मज्झिम निकाय

49. ब्रह्म-निमन्तनिक-सुत्तन्त

ऐसा मैंनं सुना—

एक समय भगवान् श्रावस्ती में अनाथपिंडिक के आराम जेतवन में विहार करते थे।

वहाँ भगवान् ने भिक्षुओं को संबोधित किया—“भिक्षुओ!”

“भदन्त!”—(कह) उन भिक्षुओं ने भगवान् को उत्तर दिया।

भगवान् ने यह कहा—“एक समय मैं भिक्षुओ! उक्कट्ठा के सुभगवन में शालराज के नीचे विहरता था। उस समय भिक्षुओ! वक (नामक) ब्राह्मा को ऐसी बुरी धारणा उत्पन्न हुई थी—‘यह (ब्रह्मलोक) नित्य है, धु्रव, शाश्वत, केवल (= शुद्ध), अ-च्यवन-धर्मा (= जहाँ से च्युति नहीं होती) है; यह न जन्मता है, न जीर्ण होता है, न मरता हैं, न च्युत होता है, न उपजता है। इससे आगे दूसरा निस्सरण (= निकलने का स्थान) नहीं है।

“तब भिक्षुओ! मैं चित्त से वक ब्रह्मा के चित्त की बात जानकर; जेसे बलवान् पुरूष (अप्रयास) अपनी फैलाई बाँह को समेट ले, या समेटी को फैला दे, ऐसे ही उक्कट्ठा के सुभगवन में शालराज के नीचे अन्तर्धान हो उस ब्रह्मलोक में (जाकर) प्रकट हुआ।

“भिक्षुओ! वक ब्रह्मा ने दूर से ही मुझे आते देखा। देखकर मुझसे यह कहा—‘आओ मार्ष। स्वागत, मार्ष! चिरकाल के बाद मार्ष! यहाँ आना हुआ। मार्ष! यह नित्य है ॰ इससे आगे दूसरा निस्सरण नहीं है।’

“भिक्षुओ! ऐसा कहने पर मैंने वक ब्रह्मा को यह कहा—‘अविद्या में पडा है, अहो! वक ब्रह्मा, अविद्या में पडा है, अहो! वक ब्रह्म, जो कि अनित्य होते को नित्य कहता है ॰ इससे आगे (= बढकर) दूसरा निस्सरण होते भी, इससे आगे दूसरा निस्सरण नहीं है—कहता है।

“तब भिक्षुओ! पापात्मा मार एक ब्रह्म-पार्षद के (शरीर) भीतर प्रविष्ट हो मुझसे बोला—‘भिक्षु! भिक्षु! मत इन (ब्रह्मा) का अपमान करो, मन इनका अपमान करो। भिक्षु! यह ब्रह्मा हैं, महाब्रह्मा, अभिभू (= विजेता), अन-अभिभूत, (सर्व-)दर्शी, वशवर्ती, ईश्वर, (सृष्टि-)कर्ता, निर्माता, श्रेष्ठ, स्रष्टा, वशी, भूत-भव्य (प्राणियों) के पिता है। भिक्षु! तुझसे पूर्व भी लोक में पृथिवी-निन्दक, पृथिवी-जुगुप्सु, जल-निन्दक ॰, तेज-निन्दक ॰, वायु-निन्दक ॰, भूुत-निन्दक ॰, देव-निन्दक ॰, प्रजापति-निन्दक ॰, ब्रह्मा-निन्दक ॰, श्रमण ब्राह्मण हुये थे; वह काया छोड़ प्राण के विच्छेद होने पर हीन काया में प्रतिष्ठित हुये। भिक्षु! तुझसे पूर्व भी लोक में पृथिवी प्रशंसक=पृथिवी-अभिनन्दी, ॰, ॰ ब्रह्मा-प्रशंसक ॰, श्रमण ब्राह्मण हुये थे; वह काया छोड प्राण के विच्छेद होने पर उत्तम काया में प्रतिष्ठित हुये। सो मैं भिक्षु! तुझे यह कहता हूँ—अरे मार्ष! जो कुछ ब्रह्मा तुझे कहें, तू वही कर, मत ब्रह्मा के वचन का अतिक्रमण कर। यदि तू भिक्षु! ब्रह्मा के वचन का अतिक्रमण करेगा; तो जैसे आदमी आती श्री (= लक्ष्मी) को डंडे से लौटा दे; या जैसे आदमी नरक को प्रपात (= खड्ड) में गिरता हाथ-पैर से पृथिवी को विरक्त (= त्यक्त) करे; ऐसी ही हालत भिक्षु! तेरी होगी। अरे मार्ष! जो कुछ ब्रह्मा तुझे कहें, तू वही कर, मत ब्रह्मा के वचन को अतिक्रमण कर। क्यों भिक्षु! ब्राह्मी (= ब्रह्मा की) परिषद् बैठी देख रहा है तू? इस प्रकार भिक्षुओ! पापात्मा मारी ब्रह्मी परिषद् की ओर (मेरा ख्याल) ले गया।

“ऐसा कहने पर भिक्षुओ! मैंने पाप्मा मार को यह कहा—‘पापी! मैं तुझे जानता हूँ, मत समझ कि मैं तुझे नहीं जानता। पापी! तू मार है। पापी! जो ब्रह्मा है, जो ब्रह्म-परिषद् है, और ब्रह्मपार्षद हैं, सभी तेरे हाथ में है, सभी तेरे वश में है। पापी! तुझे ऐसा होता है, यह (= मैं) भी मेरे हाथ में आवे, यह भी मेरे वश में हो। किन्तु पापी! मैं तेरे हाथ में नहीं आया, मैं तेरे वश में नही आया हूँ।

“ऐसा कहने पर भिक्षुओ! वक ब्रह्मा ने मुझे यह कहा—मार्ष! मैं नित्य होते ही को नित्य कहता हूँ, ॰ आगे दूसरा निस्सरण न होने ही पर, आगे दूसरा निस्सरण नहीं है—कहता हॅँ। भिक्षु! तुझसे पूर्व भी लोक में श्रमण ब्राह्मण हुये। जितनी तेरी सारी आयु है, उतना उनका (केवल) तप-कर्म (का समय) था। वह आगे दूसरा निस्सरण होने पर ‘आगे दूसरा निस्सरण है’; आगे दूसरा निस्सरण न होने पर ‘आगे दूसरा निस्सरण नहीं है’, यह जान सते थे। सो भिक्षु! मैं तुझसे यह कहता हूँ, तू आगे दूसरा निस्सरण नहीं देख पायेगा, सिर्फ परेशानी का भागी बनेगा। यदि भिक्षु! तू पृथिवी के अध्येषणा (= प्रार्थना) करेगा, तो तू मेरा पाश्र्वचर, गृहशायी, यथेच्छकारी, स्वल्पकारी होगा। यदि भिक्षु तू जल की ॰, तेज की ॰, वायु की ॰, भूत की ॰, देवता की ॰, प्रजापति की ॰, ब्रह्मा की ॰।

“ब्रह्मा! मैं भी इसे जानता हूँ, (कि) यदि मैं पृथिवी की अध्येषणा करूँगा, तो मैं तेरा पाश्र्वचर ॰ होऊँगा। ॰। ब्रह्मा की ॰। किन्तु ब्रह्मा! मैं तेरी गति (= निष्पत्ति), और प्रभाव (= जुति) को जानता हूँ—ऐसा महर्द्धिक (= महाऋद्धि वाला) वक ब्रह्मा है, ऐसा महानुभाव (= महाप्रभावशाली) वक ब्रह्मा हैं, ऐसा शक्तिशाली (= महेसक्ख) वक ब्रह्मा है।’

“क्या तू मार्ष! मेरी गति, जुति को जानता है—ऐस महर्द्धिक वक ब्रह्मा है ॰?”

‘चाँद-सूर्य जितने को धारण करते हैं, (जितनी) दिशायें प्रकाश से प्रकाशित होती हैं।
उतने हजार लोक यहाँ (= जगत में) तेरे वश में है।
तू रागी-विरागियों के वार-पार को जानता है।
प्राणियों के इत्थंभाव, अन्यथा-भाव, गति और अ-गति को जानता है।

“‘ब्रह्मा! इस प्रकार मैं तेरी गति जुति को जानता हूँ—ऐस महर्द्धिक ॰। ब्रह्मा! और भी तीन काय (= लोक-समूह) हैं, जिन्हे तू नहीं जानता देखता, (किन्तु) मैं उन्हें जानता देखता हूँ। ब्रह्मा! आभास्वर नामक (देव-)काय है, जहाँ से च्युत होकर कि तू यहाँ उत्पन्न हुआ। चिरकाल के (यहाँ के) निवास से तुझे उसका स्मरण नहीं, जिससे तू उसे नहीं जानता देखता, (किन्तु) उसे मैं जानता देखता हूँ। इस तरह भी ब्रह्मा! अभिज्ञा (= ज्ञान) में मैं तेरे बराबर नहीं हूँ बल्कि तुझसे बढकर हूँ; कम कहाँ से हूँगा। ब्रह्मा! शुभकृत्स्न नामक (देव-)काय भी है, ॰। ब्रह्मा वृहत्फल नामक (देव-)काय भी है ॰ बल्कि तुझसे बढकर हूँ। ब्रह्मा! मैं पृथिवी को पृथिवी के तौर पर जानकर, जो (निर्वाण)=पृथिवी के पृथिवीत्तव से परे है, उसे भी जानकर; मैंने (तृष्णा की दृष्टि, या मान के ग्रहण से) पृथिवी को नहीं (पकडा) था, पृथिवी का नहीं था, पृथिवी से नहीं था, पृथिवी मेरी है (यह मुझे) नहीं हुआ; पृथिवी का अभिवादन (= प्रशंसा) मैंने नहीं किया। इस तरह भी ब्रह्मा! अभिज्ञा में मै तेरे बराबर नहीं, बल्कि तुझसे बढकर हूँ, कम कहाँ से हूँगा। ब्रह्मा! मैं जल को जल के तौर पर जानकर ॰। ॰ तेज को ॰। ॰ बायु को ॰। ॰ भूत को ॰। ॰ देवता को ॰। ॰ प्रजापति को ॰। ॰ ब्रह्मा को ॰। ब्रह्मा! मैं सर्व (= सारे विश्व) को सर्व के तौर पर जानकर ॰ सर्व मेरा है (यह मुझे) नहीं हुआ, ॰।

“‘यदि मार्ष! तेरा सर्व (= सारा) सर्वत्व से अन्-अनुभूत (= अ-प्राप्त) है; तो तेरा (= सारा वचन) रिक्त (= खाली, निरर्थक)=तुच्छ ही है?’

“‘विज्ञान अ-निदर्शन (= चक्षु का अ-विषय) है, अनन्त (और) सर्वत्र प्रभा-युक्त है; वह पृथिवी के पृथिवीत्व से अ-प्राप्त है, जल के जलत्व से अ-प्राप्त है, तेज के तेजस्तव से अ-प्राप्त है, वायु के वायुत्व से अ-प्राप्त है, भूतो के ॰, देवो के ॰, प्रजापति के ॰, ब्रह्मा के ॰ आभास्वरों के ॰, शुभकृत्स्नों के ॰, वृहत्फलो के ॰, सर्व के सर्वत्व से अ-प्राप्त है।’

“‘हन्त! मार्ष! तुझे मैं (अपनी दिव्यशक्ति से) अन्तर्धान करता हूँ।’

“‘हन्त! ब्रह्मा! यदि चाहता है तो तू मुझे अन्तर्धान कर।’

“तब भिक्षुओ! वक ब्रह्मा ने (दृढ़ मनोबल को लगाया-) ‘श्रमण गौतम को अन्तर्धान करूँ, श्रमण गौतम को अन्तर्धान करूँ—किन्तु मुझे अन्तर्धान नहीं कर सका। ऐसा होने पर भिक्षुओ! मैने वक ब्रह्मा को यह कहा—‘हन्त! ब्रह्मा! मैं तुझे अन्तर्धान करता हूँ।’ ‘हन्त! मार्ष! यदि चाहता है, तो मुझे अन्तर्धान कर।’ तब भिक्षुओ! मैने इस प्रकार का ऋद्धि-बल प्रयोग किया, कि जिससे ब्रह्मा, ब्रह्म-परिषद् और ब्रह्म-पार्षद मेरे शब्द को सुनते थे, किन्तु मुझे देखते न थे; और अन्तर्धान हुये मैंने यह गाथा कही—

“‘भव (= संसार) में भय को देखकर, और भय को विभव का इच्छुक (देख);
मैंने भय का स्वागत नहीं किया, और नन्दी (= तृष्णा) को नहीं स्वीकार किया।

“तब भिक्षुओं! ब्रह्मा; ब्रह्म-परिषद् और ब्रह्म पार्षद् आश्चर्य चकित हो गये—‘आश्चर्य भो! अद्भुत भो!! श्रमण गौतम की महा-ऋद्धिमत्ता, =महा-अनुभावता!!! यह शाक्यपुत्र, शाक्यकुल से प्रब्रजित श्रमण गौतम जिस प्रकार का है, ऐसा महद्धिक=महानुभाव दूसरा श्रमा या ब्राह्मण हमने इससे पहिले नहीं देखा। अहो! भव में खुश, भव-रत, भव-समुदित (= भव से उत्पन्न) प्रजा का इसने उद्धार किया।’

“तब भिक्षुओ! पापी मारने एक ब्रह्म-पार्षद् मंे आवेश कर मुझे यह कहा—‘यदि मार्ष! तू ऐसा जानता है, यदि तू ऐसा अनुबुद्ध (= ज्ञानी) है, (तो) मत श्रावकों को (इस धर्म मार्ग पर) ले जा, मत प्रब्रजितो (= सन्यासियों) को ले जा, मत श्रावकों को धर्म उपदेश कर, मत प्रब्रजितों को धर्म-उपदेश कर। मत श्रावकों के विषय में लोभ कर, मत प्रब्रजितो के विषय में (लोभ कर)। भिक्षु! तुझसे पूर्व भी लोक में अर्हत्, सम्यक्-संबुद्ध का दावा करने वाले श्रमण हुये थे। वह श्रावकों प्रब्रजितों को (अपने धर्म मार्ग पर) ले गये, श्रावकों प्रब्रजितों को (उन्होंने) धर्म-उपदेश किया, श्रावकों प्रब्रजितों के विषय में लोभ किया। वह श्रावकों प्रब्रजितों को ले जाकर, ॰ धर्म-उपदेश कर, ॰ लोभ कर, काया छोड प्राणों के विच्छेद होने पर हीन काय (= योनि) में प्रतिष्ठित हुये। भिक्षु! (किन्तु) तुझसे पूर्व लोक में (दूसरे भी) अर्हत् सम्यक्-संबुद्ध का दावा करने वाले श्रमण हुये। वह श्रावकों प्रब्र्रजितों को (अपने धर्म मार्ग पर) न ले गये, ॰ धर्म-उपदेश नहीं किया, ॰ लोभ नहीं किया; वह ॰, काया छोड प्राणों के विच्छेद के बाद उत्तम काया (= योनि) में प्रतिष्ठित हुये। तुझे भिक्षु! मैं यह कहता हूँ—‘अरे मार्ष! तू बेपर्वा हो वर्तमान के सुख-विहार से युक्त हो विहार कर; मार्ष! व्याख्यान न करना सुंदन है, मत दूसरों को उपदेश कर।’

“ऐसा कहने पर भिक्षुओ! मैंने पापी मार से कह—‘पापी! मैं जानता हूँ तुझें; तू मत समझ कि मैं तुझे नहीं पहिचानता। पापी! तू मार है। पापी! हित, अनुकम्पक हो तू मुझे यह नहीं कह रहा है। पापी! अ-हित, अन्-अनुकम्पक हो तू मुझे यह कह रहा है। पापी! तुझे ऐसा हो रहा है—श्रमण गौतम जिनको धर्म-उपदेश करेगा, वह मेरे विषय (= अधिकार) से निकल जायेंगे। पापी! (उपदेश न देने वाले) वह श्रमण ब्राह्मण सम्यक् संबुद्ध न होते हुये, ‘हम सम्यक् संबुद्ध है’—दावा करते थे। पापी! श्रावकों को उपदेश करते भी तथागत वैसे ही हैं, ॰ न उपदेश करते भी ॰, श्रावकों को उपनयन (= धर्म मार्ग पर ले जाना) करते भी ॰, ॰ न उपनयन करते भी ॰। सो कि हेतु?—तथागत के वह आस्रव (= चित्त-मल) क्षीण हो गये, उच्छिन्न-मूल हो गये, सिरकटे ताड से हो गये, अभाव को प्राप्त हो गये, भविष्य में न उत्पन्न होने लायक हो गये, जो (आस्रव) कि समल, पुनर्जन्मकारक, भय-मुक्त, दुःख-विपाक वाले, भविष्य में जरा-मरण देने वाले है। जैसे पापी! सिरकटा ताड फिर बढ़ने के अयोगय है, ऐसे ही पापी! तथागत के वह आस्रव क्षीण हो गये ॰ भविष्य में न उत्पन्न होने लायक हो गये।”

इस प्रकार यह (सूत्र) मार के अन्-उल्लापन (= प्रलोभन मं न पडने) के लिये, और ब्रह्मा के निमंतन (= निमंत्रण) से (कहा गया), इसलिये इस व्याकरण (= उपदेश) का ानाम ब्रह्म-निमन्तनिक पडा।