्य) है?”

“आवुस! ॰ शुद्ध मनोविज्ञान द्वारा ‘आकाश’ अनन्त है’—यह आकाश-आनन्त्य-आयतन विज्ञेय है; ‘विज्ञान अनन्त है’—यह विज्ञान-आनन्तय-आयतन विज्ञेय है; ‘कुछ नहीं है’ (= अकिंचित्)—यह आकिंचन्य-आयतन विज्ञेय है।”

“आवुस! विज्ञेय धर्मो (= पदार्थो) को किससे प्रजानन करता (= अच्छी तरह जानता) है”

“आवुस! विज्ञेय धर्मो को प्रज्ञा-चक्षु से प्रजानता है।”

“आवुस! प्रज्ञा किस लिये है?”

“आवुस! प्रज्ञा अमिज्ञा के लिये है, परिज्ञा के लिये है, प्रहाण (= त्याग) के लिये है।’

“आवुस! सम्यग्-दृष्टि (= ठीक धारणा) के ग्रहण में कितने प्रत्यय (= हेतु) है ?”

“आवुस! ॰ दो प्रत्यय होते हैं—(1) दूसरों से घोष (= उपदेश-श्रवण), और (2) योनिशः मनस्कार (= मूल पर विचार करना) । ॰ । यह दोनों ॰।”

“आवुस! किन अंगो से युक्त होने पर, सम्यग्-दृष्टि चेतो-विमुक्ति-फलवाली, तथा चेतो-विमुक्ति-फल के माहात्म्य वाली होती है; प्रज्ञा-विमुक्ति-फलवाली तथा प्रज्ञा-विमुक्ति-फल के माहात्म्य वाली होती है?”

“आवुस! पाँच अंगो से युक्त सम्यग्-दृष्टि ॰ माहात्म्य वाली होती है।—यहाँ आवुस! सम्यग्-दृष्टि (1) शील (= सदाचार) से युक्त होती है; (2) श्रुत (= धर्मोपदेश-श्रवण) से युक्त होती है; (3) साक्षात्कार (= साक्च्छा=भावना आदि की प्रक्रिया के जानने के लिये अभिज्ञ से वार्तालाप) ॰; (4) शमथ (= समाधि) ॰; (5) विपश्यना (= परम-ज्ञान) से युक्त होती है। इन पाँच ॰।”

“आवुस! भव कितने है?”

“आवुस! यह तीन भव (= लोक) हैं—काम-भव, रूप-भव, अ-रूप-भव।”

“कैसे आवुस! भविष्य में पुनर्भव (= पुनर्जन्म) संपन्न होता है?”

“आवुस! अविद्या नीवरणों (= ढक्कनों) वाले, तृष्णा (रूपी) संयोजनों (= बंधनों) वाले प्राणियों की वहाँ वहाँ अभिनन्दना (= लालसा) होती है; इस प्रकार आवुस! भविष्य में ॰।”

“आवुस! प्रथम-ध्यान क्या है?”

“आवुस! यहाँ भिक्षु कामनाओं से रहित बुराइयों से रहित, वितर्क-विचार-सहित, विवेक से उत्पन्न प्रीतिसुख वाले प्रथम-ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। यह आवुस! प्रथम-ध्यान कहा जाता है।”

“आवुस! प्रथम-ध्यान किस अंगवाला है?”

“आवुस! प्रथम-ध्यान पाँच अंगों वाला है। आवुस! प्रथम-ध्यान प्राप्त भिक्षु को वितर्क रहता है, विचार रहता है, प्रीति रहती है, सुख रहता है, और चित्त की एकाग्रता रहती है। आवुस! इस प्रकार प्रथम-ध्यान पाँच अंगों वाला है।”

“आवुस! प्रथम-ध्यान किन अंगो से विहीन और किन अंगो से युक्त है?”

“आवुस! प्रथम-ध्यान पाँच अंगो से विहीन और पाँच अंगो से युक्त होता है। आवुस! प्रथम-ध्यान-प्राप्त भिक्षु का कामच्छन्द (= विषय में अनुराग) प्रहीण (= छूट गया) होता है, व्यापाद (= द्रोह) ॰, स्त्यान-मृद्ध (= आलस्य) ॰, औद्धत्य-कौकृत्य (= उद्धतपना-हिचचिकाहट) ॰, विचिकित्सा (= संशय) प्रहीण होती है। वितर्क रहता है, विचार रहता है, प्रीति रहती है, सुख रहता है, चित्त की एकाग्रता रहती है। ॰।”

“आवुस! यह पाँच इन्द्रियाँ; जैसे कि—चक्षु-इन्द्रिय, श्रोत्र ॰, घ्राण ॰, जिह्वा ॰, काय-इन्द्रिय—भिन्न विषयों वाली=भिन्न भिन्न गोचरोवाली हैं; (यह) एक दूसरे के विषय=गोचर को नहीं ग्रहण कर सकतीं; आवुस! भिन्न भिन्न विषयों वाली ॰, एक दूसरे के विषय=गोचर को न ग्रहण कर सकने वाली इन पाँच इन्द्रियों का क्या प्रतिशरण (= आश्रय) है, इनके गोचर=विषय को कौन अनुभव करता है?”

“आवुस! इन पाँच ॰ इन्द्रियो का प्रतिशरण मन है; मन इनके ॰ विषय को अनुभव करता है।”

“आवुस! यह चक्षु ॰ पाँच इन्द्रियाँ किसके प्रत्यय (= आश्रय) से स्थित है?”

“आवुस! यह ॰ पाँच इन्द्रियाँ आयु के आश्रय से स्थित हैं।”

“आवुस! आयु किसके आश्रय से स्थित है?”

“आयु उष्माा (= उष्णता, शरीर की गर्मी) के आश्रय से स्थित है।”

“आवुस! उष्मा किसके आश्रय से स्थित है?”

“उष्मा आयु के आश्रय से स्थित है।”

“आवुस! अभी हम आयुष्मान् सारिपुत्र के भाषण को सुने हैं—‘आयु उष्मा के आश्रय से स्थित है’; अभी (फिर) हम आयुष्मान् सारिपुत्र के भाषण को सुनते हैं—‘उष्मा आयु के आश्रय से स्थित है’। आवुस! इस कथन का मतलब हमें कैसे समझना चाहिये?”

“तो आवुस! मैं तुम्हे उपमा देता हूँ; उपमा से भी कोई कोई विज्ञ पुरूष भाषण का अर्थ समझ जाते हैं। आवुस! जैसे जलते हुये तेल के दीपक में, लौ के सहारे प्रकाश दिखाई पडता है, प्रकाश के सहारे लौ दिखाई पडती है; ऐसे ही आवुस! आयु उष्मा के आश्रय से स्थित है, उष्मा आयु के आश्रय से स्थित है।”

“आवुस! वही आयु-संस्कार हैं, और वही वेदनीय (= अनुभव के विषय) धर्म (= पदार्थ) हैं; अथवा आयु-संस्कार दूसरे हैं, और वेदनीय-धर्म दूसरे हैं?”

“आवुस! आयु-संस्कार और वेदनीय-धर्म एक नहीं है; यदि आयु-संस्कार और वेदनीय-धर्म एक होते; तो संज्ञा-वेदित-निरोध (ध्यान) में अवस्थित भिक्षु का (वेदना-रहित अवस्था से वेदना सहित अवस्था में) उठना न होता। चूँकि आवुस! आयु-संस्कार दूसरे हैं, और वेदनीय-धर्म दूसरे हैं, इसलिये संज्ञा-वेदित-निरोध में अवस्थित भिक्षु का उठना होता है।’

“आवुस! कितने धर्म (= पदार्थ) इस काया को छोडते हैं, जब कि यह छोड़ा फंेका हुआ अचेतन (शरीर) काठ की भाँति सोता है?”

“आवुस! जब इस काया को आयु, उष्मा और विज्ञान—यह तीन धर्म छोड़ते हैं; तो यह ॰ अचेतन काठ की भाँति सोता है।”

“आवुस! यह जो मरा हुआ=कालकृत है, और जो यह संज्ञा-वेदित-निरोध (ध्यान) में अवस्थित भिक्षु है; इन दोनों में क्या भेद है?”

“आवुस! यह जो मरा हुआ=कालकृत है, इसके काय-संस्कार (= शारीरिक गति) निरूद्ध, शान्त हो गये होते हैं, उसके वाचिक संस्कार निरूद्ध, शान्त हो गये होते हैं, चित्त-संस्कार निरूद्ध शान्त हो गये होते हैं; आयु क्षीण, उष्मा शांत, इन्द्रियाँ उच्छिन्न हो गई रहती हैं। जो वह संज्ञा-वेदित-निरोध में अवस्थित भिक्षु हैं, उसके भी काय-संस्कार (= कायिक क्रियायंे), वाचिक-संस्कार, चित्त-संस्कार निरूद्ध ओर प्रतिप्रश्रब्ध होते हैं, किन्तु उसकी आयु क्षीण नहीं होती, उष्मा शान्त नहीं होती, इन्द्रियाँ विशेषतः प्रसन्न (= निर्मल) होती हैं। यह है आवुस! ॰ (दोनों) का भेद।”

“आवुस! सुख-दुख (दोनों)-रहित चेतो-विमुक्ति की समापत्ति (= प्राप्ति) के कितने प्रत्यय (= आश्रय) है?”

“आवुस! चार हैं ॰ (जब) भिक्षु सुख और दुःख के परित्याग से; सौमनस्य (= चित्तोल्लास), और दौर्मनस्य (= चित्त संताप) के पहिले ही अस्त हो जाने से, सुख-दुःख रहित उपेक्षा से स्मृति की परिशुद्धि वाले चतुर्थ ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। यह आवुस! सुख-दुःख-रहित चेतोविमुक्ति समापत्ति के चार प्रत्यय हैं।”

“आवुस! आनिमित्त-चेतोविमुक्ति की समापत्ति के लिये कितने प्रत्यय हैं?”

“आवुस! ॰ दो प्रत्यय हैं—(1) सारे निमित्तों (= रूप-आकृति आदि) का मन में न करना; और (2) अ-निमित्त धातु (= लोक) का मन में करना। यह आवुस! ॰।”

“आवुस! आनिमित्त-चेतोविमुक्ति की स्थिति के लिये कितने प्रत्यय है?”

“आवुस! ॰ तीन प्रत्यय हैं—(1) सारे निमित्तों को मन में न करना; (2) अ-निमित्त धातु को मन में करना ; और (3) पूर्व का अभिसंस्कार (= संस्कार)। यह आवुस! ॰।”

“आवुस! आनिमित्त-चेतोविमुक्ति के उत्थान के कितने प्रत्यय हैं?”

“आवुस! ॰ दो प्रत्यय हैं—(1) सारे निमित्तों को मन में न करना; और (2) अनिमित्त-धातु को मन में न करना। यह आवुस! ॰।”

“आवुस! जो यह अप्रमाणा चेतोविमुक्ति है, जो यह आकिंचन्या चेतो-विमुक्ति है, जो यह शून्यता चेतोविमुक्ति है, और जो यह आनिमित्त-चेतोविमुक्ति है; यह धर्म (= पदार्थ) नाना-अर्थ-वाले और नाना-व्यंजन-वाले हैं, अथवा एक-अर्थ-वाले किन्तु नाना-व्यंजन-वाले हैं?”

“आवुस! ॰ ऐसा मतलब (= पर्याय) है, जिससे यह (चारों) धर्म नाना-अर्थ-वाले, नाना-व्यंजन-वाले हैं; ऐसा मतलब भी है, जिससे कि यह एक-अर्थ-वाले हैं व्यंजन ही (इनका) नाना है। क्या है वह मतलब जिससे यह ॰?—आवुस! (जब) भिक्षु (1) मैत्रीयुक्त चित्त से एक दिशा को पूर्ण कर विहरता है, वैसे ही दूसरी दिशा को, वैसे ही तीसरी दिशा को, वैसे ही चैथी दिशा को, इस प्रकार ऊपर नीचे, आडे-बेडे, सबके विचार से सबे अर्थ, विपुल, महान्, प्रमाण-रहित (= अति-विशाल), वैर-रहित, व्यापाद-रहित, मैत्री-युक्त चित्त से सभी लोक को पूर्ण कर विहरता है। (2) करूणायुक्त चित्त से ॰। (3) मुदिता-युक्त चित्त से ॰। (4) उपेक्षा-युक्त चित्त से ॰। यह आवुस! प्रमाणा चेतोविमुक्ति कही जाती है।

“क्या है आवुस! आकिंचन्या चेतोविमुक्ति?”—आवुस! (जब) भिक्षु विज्ञान-आयतन को अतिक्रमण कर, ‘कुछ नहीं है’ (= अ-किंचन)—इस आकिंचन्य-आयतन को प्राप्त हो विहरता है; यह आवुस! आकिंचन्या चेतोविमुक्ति है।

क्या है आवुस! शून्यता चेतोविमुक्ति?—आवुस! (जब) भिक्षु अरण्य, वृक्ष-छाया या शून्य-आगार में रहते यह सोचता है—‘यह सभी (जगत्) आत्मा या आत्मीय से शून्य है’; यह आवुस! ॰। क्या है आवुस! आनिमित्ता चेतोविमुक्ति? आवुस! (जब) भिक्षु सभी निमित्तों को मन में न कर, अनिमित्त चित्त की समाधि को प्राप्त कर विहरता है; यह है आवुस! ॰ं यह है आवुुस! मतलब, जिस मतलब से यह धर्म नाना-अर्थ-वाले और नाना व्यंजन-वाले है।

“क्या है आवुस! मतलब, जिस मतलब से यह एक-अर्थ-वाले हैं, व्यंजन ही (इनके) नाना हैं?—आवुस! राग, द्वेष, मोह (-यह तीनों) प्रमाण करने वाले हैं; किन्तु क्षीणास्रव (= चित्तमलों से मुक्त, अर्हत्) भिक्षु के वह क्षीण हो गये, जड से उच्छिन्न हो गये हैं, सिर-कटे ताढ की तरह हो गये हैं, अभाव को प्राप्त हो गये हैं, भविष्य में उत्पन्न होने योग्य नहीं रह गये हैं। आवुस! जितनी अप्रमाणा चेतोविमुक्तियाँ है, अकोप्या (चेतो-विमुक्ति) उनमें (सबसे) श्रेष्ठ है। अकोप्या चेतो-विमुक्ति राग-द्वेष-मोह से शून्य है। आवुस! राग किंचन है, द्वेष किंचन है, मोह किंचन है। वह (राग, , द्वेष, मोह), क्षीणास्रव भिक्षु के क्षीण हो गये ॰। आवुस! जितनी आकिंचन्या चेतोविमुक्तियाँ हैं, अकोप्या चेतोविमुक्ति उनमें (सर्व)-श्रेष्ठ है। और वह अकोप्या चेतोविमुक्ति राग-द्वेष-मोह से शून्य है। आवुस! राग निमित्त-करण है, द्वेष निमित्तकरण है, मोह निमित्त-करण है। वह, क्षीणास्रव भिक्षु के क्षीण हो गये ॰। आवुस! जितनी अनिमित्ता चेतोविमुक्तियाँ हैं, अकोप्या चेतोविमुक्ति उनमें (सर्व)-श्रेष्ठ है। वह अकोप्या चेतोविमुक्ति राग-द्वेष-मोह से शून्य है। आवुस! यह मतलब (= पर्याय) है, जिस मतलब से यह धर्म एक-अर्थ-वाले हैं, व्यंजन ही (इनके) नाना हैं।”

आयुष्मान् सारिपुत्र ने यह कहा; सन्तुष्ट हो आयुष्मान् महाकोट्ठित ने आयुष्मान् सारिपुत्र के भाषण को अभिनंदित किया।