मज्झिम निकाय

50. भारतज्जनीय-सुत्तन्त

ऐसा मैंने सुना—

एक समय आयुष्मान् महामोग्गलान (= महामोद्गल्यायन) भर्ग (देश) में सुंसुमासरगिरी भेस कलावन मृगदाव में विहार करते थे।

उस समय आयुष्मान् महामोग्गलान खुली जगह में टहल रहे थे। उस समय पापी मार आयुष्मान् महामोग्गलान की कुक्षि में घुसा था, कोठे में प्रविष्ट हुआ था। तब आयुष्मान् महामोग्गलान को ऐसा हुआ—अरे! क्यों मेरा पेट उडद भरा सा गुडगुडा रहा है। तब आयुष्मान् महामोग्गलान टहलने के स्थान से उतर विहार (= कोठरी) में प्रवेश कर बिछे आसन पर बैठे। बैठ कर आयुष्मान् महामोग्गलान अपने मन में कारण खोजने लगे। (तब) आयुष्मान् महामोग्गलान ने पापी मार को कुक्षि में घुसा ॰ देखा। देखकर पापी मार को यह कहा—‘निकल, पापी! मत तथागत या तथागत के श्रावक (= शिष्य) को सता; मत (यह) चिरकाल तक तेरे लिये अहितकर दुःखकर हो।’ तब पापी मार को यह हुआ—‘यह श्रमण मुझे बिना जाने, बिना देखे यह कह रहा है—‘निलकल पापी! ॰। जो इसका शास्ता (= गुरू) है, वह भी मुझे जल्दी नहीं जान सकता, यह श्रावक (= शिष्य) मुझे क्या जानेगा?’

तब आयुष्मान् महामोग्गलान ने पापी मार को यह कहा—“पापी! मैं यहाँ तुझे पहिचान रहा हूँ, तू मत समझ—(यह) मुझे नही पहिचानता। तू मार है पापी! मुझे यह हो रहा है, पापी!—‘यह श्रमण मुझे बिना जाने, बिना देखे, मार कह रहा है ॰ यह श्रावक मुझे क्या जानेगा।’

तब पापी मार को यह हुआ—‘यह श्रमण मुझे जान कर ही, देखकर ही, ऐसा कह रहा है—निकल पापी! ॰ दुःख कर हो।’ तब पापी मार आयुष्मान् महामोग्गलान के मुख से निकल कर किवाड़ के सामने खडा हुआ।

आयुष्मान् महामोग्गलान ने मार पापी को किवाड के सामने खडा देखा। देखकर मार पापी को यह कहा—पापी! यहाँ भी मैं तुझे देखता हूँ। तू मत समझ—यह मुझे नहीं देख रहा है। पापी! यह तू किवाड (= अर्गल) के सामने खडा है। पापी! भूतकाल में मै दूसी नामक मार था। उस (समय) मेरी काली नामक बहिन थी, उसका तू पुत्र था; इस तरह (तब) तूू मेरा भांजा था। पापी! उस समय भगवान् ककुसन्ध (= ऋकुच्छन्द) अर्हत् सम्यक्-संबुद्ध लोक में उत्पन्न हुये थे। अर्हत् सम्यक्-संबुद्ध भगवान् ककुसन्ध के विधुर और संजीव नामक प्रधान श्रावक-युगल (= शिष्यों की जोडी), भद्र-युगल था। पापी! ॰ भगवान् ककुसंध के जितने श्रावक थे, उनमें कोई धर्म-उपदेश करने में आयुष्मान् विधुर के बराबर नहीं था। इसी (विधुर=अ-समान) मतलब से आयुष्मान् विधुर का ‘विधुर’ नाम पड़ गया। और आयुष्मान् संजीव अरण्य, वृक्षछाया या शून्य-आगार में बिना कठिनाई के संज्ञा-वेदित-निरोध (-समाधि) में प्राप्त हो जाते थे। पापी! किसी एक समय आयुष्मान् संजीव एक वृक्ष के नीचे संज्ञा-वेदित-निरोध (समाधि) में स्थित थे। तब गोपाल कों, पशुपालकों, कृषकों, बटोहियों ने आयुष्मान् संजीव को एक वृक्ष के नीचे संज्ञा-वेदिन-निरोध (समाधि) में स्थित हो बैठे देखा। देखकर उनके (मन में) यह हुआ—आश्चर्य है! अद्भूत है!! यह श्रमण बैठे ही बैठे ही मर गया; आओ! इसे जला दे।…तब वह गोपालक ॰ तृण, काष्ठ, कंडा जमाकर, (उस पर) आयुष्मान् संजीव के शरीर को रखकर आग दे चले गये।…तब आयुष्मान् संजीव उस रात के बीतने पर उस समाधि से उठकर, चीवरों (= वस्त्रों) को झाड़कर पूर्वाह्न समय पहिनकर पात्र-चीवर ले गाँव में पिंडचार के लिये प्रविष्ट हुये।…उन गोपालकों ॰ ने आयुष्मान् संजीव को पिंडचार करते देखा। देखकर उन्हंे यह हुआ—‘आश्चर्य है! अद्भूत है!! यह श्रमण बैठे ही बैठे मर गया था, और (अब) संजीवित (= जीवित) हो गया। पापी! इसी (संजीवित होने) के मतलब से आयुष्मान् संजीव का संजीव नाम पड़ गया।

“तब फिर…मार को यह हुआ—इन शीलवान्, कल्याणधर्मा भिक्षुओं की मैं गति अ-गति को नहीं जानता; क्यों न मैं ब्राह्मण गृहस्थों को भरमाऊँ—आओ! तुम शीलवान् कल्याणधर्मा भिक्षुओं को निन्दो, परिहास करो, चिढाओं, सताओ; जिसमें कि तुमसे निन्दित, परिहास किये, चिढाने, सताये जाने पर इनके चित्त में विकार पैदा हो; फिर दूसी मार को मौका मिल जाये। तब पापी! दूसी मार द्वारा भरमाये वह ब्राह्मण गृहस्थ उन शीलवान् कल्याणधर्मा भिक्षुओं को निन्दने लगे ॰—‘यह नीच, काले, ब्रह्मा के पद से उत्पन्न, मुंडक श्रमण—हम ध्यानी हैं—यह अभिमान करते अधोमुख आलसी हो ध्याते (= ध्यान लगाते) हैं, प्र-ध्याते, नि-ध्यातें, अप-ध्याते हैं; जैसे कि उल्लू वृक्ष की शाखा पर चूहे की तलाश में ध्याता हैं, प्रध्याता ॰; ऐसेही यह नीच ॰ अप-ध्यातें है। जैसे कि, गीदड (= कोन्थु) नदी के तीर मछलियों की तलाश में ध्याता है॰। जैसे कि बिल्ली कोने-पाखाने-कूडे़ में चूहों की तलाश में ध्याती है॰। जैसे कि लादी से छूटा गदहा, कोने-पाखाने-कूड़े में ध्याता है ॰। पापी! उस समय जो मनुष्य मरते थे, (= उसी पाप से) अधिकतर काया छोड मरने के बाद अपाय, दुर्गति=विनिपात, नरक में उत्पन्न होते थे।

“तब ॰ भगवान् ककुसंध ने भिक्षुओं को संबोधित किया—भिक्षुओ! ब्राह्मण-गृहपति दूसी मार द्वारा भरमाये गये है—‘आओ! तुम ॰ दुसी मार को मौका मिले। आओ, भिक्षुओ! तुम मैत्रीयुक्त चित्त से एक दिशा को पूर्णकर विहर करो, वैसे ही दूसरी (दिशा) को, वैसे ही तीसरी को, वैसे ही चैथी को। इस प्रकार ऊपर नीचे आडे़-बेड़े भी सबका ख्यालकर, सबके हितार्थ, विपुल, महान, प्रमाणरहित, वैररहित, व्यापाद (= हिंसा)-रहित, मैत्रीयुक्त चित्त से सारे लोक को पूर्णकर विहरो। तुम करूणायुक्त चित्त से ॰ सारे लोक को पूर्ण कर विहरो। तुम मुदिता युक्त चित्त से ॰। तुम उपेक्षा-युक्त चित्त से ॰।’

“…तब ॰ भगवान् ककुसंध द्वारा इस प्रकार उपदेशित, अनुशासित हो, (वह भिक्षु) अरण्य, वृक्षछाया या शून्य-आगार में (जहाँ भी) रहते मैत्रीयुक्त चित्त से ॰ सारे लाक को पूर्णकर विहरते थे। करूणा-युक्त ॰। मुदिता युक्त ॰। उपेक्षा-युक्त ॰।

“तब पापी! दूसी मार को यह हुआ—ऐसा करते भी इन शीलवान् (= सदाचारी) कल्याणधर्मा भिक्षुओंु की गति, आगति को मैं नहीं जान सका; क्यों न मैं ब्राह्मण-गृहपतियों को भरमाऊँ—‘आओ! तुम इन ॰ भिक्षुओं का सत्कार=गुरूकार, मानन=पूजन करो; क्या जाने…तुम्हारे सत्कार ॰ करने से इनके चित्त में विकार पैदा हो; जिसमें कि दुसी मार को मौका मिले।’ …तब दूसी मार द्वारा भरमाये (= आवेश किये) ब्राह्मण गृहपतियों ने ॰ भिक्षुओं का सत्कार ॰ किया।

“पापी! उस समय जो मनुष्य मरते थे, (उनमें) अधिकतर काया छोड मरने के बाद सुगति स्वर्गलोक में उत्पन्न होते थे।

“तब ॰ भगवान् ककुसंध ने भिक्षुओं को संबोधित किया—‘भिक्षुओ! ब्राह्मण-गृहपति दूसी मार द्वारा भरमाये गये है—आओ! तुम ॰। आओ, भिक्षुओ! काया में अशुभ (= गंदगी) देखते, आहार में प्रतिकूलता का ख्याल रखते, सारे लोक में वैराग्य रखते, सारे संस्कारों में (= कृत, उत्पन्न वस्तुओं) में अनित्यता देखते विहरो’।

“…तब ॰ भगवान् ककुसंध द्वारा इस प्रकार उपदेशित=अनुशासित हो, अरण्य में, वृक्ष के नीचे, या शून्य-आगार मं रहते वह भिक्षु काया में अशुभ देखते ॰ विहरने लगे।

“…तब ॰ भगवान् ककुसंध पूर्वाह्न समय पहिनकर पात्र-चीवर ले आयुष्मान् विधुर को पीछे पीछे ले गाँव में पिंड (= भिक्षा) के लिये प्रविष्ट हुये। ….तब दूसी मारने एक बच्चे में आवेश करके रोडा ले आयुष्मान् विधुर के सिर में प्रहार किया। सिर फट गया। …आयुष्मान् विधुर खून गिरते फटे सिर से भी ॰ भगवान् ककुसंध का अनुगमन करते रहे।…तब ॰ भगवान् ककुसंध ने नाग-अवलोकन (= नाग महापुरूष जैसा अवलोकन) किया। दूसी मार इस मंत्र को नहीं जानता था। अवलोकन मात्र ही से दूसी मार अपने स्थान से च्युत हो महानरक में उत्पन्न हुआ।

“…उस महानरक के तीन नाम थे—छः-स्पर्श-आयतनिपक, स-अंकुश-आहत, और प्रत्यात्म-वेदनीय। तब मेरे (= दूसी के) पास आकर नरक वालों ने यह कहा—‘मार्ष! जब (शरीर के चारो ओर से प्रहारित होेते) शूल तेरे हृदय में आकर एक दूसरे से मिल जाये, तब समझना, कि नरक में पकते तुझे एक हजार वर्ष हो गये’। सो पापी! मैं उस महानरक में अनेक वर्षो, अनेक शतवर्षो अनेक सहस्रवर्षो तक पकता रहा। दस हजार वर्षो तक उसी नरक के उत्सद (= उपनरक) में इस वेदना को सहते पकता रहा। उस (समय) मेरा शरीर मनुष्य जैसा था, और मेरा शिर मछली का सा।

वह नकर कैसा था, जिसमें दूसी पचता रहा;
विधुर श्रावक और ककुसंध ब्राह्मण को सता कर?
सौ लौह के शूल थे जो सभी हर एक को वेदना देने वाले थे।
ऐसा वह नरक था, जिसमें दूसी पचता रहा।
विधुर श्रावक और ककुसंध ब्राह्मण को सताकर।
जो बुद्ध का श्रावक भिक्षु इसे जानता है,
ऐसे भिक्षु को सताकर काले दुःख को पाता है।।(1)।।
सरोवर के बीच में कल्प-पर्यन्त रहने वाले विमान हैं,
(जो कि) वैदूर्यवर्ण, रूचिर, अर्चि-मान-प्रभास्वर है।
अलग अलग नाना वर्णो की अप्सरायें वहाँ नाचती है।
जो बुद्ध का श्रावक ॰ काले दुःख को पाता है।।(2)।।
जिसने बुद्ध की प्रेरणा से भिक्षु-संघ के देखते हुये,
मृगार-माता के प्रासाद को पैर के अँगूठे से कँपा दिया।
जो बुद्ध का श्रावक ॰।।(3)।।
जिसने वैजयन्त प्रासाद को पैर के अँगूठे से कँपा दिया।
और ऋद्धि-बल से पूर्ण जिसने देवताओं को उद्विग्न किया।
जो बुद्ध का श्रावक ॰ ।।(4)।।
जिसने वैजयन्त प्रासाद में शक्र को पूछा—
‘क्या आवुस! तू तृष्णा के क्षयवाली मुक्ति को जानता है?’
उसके पूछने पर शक्र ने यथातथा उत्तर दिया।
जो बुद्ध का श्रावक ॰।।(5)।।
जिसने सुधर्मा में, सभा के सामने ब्रह्मा को पूछा—
आवुस! आज भी तेरी वही दृष्टि है जो पहिले थी,
तु ब्रह्मलोक में उस प्रभास्वर वीतिवत्त (= परिवर्तन) को देखता है?’
तब उसे ब्रह्मा ने क्रमशः यथातथा उत्तर दिया—
‘मार्ष! मेरी वह दृष्टि नहीं है, जो पहले थी।
मैं ब्रह्मलोक में उस प्रभास्वर वीतिवत्त को देखता हूँ।
सो मै आज कैसे कह सकता हूँ कि, मैं शाश्वत हूँ।
जो बुद्ध का श्रावक ॰।।(6)।।
जिसने महामेरू के शिखर को विमोक्ष (= ध्यान) से छू दिया।
पूर्व विदेह के वन को, और जो भूमि पर सोने वाले नर हैं (= उन्हें)भी।
जो बुद्ध का श्रावक ॰।।(7)।।
अग्नि नहीं चाहती, कि मैं बाल (= मूर्ख) को डाहूँ।
बाल ही जलती आग से भिड कर जलता है।
इसी प्रकार मार! तू तथागत से लाग करके
आग पकडते बाल की भाँति स्वयं जलेगा।
मार! तथागत से लाग कर तूने (बहुत) पाप कमाया।
पापी! क्या तू समझता है, कि तुझे पाप नहीं पकायेगा?
अन्त तक, चिरकाल तक करते रहने से पाप संचित हो जाता है।
मार! बुद्ध से हट जा, भिक्षुओं से (गिरने की) आशा मत कर।
इस प्रकार भिक्षु ने भेसकलावनल में मार को डाँटा।
तब यह यक्ष उदास हो वहीं अन्तर्धान हो गया।।

5—(इति चूल-यमक-वग्ग।15)

इति मूल-पण्णासक 1।

अथ मज्झिम-पण्णासक