मज्झिम निकाय

48. कोसम्बिय-सुत्तन्त

ऐसे मैंने सुना—

एक समय भगवान् कौशाम्बी (= कोसम्बी) के घोषिता-राम मंे विहार करते थे।

उस समय कौशाम्बी में भिक्षु भंडन करते=कलह करते, विवाद करते एक दूसरे को मुख (रूपी) शक्ति (= हथियार) से बेधते फिरते थे। वह न एक दूसरे को संज्ञापन (= समझाना) करते थे, न संज्ञापन के पास उपस्थित होते थे; न एक दूसरे को निध्यापन (= समझाना) करते थें, न निध्यापन के पास उपस्थित होते थे। तब कोई भिक्षु जहाँ भगवान् थे, वहाँ गया; जाकर भगवान् को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैइे उस भिक्षु ने भगवान् से यह कहा—

“यहाँ भन्ते! कौशाम्बी में भिक्षु भंडन करते ॰ बेधते फिरते हैं ॰ न निध्यापन के पास उपस्थित होते है।”

तब भगवान् ने किसी भिक्षु को संबोधित किया—“आओ, भिक्षु, तुम मेरे वचन से उन भिक्षुओं से कहो—आयुष्मानों को शास्ता बुला रहे हैं।”

“अच्छा, भन्ते!”—(कह) भगवान् को उत्तर दे, उस भिक्षु ने जहाँ वह (झगडालू) भिक्षु थे, तहाँ….जाकर उन भिक्षुओं से कहा—आयुष्मानों को शास्ता बुला रहे है।”

“अच्छा, आवुस!”—(कह) उस भिक्षु को उत्तर दे, वह भिक्षु जहाँ भगवान् थे, वहाँ…जाकर भगवान् को अभिवादन कर एक ओर बैठ गये। एक ओर बैठे उन भिक्षुओं को भगवान् ने यह कहा—

“सचमुच भिक्षुओ! तुम भंडन करते ॰ न निध्यापन के पास उपस्थित होते हो?”

“हाँ, भन्ते!”

“तो क्या मानते हो, भिक्षुओ! जिस समय तुम भंडन करते ॰ बेधते फिरते हो; क्या उस समय सब्रह्मचारियों (= सधर्मियों) के प्रति गुप्त और प्रकट तुम्हारा मैत्रीपूर्ण कायिक कर्म, ..मैत्रीपूर्ण वाचिक कर्म, …मैत्रीपूर्ण मानसिक कर्म उपस्थित रहता है?”—

“नहीं, भन्ते!”

“इस प्रकार भिक्षुओ! जिस समय तुम भंडन करते ॰, उस समय ॰ मैत्रीपूर्ण मानसिक कर्म उपस्थित नहीं रहता। तो मोघ-पुरूषों! तुम क्या जानते क्या देखते भंडन करते ॰ बेधते फिरते हो? ॰ न निध्यापन के पास उपस्थित होते हो? मोघ-पुरूषों! यह तुम्हें चिरकाल तक अहित और दुःख के लिये होगा।”

तब भगवान् ने (सभी) भिक्षुओं को संबोधित किया—“भिक्षुओ! यह छः धर्म सारा— णीय=प्रियकारक गुरूकारक हैं, (वह) संग्रह (= मेल), अविवाद, सामग्री (= एकता)=एकीभाव के लिये हैं। कौनसे छः?—भिक्षुओं! (1) (जब) भिक्षु का सब्रह्मचारियों के प्रति गुप्त और प्रकट मैत्रीपूर्ण कायिक कर्म उपस्थित होता है। भिक्षुओ! यह भी धर्म साराणीय ॰ एकीभाव के लिये है।

“और फिर भिक्षुओ! (2) ॰ मैत्रीपूर्ण वाचिक कर्म ॰।

“॰ (3) ॰ मैत्रीपूर्ण मानसिक कर्म ॰।

“और फिर भिक्षुओं! (4) भिक्षु के जो धार्मिक धर्म से प्राप्त लाभ हैं, चाहे पात्र चुपढने मात्र भी; उन लाभों को शीलवान् सब्रह्मचारियों के साथ साधारण-भोगी=बाँटकर उपभोग करने वाला होता है। भिक्षुओ! यह भी धर्म साराणीय ॰।

“और फिर भिक्षुओ! (5) उन शीलों (= सदाचारों) से संयुक्त हो सब्रह्मचारियों के साथ विहरता है, जो शील कि अ-खंड=अ-छिद्र (= दोषरहित) अ-शक्ल=अ-कल्मष, सेवनीय, विज्ञों से प्रशसित, अ-निन्दित, समाधि-प्रापक हैं। भिक्षुओ! यह भी धर्म साराणीय ॰।

“और फिर भिक्षुओ! (6) उस दृष्टि (= दर्शन, ज्ञान) से युक्त हो, सब्रह्मचारियों के साथ विहरता है, जो दृष्टि कि आर्य (= निर्मल), निस्तारक हैं; वैसा करने वाले को अच्छी प्रकार दुःख-क्षय की ओर ले जाती है। भिक्षुओ! यह भी धर्म साराणीय ॰।

“भिक्षुओ! यह छः धर्म साराणीय ॰ एकीभाव के लिये हे। भिक्षुओ! जो यह दृष्टि आर्य ॰ हैं, वह इन छःओ साराणीय धर्मो में अग्र (= श्रेष्ठ) संग्राहक=संघातक (= समूह-प्रधान) है। जैसे भिक्षुओ! कूटागार का कूट (= शिखर) अग्र, संग्राहक-संघातक होता है; ऐसे ही जो यह दृष्टि आर्य ॰।

“क्या है भिक्षुओ! यह दृष्टि आर्य ॰ दुःख-क्षय की ओर ले जाती है?—(1) (जब) भिक्षुओ! अरण्य, वृक्ष-छाया या शून्य-आगार में स्थित भिक्षु यह सोचता है—क्या मेरे भीतर वह परि-उत्थान (= चंचलता) अक्षीण नहीं हुआ है, जिस पर्युत्थान से पर्युत्थित चित्त हो मैं यथाभूत (= यथार्थ) को नहीं जान सकता, नहीं देख सकता। भिक्षुओ! यदि भिक्षु काम-राग (= भोग-इच्छा) से पर्युत्थित होता है, (तो) वह पर्युत्थित-चित्त (= चंचल-चित्त) ही होता है। भिक्षुओ! यदि भिक्षु व्यापाद (= द्वेष) से पर्युत्थित होता है ॰। ॰ स्त्यान’—मृद्ध (= कायिक मानसिक आलस्य) ॰। ॰ औद्धत्य-कौकृत्य (= उद्धतपना, हिचकिचाहट) ॰। ॰ विचिकित्सा (= संशय) ॰। ॰ इस लोक की चिन्ता में फँसा ॰। परलोक की चिन्ता में फँसा ॰। भिक्षुओ! जब भिक्षु भंडन करते ॰ बेधते फिरते हैं, (तो) वह पर्युत्थित-चित्त ही होते हैं। वह इस प्रकार जानता है—मेरे भीतर वह पर्युत्थान अ-क्षीण नहीं है ॰। मेरा मानस सत्यों के बोध के लिये सुप्रणिहित (= एकाग्र, निश्चल) है। पृथग्जनों (= अज्ञों) को न होने वाला यह उसे प्रथम लोकोत्तर आर्य-ज्ञान प्राप्त होता है।

“और फिर भिक्षुओ! (2) आर्यश्रावक (= सत्पुरूष शिष्य) यह सोचता है—क्या मैं इस दृष्टि को सेवन करते, भावते, बढाते अपने में शमथ (= शान्ति), निर्वृति (= सुख) को पाता हूँ?—वह इस प्रकार जानता है—॰ निर्वृति को पाता हूँ। ॰ यह उसे द्वितीय लोकोत्तर आर्य-ज्ञान प्राप्त होता है।

“और फिर भिक्षुओ! (3) आर्यश्रावक यह सोचता है—मैं जिस दृष्टि से युक्त हूँ, क्या इससे बाहर भी दूसरे श्रमण ब्राह्मण ऐसी दृष्टि से युक्त है?—॰ दूसरे श्रमण ब्राह्मण ऐसी दृष्टि से युक्त नहीं है। ॰ यह उसे तृतीय लोकोत्तर आर्य-ज्ञान प्राप्त होता है।

“और फिर भिक्षुओ! (4) आर्यश्रावक यह सोचता है—दृष्टि-सम्पन्न (= आर्य-दर्शन युक्त) पुरूष (= पुद्गल) जैसी धर्मता (= स्वभाव, गुण) से युक्त होता है, क्या मैं भी वैसी धर्मता से युक्त हूँ?…भिक्षुओ! दृष्टि-सम्पन्न पुरूष की यह धर्मता है, कि वह ऐसी आपत्ति (= अपराध) का भागी होता है, जिस आपत्ति से उट्ठान (= उठना) हो सके। (आपत्ति हो जाने के) बाद ही वह शास्ता या विज्ञ सब्रह्मचारियों के पास उसकी देशना (= अपराध निवेदन), विवरण (= प्रकट करना)=उत्तानीकरण करता है; देशना करके, विवरण करके, उत्तान करके भविष्य में संवर (= रक्षा) के लिये तत्पर होता है। जैसे भिक्षुओ! अबोध, उत्तान सोने वाला छोटा बच्चा हाथ से या पैर से अंगार छू जाने पर तुरन्त ही समेट लेता है; ऐसे ही भिक्षुओ! दृष्टि-सम्पन्न की यह धर्मता है, कि वह ऐसी आपत्ति का भागी होता है ॰ भविष्य में संवर के लिये तत्पर होता है। (वैसा सोचते) वह जानता है—दृष्टि-सम्पन्न पुरूष जैसी धर्मता से युक्त होता है, मैं भी वैसी धर्मता से युक्त हूँ। ॰ यह उसे चतुर्थ लोकोत्तर आर्य-ज्ञान प्राप्त होता है।

“और फिॅर भिक्षुओ! (5) आर्यश्रावक यह सोचता है—दृष्टि-सम्पन्न पुरूष जैसी धर्मता से युक्त होता है, क्या मैं भी वैसी धर्मता से युक्त हूँ?—भिक्षुओ! दृष्टि-सम्पन्न पुरूष की यह धर्मता है कि वह सब्रह्मचारियों के छोटे बडे (= उच्चावच) करणीयों का ख्याल रखता है; (उनकी) शील-सबंधिनी, चित्त-संबधिनी, प्रज्ञा-संबधिनी शिक्षाओं में वह तीव्र अपेक्षा (= ख्याल) रखता है। जैसे भिक्षुओ! छोटे बच्छे वाली गाय घास चरती जाती है, और बच्छे की ओर देखती रहती है; ऐसे ही भिक्षुओ! दृष्टि-सम्पन्न पुरूष की यह धर्मता है ॰। (वैसा सोचते) वह जानता है—॰ मैं भी वैसी धर्मता से युक्त हूँ। ॰ यह उसे प ंचम लोकोत्तर आर्य-ज्ञान प्राप्त होता है।

“और फिर भिक्षुओ! (6) आर्यश्रावक यह सोचता है—दृष्टि-सम्पन्न पुरूष जैसी बलता से (= सामथ्र्य) से युक्त होता है, क्या मैं भी वैसी बलता से युक्त हूँ?…भिक्षुओ! दृष्टि-सम्पन्न पुरूष की यह बलता है, कि दृष्टि-सम्पन्न पुरूष तथागत के बतलाये धर्म-विनय (= धर्म) के उपदेश किये जाते समय…मन लगाकर चित्त को एकाग्र कर कान लगा धर्म को सुनता है। (वैसा सोचते) वह जानता है—॰ मैं भी वैसी बलता से युक्त हूँ। ॰ यह उसे षष्ठ लोकोत्तर आर्यज्ञान प्राप्त होता है।

“और फिर भिक्षुओ! (7) आर्यश्रावक यह सोचता है—॰ क्या मैं भी वैसी बलता से युक्त हूँ?—भिक्षुओ! दृष्टि-सम्पन्न पुरूष की यह बलता है, कि तथागत के बतलाये धर्म-विनय के उपदेश किये जाते समय (वह) अर्थ-वेद (= अर्थ-ज्ञान) को पाता है, धर्म-वेद को पाता है, धर्म सम्बन्धी प्रामोद्य (= प्रमोद) को पाता है। (वैसा सोचते) वह जानता है—॰ मै भी वैसी बलता से युक्त हूँ। ॰ यह उसे सप्तम लोकोत्तर आर्यज्ञान प्राप्त होता हे।

“भिक्षुअेा! इस प्रकार स्रोत-आपत्ति-फल के साक्षात्कार के लिये सात अंगो से युक्त आर्यश्रावक इस प्रकार सुसमन्विष्ट (= अच्छी प्रकार जाँची गई) धर्मता होती है। भिक्षुओ! इस प्रकार सात अंगो से युक्त आर्यश्रावक स्रोत-आपत्ति-फल से युक्त होता है।’—‘

भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो उन भिक्षुओं ने भगवान् के भाषण को अभिनंदित किया।