मज्झिम निकाय

44. चूल-वेदल्ल-सुत्तन्त

ऐसा मैंने सुना—

एक समय भगवान् राजगृह में कलन्दनिवाप वेणुवन में विहार करते थे।

तब उपासक विशाख जहाँ धम्मदिन्ना भिक्षुणी थी, वहाँ गया, जाकर धम्मदिन्ना भिक्षुणी को अभिवादन कर एक ओर बैठा। एक ओर बैठे उपासक विशाख ने धम्मदिन्ना भिक्षुणी को यह कहा—

“आर्ये (= अय्या)! ‘सत्काय’ ‘सत्काय’ कहा जाता है; आर्ये! भगवान् ने किसे सत्काय कहा है?”

“यह जो रूप उपादान-स्कंध, वेदना उपादान-स्कंध, संज्ञा उपादान-स्कंध, संस्कार-उपादान-स्कंध, विज्ञान उपादान-स्कंध हैं; आवुस विशाख! इन्हीं पाँच उपादान-स्कंधो को भगवान् ने सत्काय कहा है।”

“साधु, आर्ये!”— (कह) उपासक विशाख ने धम्मदिन्ना र्भिक्षुणी के भाषण को अभिनंदित कर=अनुमोदित कर; धम्मदिन्ना भिक्षुणी से आगे का प्रश्न पूछा—

“अय्या! ‘सत्काय-समुदय’, ‘सत्काय-समुदय’ कहा जाता है; अय्या! भगवान् ने किसे सत्काय-समुदय कहा है?”

“आवुस विशाख! जो यह सुख-संबंधी इच्छा से संयुक्त, उन उन (विषयों) को अभिनन्दन करन ेवाली आवागमन की तृष्णा है; जैसे कि काम-तृष्णा, भव (= जन्म)-तृष्णा, विभव-तृष्णा, आवुस विशाख! इसी (तृष्णा) को भगवान् ने सत्काय-समुदय (= आत्मवाद का कारण) कहा है।”

“अय्या! ‘सत्काय-निरोध’, ‘सत्काय-निरोध’ कहा जाता है। अय्या! भगवान् ने किसे सत्काय-निरोध (= आत्मा के ख्याल का नाश) कहा है?”

“आवुस विशाख! उसी तृष्णा का जो सम्पूर्णतया वैराग्य विनाश (= निरोध), त्याग= प्रतिनिस्सर्ग, मुक्ति, अनालय (= अनासक्ति) है; आवुस विशाख! इसे भगवान् ने सत्काय-निरोध कहा है।”

“अय्या! ‘सत्काय-निरोध गामिनी प्रतिपद्’, ‘सत्काय-निरोध-गामिनी प्रतिपद्’ कहा जाता है। अय्या! भगवान् ने किसे सत्काय-निरोध-गामिनी प्रतिपद् (= आत्मा के ख्याल के नाश की ओर ले जाने वाला मार्ग) कहा है?”

“आवुस विशाख! भगवान् के सत्काय-निरोध-गामिनी प्रतिपद् कहा है, इसी आर्य-अष्टांगिक-मार्ग को; जैसे कि-सम्यग्-दृष्टि, सम्यक्-संकल्प, सम्यग्-वचन, सम्यक्-कर्मान्त, सम्यग्-आजीव, सम्यग्-स्मृति, सम्यक्-समाधि।”

“अय्या! वही उपादान है, और वही उपादान-स्कंध है; अथवा उपादान पाँच उपादान स्कंधों से अलग है?”

“आवुस विशाख! न उपादान और पाँच उपादान-स्कंध एक है, न उपादान पाँच उपादान स्कंधों से अलग है। आवुस विशाख! पाँच उपादान- स्कंधों में जो दृन्द=राग है, वहीं वहाँ उपादान है।”

“कैसे अय्या! सत्काय-दृष्टि होती है?”

“आवुस विशाख! (जब) आर्यो के दर्शन से वंचित, आर्य-धर्म से अपरिचित, आर्य-धर्म में अ-विनीत (= न पहूँचे); सत्पुरूषों के दर्शन से वंचित, सत्पुरूष-धर्म से अपरिचित, सत्पुरूष-धर्म में अ-विनीत, अज्ञ, अनाडी (= पृथग्जन) पुरूष रूप को आत्मा के तौर पर देखता है, या रूपवान् को आत्मा, आत्मा में रूप को, रूप में आत्मा को (देखता है)। वेदना को आत्मा के तौर पर ॰। संज्ञा को आत्मा के तौर पर ॰। संस्कार को आत्मा के तौर पर ॰। विज्ञान को आत्मा के तौर पर ॰। इस प्रकार आवुस विशाख! ॰।”

“क्या है अय्या! आय्र अष्टांगिक मार्ग?”

“आवुस विशाख! आर्य अष्टांगिक मार्ग है यही—सम्यग्-दृष्टि ॰ ।

“अय्या! आर्य अष्टांगिक मार्ग संस्कृत (= कृत) है या अ-संस्कृत!”

“आवुस विशाख! ॰ संस्कृत है।”

“अय्या! आर्य अष्टांगिक मार्ग में तीनों स्कंध संगृहीत हैं, या तीनों स्कंधों में आर्य अष्टांगिक मार्ग संगृहीत है?”

“आवुस विशाख! आर्य अष्टांगिक मार्ग में तीनों स्कंध संगृहीत नहीं हैं, (बल्कि) तीन स्कंधो में आर्य अष्टांगिक मार्ग संगृहीत है। आवुस विशाख! सम्यग्-वचन, सम्यग्-आजीव और सम्यक्-कर्मान्त है, वह…शील-स्कंध में संगृहीत हैं। जो सम्यग्-व्यायाम्, सम्यक्-स्मृति, और सम्यक्-समाधि है, वह…समाधि-स्कंध में संगृहीत हैं। जो सम्यग्-दृष्टि और सम्यक्-संकल्प हैं, वह…प्रज्ञा-स्कंध में संगृहीत हैं।”

“अय्या! क्या है समाधि, क्या हैं समाधि-निमित्त, क्या हैं समाधि-परिष्कार, और क्या है समाधि-भावना?”

“आवुस विशाख! जो चित्त की एकाग्रता है, वही समाधि है। चार स्मृति-प्रस्थान ॰ समाधि-निमित्त (= ॰ चिन्ह) हैं। चार सम्यक्-प्रधान समाधि के परिष्कार हैं। जो उन्हीं धर्मो (= पदार्थो) का सेवन करना=भावना करना, बढ़ाना, यही समाधि भावना है।”

“अय्या! संस्कार कितने हैं?”

“आवुस विशाख! यह तीन संस्कार हैं—काय-संस्कार (= कायिक गति या क्रिया) वचन-संस्कार, चित्त-संस्कार।”

“अय्या! क्या है काय-संस्कार, क्या है वचन-संस्कार, क्या है चित्त-संस्कार?”

“आवुस विशाख! आश्वास-प्रश्वास काय-संस्कार हैं, वितर्क-विचार वचन-संस्कार हैं, संज्ञा और वेदना चित्त-संस्कार हैं।”

“क्यों अय्या! आश्वास-प्रश्वास काय-संस्कार हैं? क्यों वितर्क-विचार वचन-संस्कार है? क्यों वेदना, संज्ञा चित्त-संस्कार हैं?”

“आवुस विशाख! आश्वास-प्रश्वास (= साँस लेना छोडना) यह काया से संबद्ध कायिक धर्म (= क्रियायें) हैं; इसलिये आश्वास-प्रश्वास काय-संस्कार हैं। आवुस विशाख! पहिले वितर्क करके विचार के पीछे वचन निकालता है; इसलिये वितर्क-विचार वचन-संस्कार हैं। आवुस विशाख! संज्ञा और वेदना चित्त से संबद्ध चेतसिक धर्म है; इसलिये संज्ञा और वेदना चित्त-संस्कार हैं।”

“अय्या! कैसे संज्ञा वेदित-निरोध समापत्ति होती है?

“आवुस विशाख! संज्ञा-वेदित-निरोध को समापन्न (= प्राप्त) हुये भिक्षु को यह नहीं होता—‘मैं संज्ञा-वेदिन-निरोध को समापन्न होऊँगा’, ‘मैं संज्ञा-वेदित-निरोध को समापन्न हो रहा हूँ’ या ‘मैं संज्ञा-वेदित-निरोध को समापन्न हुआ’। बल्कि उसका चित्त पहिले ही से इस प्रकार भावित (= अभ्यस्त) होता है, कि वह उस स्थिति को पहूँच जाता है।”

“अय्या! जो संज्ञा-वेदित-निरोध में समापन्न हुआ है, उसके कौन से धर्म पहिले निरूद्ध (= रूद्ध) होते हैं—क्या काय-संस्कार या वचन-संस्कार या चित्त-संस्कार?”

“आवुस विशाख! ॰ समापन्न हुये भिक्षु का पहिले वचन-संस्कार निरूद्ध होता है, फिर काय-संस्कार, तब चित्त-संस्कार।”

“अय्या! संज्ञा-वेदित-निरोध समापत्ति से उट्ठान (= उठना) कैसे होता है?”

“आवुस विशाख! संज्ञा-वेदित-निरोध समापत्ति से उट्ठान करते भिक्षु को यह नहीं होता—‘मैं संज्ञा ॰ से उठूंगा’, या ‘मैं ॰ उठ रहा हूँ’, या ‘मैं ॰ उठा’। बल्कि उसका चित्त पहिले ही से इस प्रकार भावित होता है, कि वह उस स्थित को पहुँच जाता है।”

“अय्या! संज्ञा-वेदित-निरोध समापत्ति से उठते हुये भिक्षु को कौन से धर्म पहिले उत्पन्न होते है—क्या काय-संस्कार, या वचन-संस्कार या चित्त-संस्कार?”

“आवुस विशाख! ॰ उठते हुये भिक्षु को पहिले चित्त-संस्कार उत्पन्न होता है, फिर काय-संस्कार तब वचन-संस्कार।”

“अय्या! संज्ञा-वेदित-निरोध समापत्ति उठे भिक्षु को कितने स्पर्श स्पश्र करते हैं?”

“॰ तीन स्पर्श स्पर्श करते हैं—शून्यता-स्पर्श, अनिमित्त-स्पर्श, और अप्रणिहित (= अदृढ)-स्पर्श।”

“अय्या! ॰ से उठे भिक्षु का चित्त किधर निम्न=किधन प्रवण, =किधर झुका (= प्राग्भार=पहाड) होता है?”

“॰ का चित्त विवेक (= एकान्त चिन्तन) की ओर निम्न=विवेक-प्रवण=विवेक-प्राग्भार होता है।”

“अय्या! किनती वेदनायें हैं?”

“आवुस विशाख! यह तीन वेदनायें हैं—सुखा (= सुखमय) वेदना, दुःखा वेदना, और अदुःख-असुखा वेदना।”

“अय्या! क्या सुखा वेदना है, क्या दुःखा वेदना है, और क्या अदुःख-असुखा वेदना है?”

“आवुस विशाख! जो कोई कायिक या मानसिक अनुभव (= वेदित, वेदयित) सात (= अनुकूल), सुखमय प्रतीत होता है; वह सुखा वेदना है।…जो कायिक या मानसिक अनुभव असात (= प्रतिकूल), दुःखमय प्रतीत होता है; वह दुःखा वेदना है।…और जो कायिक या मानसिक अनुभव न सात न असात प्रतीत होता है; वह अदुःख-असुखा वेदना है।”

“अय्या! सुखा वेदना क्या सुखा है, क्या दुःखा है? दुःखा वेदना क्या सुखा है, क्या दुःखा है? अदुःख-असुखा वेदना क्या सुखा है, क्या दुःखा है?”

“आवुस विशाख! सुखा वेदना रहते वक्त (= स्थिति) सुखा है, परिणाम में दुःखा है। दुःखा वेदना रहते वक्त दुःखा है, परणाम में सुखा है। अदुःख-असुखा वेदना ज्ञान में सुखा है, अज्ञान में दुःखा है।”

“अय्या! सुखा वेदना में कौन अनुशय (= चित्त-मल) चिपटता है? दुःखा वेदना में कौन अनुशय चिपटता है? अदुःख-असुखा वेदना में कौन अनुशय चिपटता है?”

“आवुस विशाख! सुखा वेदना में राग-अनुशय चिपटता है; दुःखा वेदना में प्रतघ (= प्रतिहिंसा)-अनुशय चिपटता है; अदुःख-असुखा वेदना में अविद्या-अनुशय चिपटता है।”

“अय्या! क्या सभी सुखा वेदनाआंे में राग-अनुशय चिपटता है? क्या सभी दुःखा-वेदनाओं में प्रतिघ-अनुशय चिपटता है? क्या सभी अदुःख-असुखा वेदनाओं में अविद्या-अनुशय चिपटता है?”

“आवुस विशाख! सभी सुखा वेदनाओं में राग-अनुशय नहीं चिपटता, न सभी दुःखा वेदनाओं में प्रतिघ-अनुशय चिपटता ह, ै और न सभी अदुःख-असुखा वेदनाओं में अविद्या-अनुशय चिपटता है।”

“अय्या! सुखा वेदना में क्या प्रहातव्य (= त्याज्य) है? दुःखा वेदना में क्या प्रहातव्य है? अदुःख-असुखा वेदना में क्या प्रहातव्य है।”

“आवुस विशाख! सुखा वेदना में राग-अनुशय प्रहातव्य है, दुःखा वेदना में प्रतिघ-अनुशय ॰, अदुःख-असुखा वेदना में अविद्या-अनुशय प्रहातव्य है।”

“अय्या क्या सभी सुखा वेदनाओं में राग-अनुशय प्रहातव्य है? ॰ प्रतिघ-अनुशय प्रहातव्य है? ॰ अविद्या-अनुशय प्रहातव्य है?”

“आवुस विशाख! सभी सुखा वेदनाओं में राग-अनुशय प्रहातव्य नहीं है, ॰ प्रतिघ-अनुशय प्रहातव्य नहीं है, सभी अदुःख-असुखा वेदनाओं में अविद्या-अनुशय प्रहातव्य नहीं है। आवुस विशाख! (जब) भिक्षु कामनाओं से रहित, बुराइयों से रहित, विवेक से उत्पन्न वितर्क-विचार-सहित, प्रीति और सुखवाले प्रथम ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। उस (ध्यान) से वह राग को छोडता है; वहाँ राग-अनुशय नहीं चिपटता। (जब) आवुस विशाख! भिक्षु ऐसा सोचता है—कैसे उस आयतन (= स्थान) को प्राप्त हो विहरूँगा, जिस आयतन को प्राप्त कर आर्य (लोग) इस समय विहर रहे हैं; इस प्रकार अनुत्तर (= उत्तम) विमोक्षों में स्पृहा उपस्थित करने पर स्पृहा के कारण दौर्मनस्य उत्पन्न होता है, उससे (वह) प्रतिघ को छोडता है; वहाँ प्रतिघ-अनुशय नहीं चिपटता। आवुस विशाख! (जब) भिक्षु सुख और दुःख के परित्याग से, सौमनस्य और दौर्मनस्य (= चित्त-संताप) के अस्त हो जाने से, सुख-दुःख-विरहित, उपेक्षा द्वारा स्मृति की परिशुद्धि वाले चतुर्थ ध्यान को प्राप्त हो विहरता है; इससे इस अविद्या को छोडता है; उसमें अविद्या-अनुशय नहीं चिपटता।”

“अय्या! सुखा वेदना का क्या प्रतिभाग (= विपक्षी) है?”

“॰ दुःख-वेदना प्रतिभाग है।”

“अय्या! दुःखा वेदना का क्या प्रतिभाग है?”

“॰ सुखा वेदना प्रतिभाग है।”

“अय्या! अदुःख-असुखा वेदना का क्या प्रतिभाग (= सपक्षी) है?”

“॰ अविद्या प्रतिभाग है।”

“अय्या! अविद्या का क्या प्रतिभाग है?”

“॰ विद्या ॰।”

“अय्या! विद्या का क्या प्रतिभाग है?”

“॰ विमुक्ति ॰।”

“अय्या! विमुक्ति का क्या प्रतिभाग है?”

“॰ निर्वाण ॰।”

“अय्या! निर्वाण का क्या प्रतिभाग है?”

“आवुस विशाख! तुम प्रश्न को अतिक्रमण कर गये। प्रश्नों के पर्यन्त (= सीमा, ) को नहीं पकड रख सके। आवुस विशाख! ब्रह्मचर्य निर्वाण पर्यन्त है, निर्वाण-परायण है=निर्वाण-पय्रवसान है। आवुस विशाख! यदि चाहो तो भगवान् से जाकर इस प्रश्न को पूछो, जैसा तुम्हे भगवान् कहे, वैसा धारण करना।”

तब उपासक विशाख धम्मदिन्ना भिक्षुणी के भाषण को अभिनंदित कर अनुमोदित कर, आसन से उठ धम्मदिन्ना भिक्षुणी को अभिवादन कर, प्रदक्षिणा कर जहाँ भगवान् थे, वहाँ गया; जाकर भगवान् को अभिवादन कर एक ओर बैठा। एक ओर बैठे उपासक विशाख ने जो कुछ धम्मदिन्ना भिक्षुणी के साथ कथा-संलाप हुआ था, वह सब भगवान् से कह दिया। ऐसा कहने पर भगवान् ने उपासक विशाख से यह कहा—

“विशाख! धम्मदिन्ना भिक्षुणी पंढिता है। विशाख! धम्मदिन्ना भिक्षुणी महाप्रज्ञा है। विशाख! यदि तुम मुझे भी इस बात को पूछते, तो मैं भी ऐसे ही उत्तर देता, जैसे कि धम्मदिन्ना भिक्षुणी ने उत्तर दिया। यही इसका अर्थ है। इसी तरह इसे धारण करो।”

भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो उपासक विशाख ने भगवान् के भाषण को अभिनंदित किया।