मज्झिम निकाय

46. महा-धम्मसमादान-सुत्तन्त

ऐसा मैंने सुना—

एक समय भगवान् श्रावस्ती में अनाथपिंडिक के आराम जेतवन में विहार करते थे।

वहाँ भगवान् ने भिक्षुओं को संबोधित किया—“भिक्षुओ!”

“भदन्त!”— (कह) उन भिक्षुओं ने भगवान् को उत्तर दिया।

भगवान् ने यह कहा—“भिक्षुओ! अधिकतर प्राणी इस प्रकार की कामना वाले, इस प्रकार की इच्छावाले, इस प्रकार के अभिप्राय वाले होते है—‘अहो! अनिष्ट=अकान्त=अमनाप धर्म (= पदार्थ) क्षीण हो जायें। इष्ट=कान्त=मनाप धर्म वृद्धि को प्राप्त होवें’। भिक्षुओ! इस प्रकार की कामना वाले ॰ उन प्राणियों के अनिष्ट ॰ धर्म बढ़ते हैं; इष्ट ॰ धर्म क्षीण होते हैं। वहाँ भिक्षुओं! तुम्हें क्या हेतु जान पडता है?”

“भन्ते! हमारे धर्म के भगवान् ही मूल हैं, भगवान् ही नेता हैं, भगवान् ही प्रतिशरण है। अच्छा हो भन्ते! भगवान् ही इस भाषण का अर्थ कहे, भगवान् से सुनकर भिक्षु उसे धारण करेंगे।”

“तो भिक्षुओ! सुनो, अच्छी प्रकार मन मे ं धारण करो कहता हूँ।”

“अच्छा, भन्ते!” (कह) उन भिक्षुओं ने भगवान् को उत्तर दिया।

भगवान् ने यह कहा—“यहाँ भिक्षुओ! आर्यो के दर्शन से वंचित ॰ अज्ञ, अनाडी जन, सेवन करने योग्य धर्मो को नहीं जानता, अ-सेवन करने योग्य धर्मों को नहीं जानता; भजनीय (= सेवनीय) धर्मों को नहीं जानता, अ-भजनीय धर्मों को नहीं जानता। वह सेवनीय धर्मो को न जानते ॰ असेवनीय धर्मो का सेवन करता है, सेवनीय धर्मो का सेवन नहीं करता ॰। असेवनीय धर्मो को सेवन करते, सेवनीय धर्मो को न सेवन करते ॰ उसके अनिष्ट ॰ धर्म बढ़ते हैं, इष्ट ॰ क्षीण होते है। सो किस हेतु?—भिक्षुओ! उस अज्ञ को यह ऐसा ही होता है।

“भिक्षुओ! आर्यों के दर्शन को प्राप्त ॰ बहुश्रुत आर्यश्रावक सेवनीय धर्मो को जानता है, असेवनीय धर्मो को जानता है ॰। ॰ जानते हुये असेवनीय धर्मों को सेवन नहीं करता, सेवनीय धर्मो को सेवन करता है ॰। ॰। सेवन करते ॰ अनिष्ट ॰ धर्म क्षीण होते हैं, इष्ट ॰ धर्म वृद्धि को प्राप्त होते है। सो किस हेतु?—भिक्षुओं! उस अज्ञ को ऐसा ही होता है।

“भिक्षुओं! यह चार धर्म-समादान हैं। कौन से चार?—(1) वर्तमान में दुःखद, भविष्य में भी दुःखद धर्मसमादान; (2) वर्तमान में सुखद, भविष्य में दुःखद; (3) वर्तमान में दुःखद, भविष्य में सुखद; (4) वर्तमान में सुखद, भविष्य में भी सुखद।

“वहाँ, भिक्षुओ! जो यह वर्तमान में दुःखद, भविष्य में भी दुःखद धर्मसमादान है, उसे अविद्या पड़ा अविद्वान् ठीक से नहीं जानता, कि वह धर्मसमादान वर्तमान में दुःखद ॰। अविद्या में पडा अविद्वान् उसे ठीक से न जानते हुये उसका सेवन करता है, उसे छोडता नहीं। उसे सेवन करते, उसको न छोडते हुये उस (पुरूष) के अनिष्ट ॰ धर्म बढ़ते हैं, इष्ट ॰ धर्म क्षीण होते हैं। सो कि हेतु?—अज्ञ को ऐसा ही होता है।

“वहाँ, भिक्षुओ! जो यह वर्तमान में सुखद, भविष्य में दुःखद धर्मसमादान है, उसे अविद्या में पडा अविद्वान् ठीक से नहीं जानता ॰।

“वहाँ, भिक्षुओ! जो यह वर्तमान में दुःखद, भविष्य में सुखद, धर्मसमादान है, उसे अविद्या में पडा अविद्वान् ठीक से नहीं जानता ॰।

“वहाँ, भिक्षुओ! जो यह वर्तमान में सुखद भविष्य में भी सुखद धर्म-समादान है, उसे अविद्या में पड़ा अविद्वान ठीक से नहीं जानता ॰। उसका सेवन नहीं करता, उसे छोडता है। ॰।

“वहाँ, भिक्षुओ! जो यह वर्तमान में दुःखद भविष्य में भी दुःखद धर्म-समादान है, उसे विद्यायुक्त विद्वान् ठीक से जानता है, कि यह ॰। विद्यायुक्त विद्वान् उसे ठीक से जानते हुये उसका सेवन नहीं करता, उसे छोडता है। उसे सेवन न करते, उसको छोडते हुये, उस के अनिष्ट ॰ धर्म क्षीण होते है, इष्ट ॰ धर्म बढते हैं। सो किस हेतु?—विद्वान् को ऐसा ही होता है।

“वहाँ, भिक्षुओ! जो यह वर्तमान में सुखद, भविष्य में दुःखद धर्मसमादान है, उसे विद्यायुक्त विद्वान् ठीक से जानता है, कि वह ॰। ॰।

“॰ जो यह वर्तमान में दुःखद, भविष्य में सुख ॰। ॰।

“॰ जो यह वर्तमान में सुखद, धर्मसमादान है, उसे विद्यायुक्त विद्वान् ठीक से जानता है, कि यह ॰। ॰ उसका सेवना करता है, छोडता नहीं। उसे सेवन करते, उसे न छोडते हुये, उस (पुरूष) के अनिष्ट ॰ धर्म क्षीण होते हैं, इष्ट ॰ धर्म बढते है। सो किस हेतु?—विद्वान् को ऐसा ही होता है।

“भिक्षुओ! कौनसा धर्मसमादान वर्तमान में दुःखद, भविष्य में भी दुःखद है?—(जब) भिक्षुओ! कोई (पुरूष) दुःख के साथ भी, दौर्मनस्य के साथ भी प्राणातिपाती (= हिंसक) होता है। प्राणातिपात (= हिंसा) के कारण दुःख=दौर्मनस्य को झेलता है। दुःख दौर्मनस्य के साथ भी अदिन्नादायी (= चोरी करने वाला) होता है। अदिन्नादान (= चोरी करने) के कारण दुःख दौर्मनस्य भी झेलता है। ॰ काम-मिथ्याचारी (= व्यभिचारी) ॰। ॰ मृषावादी ॰। ॰ चुगुलखोर ॰। ॰ परूष-भाषी ॰। ॰ प्रलापी ॰। ॰ अभिध्यालु (= लोभी) ॰। ॰ व्यापन्न-चित्त (= द्वेषी) ॰। ॰ मिथ्या-दृष्टि (= झूठी धारणा वाला) ॰। यह काया छोड करने के बाद ॰ नरक में उत्पन्न होता हे। भिक्षुओ! यह वर्तमान में दुःखद भविष्य में दुःखद धर्मसमादान कहा जाता है।

“भिक्षुओं! कौनसा धर्मसमादान वर्तमान में सुखद भविष्य में दुःखद होता है?—(जब) कोई (पुरूष) दुःख दौर्मनस्य के साथ भी प्राणातिपाती होता है। ॰। ॰।

“॰ धर्मसमादान (= धर्म स्वीकार, विचार-स्वीकार) वर्तमान में दुःखद भविष्य में सुखद है?॰। ॰।

“॰ धर्मसमदान वर्तमान में सुखद, भविष्य में भी सुखद होता है?—(जब) भिक्षुओ! कोई (पुरूष) सुख=सौमनस्य के साथ भी प्राणातिपात से विरत होता है। प्राणातिपात से विरत होने के कारण सुख सौमनस्य को अनुभव करता है। ॰ अदिन्नादान ॰। ॰। ॰ मिथ्या-दृष्टि ॰। वह काया छोड मरने के बाद ॰ स्वर्गलोक में उत्पन्न होता है। भिक्षुओ! यह वर्तमान में भी सुखद भविष्य में भी सुखद धर्मसमादान कहा जाता है।

“जैसे भिक्षुओ! विष से लिप्त कडवा लौका हो, तब कोई जीवन की इच्छा वाला, मरने की इच्छा न रखने वाला, सुखेच्छुक, दुःखनिच्छुक पुरूष आवे। उसे (लोग) यह कहे—‘हे पुरूष! यह विष से लिप्त कडवा लौका है, यदि इच्छा हो तो पिओ। उसे पीते वक्त भी वह तुम्हे वर्ण-गंध-रस में अच्छा न होगा। पीने के बाद मृत्यु को प्राप्त होगा, या मृत्यु-तुल्य दुःख को’। यदि वह बिना सोचे विचारे उसे पिये, छोडे नही; तो उसे पीते वक्त ॰ मृत्यु-तुल्य दुःख को। भिक्षुओ! वर्तमान में दुःखद, भविष्य में भी दुःखद धर्मसमादान को उस (लौके) के समान कहता हूँ।

“जैसे, भिक्षुओ! (सुंदर) वर्ण-रस-गंध युक्त आबखोरा (= आपानीय कांस्य) हो, और वह विष से संलिप्त हो। तब कोई जीवन की इच्छावाला ॰ पुरूष आवे। ॰। उसे पीते वक्त वह वर्ण-गंध-रस में अच्छा लगेगा; (किन्तु) पीने के बाद वह मृत्यु को प्राप्त होगा, या मृत्यु-तुल्य दुःख को। ॰। भिक्षुओ! वर्तमान में सुखद और भविष्य में दुःखद धर्मसमादान को मैं उस (आबखोरे) के समान कहता हूँ।

“जैसे, भिक्षुओ! नाना औषधियों से मिश्रित गोमूत्र (= पुति-मुत्त) हो। तब (कोई) पांडुरोगी पुरूष आवे। उसको ऐसे कहे—‘हे पुरूष! यह नाना औषधियों से मिश्रित गोमूत्र है; यदि चाहो तो पिओ। तुम्हें पीते वक्त वह वर्ण-गंध-रस में अच्छा न लगेगा; (किन्तु) पीने के बाद तुम सुख (= निरोग) होंगे’। वह सोच विचार कर उसे पिये, छोडे नहीं। ॰। भिक्षुओ! विर्तमान में दुःखद और भविष्य में सुखद धर्मसमादान को मैं उस (गोमूत्र) के समान कहता हूँ।

“जैसे, भिक्षुओ! दही, मधु, घी, खाँड (= फाणित) एक में मिला हो। तब (कोई) लोहू गिरने वाला (= अतिसार का रोगी) पुरूष आवे। उसको ऐसा कहे—‘हे पुरूष! यह एक में मिला दही, मधु, घी, खाँड है; यदि चाहो तो पिओ। पीत वक्त यह वर्ण-गंध-रस में अच्छा लगेगा पीने के बाद (भी) तुम सुखी होंगे। ॰। भिक्षुओ! वर्तमान में भी सुखद और भविष्य में सुखद धर्मसमादान को मैं उस मिश्रित दधि-मधु-सर्पिष्-फाणित के समान कहता हूँ।

“जैसे, भिक्षुओ! वर्षा के अन्तिम मास में शरद्-काल के समय मेघ रहित नभ में चमकता हुआ सूर्य सारे आकाश के अंधकार को ध्वस्त कर प्रकाशें, तपे, और मासे; ऐसे ही भिक्षुओ! यह वर्तमान में भी सुखद और भविष्य में भी सुखद धर्मसमादान, अन्य सारे श्रमण-ब्राह्मणों के प्रवाद (= मत) को ध्वस्तकर प्रकाशता है, तपता है, भासता है।”

भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो उन भिक्षुओं ने भगवान् के भाषण को अभिनंदित किया।