मज्झिम निकाय

47. वीमंसक-सुत्तन्त

ऐसा मैंनं सुना—

एक समय भगवान् श्रावस्ती में अनाथ-पिंडिक के आराम जेतवन में विहार करते थे।

तब भगवान् ने भिक्षुओं को संबोधित किया—“भिक्षुओ!”

“भदन्त!”— (कह) उन भिक्षुओं ने भगवान् को उत्तर दिया।

भगवान् ने यह कहा—“भिक्षुओ! दूसरे के चित्त की बात न जानने वाले वीमंसक (= मीमांसक=विमर्शक=सत्यासत्य-परीक्षक) भिक्षु को सम्यक्-संबुद्ध (= यथार्थ ज्ञानी) है या नहीं यह जानने के लिये तथागत (= लोकगुरू) के विषय मं समन्वेषण (= तहकीकात) करना चाहिये।”

“साधु, भन्ते! हमारे धर्म के भगवान् ही मूल हैं ॰ भगवान् से सुनकर भिक्षु उसे धारण करेंगे।”

“तो भिक्षुओं! सुनों, अच्छी प्रकार मन में धारण करो, कहता हूँ।”

“अच्छा, भन्ते!”— (कह) उन भिक्षुओं ने भगवान् को उत्तर दिया।

भगवान् ने यह कहा—“भिक्षुओ ॰ विमर्शक भिक्षु को तथागत के विषय में चक्षु-श्रोत्र द्वारा जानने योग्य (= विज्ञेय) धर्मों (= बातों) के संबंध में जाँच करनी चाहिये—जो चक्षु-श्रोत्र-विज्ञेय मलिन धर्म (= पाप) हैं, वह (इस) तथागत के हैं, या नहीं? उसकी जाँच करते हुये (जब) वह यह देखता है—चक्षु-श्रोत्र-विज्ञेय मलिन धर्म तथागत में नहीं है।..तब आगे जाँच करता है—जो चक्षु-श्रोत्र-विज्ञेय व्यतिमिश्र (= पाप-पुण्य-मिश्रित) धर्म हैं, वह तथागत में हैं या नहीं?—व्यति-मिश्र धर्म तथागत में नहीं है।…तब आगे जाँच करता है—जो चक्षु-श्रोत्र-विज्ञेय अवदान (= शुद्ध)-धर्म (= पुण्य) हैं, वह तथागत में हैं, या नहीं?—॰ अवदात-धर्म तथागत में हैं।..तब आगे जाँच करता है—दीर्घ काल से यह आयुष्मान् इस कुशल-धर्म (= पुण्य-आचरण) को कर रहे हैं; या अचिर काल से ही कर रहे है?—दीर्घकाल से यह आयुष्मान् इस कुशल-धर्म से युक्त है, अचिरकाल से नहीं…।..तब आगे जाँच करता है—ख्याति-प्राप्त, यश-प्राप्त इन आयुष्मान् भिक्षु में कोई आदिनव (= दोष) हैं या नहीं? भिक्षुओ! जब तक भिक्षु ख्याति प्राप्त यश-प्राप्त होता है, तब कोई कोई दोष उसमें आते हैं। उसकी जाँच करते हुये वह यह देखता है—यह आयुष्मान् भिक्षु ख्याति-प्राप्त यश-प्राप्त हैं, (और) इनमें कोई दोष नहीं आये हैं।…तब आगे जाँच करता है—यह आयुष्मान् भय के बिना विरागी हुये हैं, भय से तो विरागी नहीं हुये; राग के क्षय के कारण वीतराग होने से (वह) कामों (= भोगों) को नहीं सेवन करते?—॰ वीतराग होने से कामों का सेवन नहीं करते। भिक्षुओ! उस भिक्षु से यदि दूसरे यह पूछें—‘(उन) आयुष्मान् के क्या आकार-प्रकार (= ॰ अन्वय) हैं, जिससे कि (आप) आयुष्मान् ऐसा कह रहे हैं—यह आयुष्मान् भय के बिना विरागी हुये हैं, भय से विरागी नहीं हुये; राग के क्षय के कारण वीतराग होने से वह कामों को सेवन नहीं करते।’ तो ठीक तौर से उत्तर देते हुये (वह) भिक्षु (उन्हें) ऐसा उत्तर दे—क्योंकि संघ में विहरते (= रहते) या अकेले विहरते, यह आयुषमान्, सुगत (= सन्मार्गारूढ), दुर्गत (= कुमार्गारूढ) गण-उपदेशक, आमिष (= भोजनाच्छादन)-रक्त, आमिष-अनुपलिप्त (किसी भी व्यक्ति) का तिरस्कार नहीं करते। मैंने इसे भगवान् के मुख से सुना है, भगवान् के मुख से ग्रहण किया है—‘मैं भय के बिना विरागी हूँ, , भय से विरागी नहीं हूँ; राग के क्षय के कारण वीतराग होने से मैं कामों का सेवन नहीं करता।’

“आगे फिर भिक्षुओ! तथागत को ही पूछना चाहिये—चक्षु-श्रोत्र-विज्ञेय मलिन धर्म तथागत में हैं या नहीं? उत्तर देते वक्त तथागत ऐसा उत्तर देंगे—॰ मलिन धर्म (= पाप) तथागत में नहीं है। ॰ व्यतिमिश्र (= पाप-पुण्य-मिश्रित) धर्म ॰। ॰ अवदात-धर्म तथागत में हैं या नहीं? ॰—अवदात-धर्म तथागत में है। इसी (अवदात-धर्म वाले) पथ पर मैं (= तथागत) आरूढ हूँ, यही मेरा गोचर (= विषय) है; मैं उससे रिक्त नहीं हूँ।”

“भिक्षुओ! ऐसे वाद (= सिद्धान्त) वाले शास्ता (= उपदेशक, तथागत) के पास श्रावक (= शिष्य) को धर्म सुनने के लिये जाना चाहिये। उसे शास्ता, कृष्ण-शुक्ल (= अच्छे बुरे) के विभाग के साथ उत्तमोत्तम=प्रणीत-प्रणीत धर्म उपदेशता है। भिक्षुओ! जैसे जैसे शास्ता उस भिक्षु को ॰ धर्म उपदेशता है; वैसे वैसे वह यहाँ धर्मो को समझ कर धर्मो में से किसी धर्म से आस्था प्राप्त करता है; शास्ता मेें श्रद्धा करता है—(हमारे) भगवान् सम्यक्-संबुद्ध हैं, भगवान् का (उपदेशा) धर्म स्वाख्यात (= सुन्दर प्रकार से व्याख्यात) भगवान् का (शिष्य)संध सुप्रतिपन्न (= सुमार्गारूढ़) है।

“भिक्षुओ! यदि उस भिक्षु को दूसरे ऐसा पूछें—‘(उस) आयुष्मान् के क्या आकार प्रकार हैं, जिससे (आप) आयुष्मान् (यह) कह रहे हैंः’—‘भगवान् सम्यक्-संबुद्ध हैं, भगवान् का धर्म स्वाख्यात हैं, संघ सुप्रतिपन्न हैं? अच्छी तरह उत्तर देते हुये भिक्षुओ! (उस) भिक्षु को कहना चाहिये—‘आवुसो! जहाँा भगवान् थे, वहाँ मैं धर्म सुनने के लिये गया। (तब) मुझे भगवान् ने ॰ उत्तमोत्तम=प्रणीत-प्रणीत धर्म उपदेश दिया ॰ संघ सुप्रतिपन्न है’।”

“भिक्षुओ! जिस किसी (पुरूष) को इन आकारो=इन पदों=इन व्यंजनों से तथागत में श्रद्धा निविष्ट होती है, मूल-बद्ध हो प्रतिष्ठित होती है;..वह आकारवती दर्शन-मूलक दृढ़ श्रद्धा कही जाती है। वह (किसी भी) श्रमण, ब्राह्मण, देव, भार (= प्रजापति) ब्रह्मा या लोक में किसी भी (व्यक्ति) से हटाई नहीं जा सकती।”

“भिक्षुओं! इस प्रकार धर्म-समन्वेषणा होती है; इस प्रकार तथागत की धर्मता (= तथ्य) का समन्वेषण (= अन्वेषण) होता है।”

भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो उन भिक्षुओं ने भगवान् के भाषण का अभिनंदित किया।