मज्झिम निकाय

55. जीवक-सुत्तन्त

ऐसा मैंने सुना—

एक समय भगवान् राजगृह में जीवक कौमारभृत्य के आम्रवन में विहार करते थे।

तब जीवन कौमारभृत्य जहाँ भगवान् थे, वहाँ गया; जाकर भगवान् को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे जीवक ने भगवान् से यह कहा—

“भन्ते! मैने सुना है—‘श्रमण गौतम के उद्देश्य से बनाये (अपने) उद्देश्य किये कर्मवाले मांस को खाता है’। भन्ते! जो यह कहते है—‘श्रमण गौतम ॰ खाता है’ क्या भन्ते! वह भगवान् के विषय में यथार्थवादी है? वह भगवान् पर झूठा इलज़ात तो नहीं लगाते? सत्य के अनुसार कहते है? (उनके इस कथन से) किसी धर्मानुसार वचन-अनुवचन की निन्दा तो नहीं हो जाती?”

“जीवक! जो यह कहते हैं—‘श्रमण गौतम ॰ खाता है’; वह मेरे विषय में यथार्थवादी नहीं हैं; वह मुझ पर झूठा इलज़ाम (= अभ्याख्यान) लगाते हैं।…जीवक! मैं तीन प्रकार के मांस को अ-भोज्य कहता हूँ—दृष्ट, श्रुत और परिशंकित।…जीवक! तीन प्रकार के मांस को मैं भोज्य कहता हूँ—अ-दृष्ट, अ-श्रुत, अ-परिशंकित।…

“जीवक! कोई भिक्षु किसी गाँव, या निगम (= कस्बे) के पास विहार करता है। वह मैत्री-पूर्ण चित्त से ॰ सारे लोक को पूर्णकर विहरता है। उसके पास आकर कोई गृहपति या गृहपति-पुत्र दूसरे दिन के भोजन के लिये निमंत्रण देता है। इच्छा होने पर जीवक! भिक्षु (उस निमंत्रण) को स्वीकार करता है। वह उस रात के बीतने पर पूर्वाह्न समय पहिन कर पात्र-चीवर ले, जहाँ उस गृहपति या गृहपति-पुत्र का घर होता है, वहाँ जाता है। जाकर बिछे आसन पर बैठता है। उसे वह गृहपति या गृहपति-पुत्र उत्तम पिंडपात (= भिक्षान्न) परोसता है। उस (भिक्षु) को यह नहीं होता—‘अहो! यह गृहपति या गृहपति-पुत्र मुझे उत्तम पिंडपात परोसे। अहो! यह ॰ आगे भी इसी प्रकार का पिंडपात परोसे।…वह उस पिंडपात को अ-लोलुप=अ-मूर्छित हो, अनासक्त हो अवगुण का ख्याल रखते, निस्तार की बुद्धि से खाता है। तो क्या मानते हो, जीवक! क्या वह भिक्षु उस समय आत्म-पीडा (की बात) को सोचता है, पर-पीडा को सोचता है, (= आत्म-पर-) उभय-पीडा को सोचता है?”

“नही, भन्ते!”

“क्यों जीवक! उस समय वह निर्दोष (= अनवद्य) आहारहीका ग्रहण कर रहा है न?”

“हाँ, भन्ते! मैने सुना है भन्ते! कि ब्रह्मा मैत्री-विहारी (= सदा सबकों मित्र भाव से देखने वाला) है; सो मैने भन्ते! भगवान् को साक्षात् देख लिया। भन्ते! भगवान् मैत्री विहारी है।”

जीवक! जिस राग से, जिस द्वेष से, जिस मोह से (आदमी) व्यापादवान् (= द्वेषी, उत्पीडक) होता है, वह राग-द्वेष-मोह तथागत का नष्ट हो गया, उच्छिन्न-मूल, कटे सिरवाले-ताड-जैसा, अ-भाव-प्राप्त, भविष्य में उत्पन्न-होने के-अयोग्य हो गया। यदि जीवक! तूने यह ख्याल करके कहा, तो मैं सहमत हूँ।”

“यही ख्याल कर भन्ते! मैंने कहा।”

“यहाँ जीवक! कोई भिक्षु किसी गाँव या निगम के पास विहार करता है। वह करूणापूर्ण चित्त से ॰ मुदिता-पूर्ण चित्त से ॰। उपेक्षा-पूर्ण चित्त से ॰ सारे लोक को पूर्ण कर विहरता है। उसके पास आकर कोई गृहपति या गृहपति-पुत्र दूसरे दिन के लिये भोजन का निमंत्रण देता है।॰”

“यही ख्याल कर भन्ते! मैंने कहा।”

“जो कोई जीवक! तथागत या तथागत के श्रावक के उद्देश्य से जीव मारता है, वह पाँच स्थानों से अ-पुण्य (= पाप) कमाता है (1) जो वह यह कहता है—‘जाओ, अमुक जीव को लाओ’; इस पहिले स्थान (बात से) वह बहुत अ-पुण्य कमाता है। (2) जो वह गले में (रस्सी) बाँधकर खींच कर लाते (पशु) को (देख) दुःख=दौर्मनस्य अनुभव करता है, यह दूसरे स्थान ॰। (3) जो वह यह कहता है—‘जाओ; इस जीव को मारों’ इस तीसरे स्थान ॰। (4) जो वह जीवों को मारते समय दुःख=दौर्मनस्य (= संताप) अनुभव करता है; इस चैथे स्थान ॰। जो वह तथागत या तथागत के श्रावक को अ-कल्प्य (= अनुचित, अ-विहित) को खिलाता है, इस पाँचवें स्थान ॰। जो कोई जीवक! तथागत या तथागत के श्रावक के उद्देश्य से जीव मारता है, वह इन पाँच स्थानों से अ-पुण्य कमाता है।”

यह कहने पर जीवक कौमारभृत्य ने भगवान् से यह कहा—“आश्चर्य! भन्ते! अद्भूत!! भन्ते! कल्प्य (= उचित, विहित) आहार को भन्ते! भिक्षु ग्रहण करते हैं। अहो! निर्दोष आहार को भन्ते! भिक्षु ग्रहण करते हैं। आश्चर्य! भन्ते! अद्भूत!! भन्ते! जैसे औंधे को सीधा कर दे ॰। यह मैं भन्ते! भगवान् की शरण जाता हूँ, धर्म और भिक्षु-संघ की भी! भगवान् आज से मुझे अंजलिबद्ध शरणागत उपासक स्वीकार करें।”