मज्झिम निकाय

52. अट्ठकनागर-सुत्तन्त

ऐसा मैंने सुना—

एक समय आयुष्मान् आनन्द वैशाली के वेलुवगामक (= वेणुग्राम) में विहरते थे।

उस समय अट्ठकनागर दसम गृहपति किसी काम से पाटलिपुत्र आया हुआ थां तब दसम गृहपति, जहाँ कुक्कुटाराम में कोई भिक्षु था, वहाँ गया; जाकर उस भिक्षु को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे ॰ दसम गृहपति ने उस भिक्षु से यह कहा—“भन्ते! आयुष्मान् आनन्द इस समय कहाँ विहार करते हैं? हम उन आयुष्मान् आनन्द के दर्शनाकांक्षी हैं।”

“गृहपति! आयुष्मान् आनन्द वैशाली के वेलुवगामक में विहार कर रहे हैं।”

तब ॰ दसम गृहपति पाटलिपुत्र में उस काम को करके, जहाँ वैशाली थी, जहाँ वेलुवगामक में आयुष्मान् आनन्द थे, वहाँ गया। जाकर आयुष्मान् आनन्द को अभिवादन कर एक ओर बैठा। एक ओर बैठे दसम गृहपति ने आयुष्मान् आनन्द से यह कहा—

“भन्ते, आनन्द! क्या उन भगवान् जाननहार, देखनहार अर्हत् सम्यक्-संभुद्ध ने ऐसा एक धर्म उपदेश किया है, जिसने प्रमादरहित, एकाग्रतायुक्त तत्पर हो विहरते, भिक्षु का अ-मुक्त चित्त विमुक्त (= मुक्त) हो जाये, अक्षीण आस्रव क्षीण हो जाये, अ-प्राप्त अनुपम योग-क्षेम (= निर्वाण) प्राप्त हो जाये?”

“किया है गृहपति! उन भगवान् ॰ ने ऐसे एक धर्म का उपदेश ॰ अनुपम योगक्षेम प्राप्त हो जाये।”

“भन्ते आनन्द! उन भगवान् ॰ ने ऐसा कौनसा एक धर्म का उपदेश किया है ॰?”

“यहाँ गृहपति! भिक्षु कामों से विरहित ॰ प्रथम-ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। वह ऐसा सोचता है—‘अरे! यह प्रथम-ध्यान भी संस्कृत (= कृत)=अभि-संस्कृत=अभिसंचेतयित है। जो कुछ भी संस्कृत ॰ है, वह अनित्तव=निरोध-धर्मा है’—यह समझता है। उस (ध्यान) में अवस्थित हो आस्रवों (= चित्त-मलों) के क्षय को प्राप्त होता है। यदि आस्रवों के क्षय को प्राप्त नहीं होता, तो उसी धर्म-अनुराग से =उसी धर्म-नन्दी से पाँचों अवर-भागीय (= ओरंभगिय) संयोजनों के क्षय से उस लोक से फिर न लौटकर वहीं निर्वाण को प्राप्त होने वाला औपपातिक (= अयोनिज देव) होता है। गृहपति! यह भी उन भगवान् ॰ ने ऐसे एक धर्म को उपदेश किया है ॰।

“और फिर गृहपति! ॰ द्वितीय-ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। वह ऐसा सोचता है॰। यह भी उन भगवान् ॰ ने ऐसे एक धर्म का उपदेश किया है ॰।

“और फिर गृहपति! ॰ तृतीय-ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। वह ऐसा सोचता है ॰।

“और फिर गृहपति! ॰ चतुर्थ-ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। वह ऐसा सोचता है ॰।

“और फिर गृहपति! भिक्षु मैत्री-युक्त चित्त से एक दिशा को परिपूर्ण कर विहरता है। वैसे ही दूसरी ॰। मैत्री-युक्त चित्त से सारे लोक को परिपूर्ण कर विहरता है। वह करूणा-युक्त चित्त से ॰। मुदिता-युक्त चित्त से ॰। उपेक्षा-युक्त चित्त से ॰। वह यह सोचता है—॰।

“और फिर गृहपति! भिक्षु रूप-संज्ञा को सर्वथा छोडने से, प्रतिहिंसा की संज्ञाओं (= ख्याल) के सर्वथा अस्त हो जाने से, नानापन की संज्ञाओं के न करने से, ‘आकाश अनन्त’ है, इस आकाश’—आनन्त्य-आयतन को प्राप्त हो विहरता है। वह यह सोचता है—॰।

“और फिर गृहपति! भिक्षु आकाशनन्त्यायतन को सर्वथा अतिक्रमणकर ॰ विज्ञान-आनन्त्य-आयतन को प्राप्त हो विहरता है। वह यह सोचता है—॰।

“॰ आकिंचन्य-आयतन को प्राप्त हो विहरता है। वह यह सोचता है—॰।

“॰ नैव-संज्ञा-न-असंज्ञा-आयतन ॰। वह यह सोचता है—॰।”

ऐसा कहने पर अट्ठकनागर दसम गृहपति ने आयुष्मान् आनंद से यह कहा—“भन्ते आनन्द! जैसे पुरूष एक निधि-सुख (= खजाने के मुँह) को खोजता एक ही बार ग्यारह निधि-मुखों को पा जाये ऐसे ही भन्ते आनन्द! मैंने एक अमृत-द्वार को खोजते, एक ही बार ग्यारह अमृतद्वार सुनने को पाये। भन्ते आनन्द! जैसे (किसी) पुरूष के पास ग्यारह द्वारों वाला आगार हो; वह उस घर में आग लग जाने पर किसी एक द्वार से अपनी रक्षा कर सकता है; ऐसे ही भन्ते आनन्द! मैं इन ग्यारह अमृतद्वारों में से किसी एक अमृत-द्वार से अपनी स्वस्ति (= मंगल) कर सकता हूँ। यह, भन्ते। दूसरे तीर्थ (= मत) वाले भी आचार्य की (पूजा के) लिये आचार्य-धन (= आचार्य को देने लायक पूजा द्रव्य) की खोज करते हैं; फिर मै क्यों न आयुष्मान् आनन्द की पूजा करूँ?”

तब दसम गृहपति ने पाटलिपुत्र के तथा वैशाली के भिक्षु-संघ को एकत्रित कर, अपने हाथ से उत्तम खाद्य-भोज्यद्वारा सन्तर्पित=सम्प्रवारित किया; एक एक भिक्षु को एक एक दुस्स-युग (= धुसे का जोडा, थानजोडा) ओढ़ाया, और आयुष्मान् आनन्द को तीनों चीवरों (= भिक्षु के तीन वस्त्र—संघाटी, उत्तरासंग, अन्तर्वासक) से आच्छादित किया; तथा आयुष्मान् आनन्द के लिये पाँच सौ विहार (= रहने की कोठरियाँ) बनवाये।