मज्झिम निकाय

57. कुक्कुर-वतिक-सुत्तन्त

ऐसा मैंने सुना—

एक समय भगवान् कोलि (देश) में कोलियों के हलिद्दवसन (= हरिद्रवसन) नामक निगम में विहार (= निवास) करते थे।

तब गोव्रतिक (= गाय की भाँति खाने पिने का व्रत रखने वाला) कोलिय-पुत्त पूर्ण और कुक्कुर-व्रतिक अचेल (= नंगा) सेनिय (= श्रेणिक) जहाँ भगवान् थे, वहाँ गये; जाकर गोव्रतिक कोलियपुत्त पूर्ण, भगवान् को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। कुक्कुर-व्रतिक अचेल सेनिय भगवान् के साथ…सम्मोदन (= कुशल-मंगल पूछ) कर कुक्कुर की भाँति गेंडुरी मार, एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे ॰ पूर्ण ने भगवान् से यह कहा—

“भन्ते! यह कुक्कुर-व्रतिक अचेल सेनिय बडा मुश्किल करने वाला (= दुष्कर-कारक) है, भूमि में रक्खे (भोजन) को खाता है। इसने इस कुक्कुर-व्रत को दीर्घकाल से निरन्तर ले रक्खा है। उसकी क्या गति=क्या अभिसम्पराय (= जन्मांतर फल) (होगा)?”

“बस, रहने दे, पूर्ण! मत मुझसे यह पूछ।”

दूसरी वार भी ॰ पूर्ण भगवान् से यह कहा—“भन्ते! ॰”।

तीसरी वार भी ॰ पूर्ण ने भगवान् से यह कहा—“भन्ते! ॰”।

“पूर्ण! मैं तुझे नहीं (स्वीकार करा) पाता—‘बस, रहने दे, पूर्ण! मत मुझसे यह पूछ’। अच्छा, तो मैं तुझसे कहता हूँ। (जब) कोई पूर्ण! परिपूर्ण अ-खंड कुक्कुर-व्रत की भावना (= अभ्यास) करता है, परिपुर्ण अ-खंड कुक्कुर-शील की भावना करता है, ॰ कुक्कुर-चित्त की भावना करता है, ॰ कुक्कुर-आकल्प (= ॰ तौर-तरीका) की भावना करता है; वह परिपूर्ण अखंड कुक्कुर-व्रत की भावना करके, ॰ कुक्कुर-शील ॰, ॰ कुक्कुर-चित्त ॰, ॰ कुक्कुर-आकल्प की भावना करके काया छोड मरने के बाद कुक्कुरों की योनि में उत्पन्न होता है। यदि पूर्ण! उसकी ऐसी दृष्टि हो—‘मैं इस (कुक्कुर के) शील, व्रत, तप, ब्रह्मचर्य से देवों में से कोई देवता होऊँगा; तो यह उसकी मिथ्या-दृष्टि (= झुठी धारणा) है। पूर्ण! मिथ्या-दृष्टि (पुरूष) की मैं दो गतियों में से एक ही गति कहता हूँ—नरक या तिर्यक् (= पशु)-योनि। इस प्रकार पूर्ण! कुक्कुर-व्रत का करना कुक्कुर की योनि में ले जाता है, (या) विद्यमान नरक को।”

ऐसा कहने पर कुक्कुरव्रतिक अचेल सेनिय रो पडा, आँसू बहाने लगा।

तब भगवान् ने ॰ पूर्ण से यह कहा—“पूर्ण! मैं तुझसे नहीं (स्वीकार) करा पाया—‘बस, रहने दे ॰’।”

(सेनिय बोला—) “भन्ते! भगवान् के मुझे ऐसा कहने के ख्याल से मैं नही रो रहा हूँ। लेकिन भन्ते! मैंने इस कुक्कुरव्रत को दीर्घकाल से…ले रक्खा है। यह भन्ते! ॰ पूर्ण ने भी गोव्रत दीर्घकाल से…ले रक्खा है। उसकी क्या गति है=क्या अभिसम्पराय है?”

“बस, रहने दे सेनिय! मत मुझसे यह पूछ।”

दूसरी बार भी ॰। तीसरी बार भी ॰।

“सेनिय! मैं तुझसे नहीं (स्वीकार) करा पाया—‘बस ॰’। अच्छा तो मैं तुझसे कहता हूँ। (जो) कोई सेनिय! परिपूर्ण अ-खंड गोव्रत की भावना करता है, ॰ गो-शील ॰, ॰ गो-चित्त ॰, ॰ गो-आकल्प ॰; ॰, (वह) काया छोड मरने के बाद गौ की योनि में उत्पन्न होता है। यदि सेनिय! उसकी ऐसी दृष्टि हो—॰ विद्यमान नरक को।”

ऐसा कहने पर गोव्रतिक कोलियपुत्त पूर्ण रो पडा, आँसू बहाने लगा।

तब भगवान् ने ॰ सेनिय से यह कहा—“सेनिय! मैं तुझसे नहीं (स्वीकार) करा पाया—‘बस रहने दे ॰’।”

(पूर्ण बोला—) “भन्ते! भगवान् के मुझे ऐसा कहने के ख्याल से मैं नही रो रहा हूँ। लेकिन भन्ते! मैंने इस व्रत को दीघकाल से…ले रक्खा है। भन्ते! भगवान् पर मैं इतना श्रद्धावान् (= प्रसन्न) हूँ; भगवान् ऐसा धर्म-उपदेश करें, जिसमें मैं इस गोव्रत को छोड दूँ, और यह सेनिय कुक्कुर-व्रत को छोड़ दे।”

“तो पूर्ण! सुनो! अच्छी तरह मन में करो, कहता हूँ।”

“अच्छा, भन्ते!”—(कह) ॰ पूर्ण ने भगवान् को उत्तर दिया।

भगवान् ने यह कहा—“पूर्ण! मैंने इन चार कर्मो को स्वयं जानकर, साक्षात्कार कर अनुभव किया है। कौन से चार?—(1) पूर्ण! कोई कर्म होता है कृष्ण (= बुरा) और कृष्ण-विपाक (= बुरे परिणाम वाला); (2) पूर्ण! कोई कर्म होता है, शुक्ल (= अच्छा), और शुक्ल-विपाक; (3) ॰ कृष्ण-शुक्ल ॰; (4) ॰ अकृष्ण-अशुक्ल, अकृष्ण-अशुक्ल-विपाक (जो कि) कर्म के क्षय के लिये (उपयोगी) होता है।

“क्या है। पूर्ण! कृष्ण, कृष्ण-विपाक कर्म?—यहाँ, पूर्ण! कोई (पुरूष) व्यापाद (= पीडा)-युक्त काय-संस्कार (= कायिक क्रिया) करता, व्यापाद-युक्त वचन-संस्कार ॰, व्यापाद-युक्त मनः-संस्कार करता है; वह व्यापाद-युक्त काय-संस्कार को करके, ॰ वचन-संस्कार ॰, ॰ मनः-संस्कार को करके, व्यापाद-युक्त लोक में उत्पन्न होता है। व्यापाद-युक्त लोक में उत्पन्न हुये उसे व्यापाद-युक्त स्पर्श (= कर्म-विपाक) आ लगते है। वह व्यापाद-युक्त स्पर्शो के लगने से व्यापाद (= पीडा)-युक्त केवल दुःखमय वेदना को अनुभव करता है, जैसे कि नरक के प्राणी। इस प्रकार पूर्ण! भूत (= यथाभूत=जैसे) से भूत (= तथाभूत=जैसे) की उत्पत्ति होती है; जैसा करता है, उसके साथ उत्पन्न होता है। उत्पन्न हुये को स्पर्श आ लगते है। इसलियें भी पूर्ण मैं कहता हूँ—‘प्राणी (अपने) कर्मो के दायाद (= वारिस) हैं।’ पूर्ण! यह कृष्ण कृष्ण-विपाक कर्म कहा जाता है।

“क्या है पूर्ण! शुक्ल, शुक्ल-विपाक कर्म?—यहाँ, पूर्ण! कोई (पुरूष) व्यापाद-रहित काय-संस्कार ॰ व्यापाद-रहित लोक में उत्पन्न हुये उसे व्यापाद-रहित स्पर्श छूते हैं। वह व्यापाद-रहित स्पर्शो के लगने से व्यापाद-रहित केवल सुखमय वेदना को अनुभव करता है, जैसे कि शुभकृत्स्न देवता। इस प्रकार पूर्ण! भूत से भूत की उत्पत्ति होती है। (प्राणी) जैसा करता है, उसके साथ उत्पन्न होता है। उत्पन्न हुये को स्पर्श (= भोग) आ लगते है। इसीलिये पूर्ण! मैं कहता हूँ—‘प्राणी के कर्मो के दायाद है’। पूर्ण! यह शुक्ल, शुक्ल-विपाक कर्म कहा जाता है।

“क्या है पूर्ण, कृष्ण-शुक्ल कृष्ण-शुक्ल-विपाक कर्म?—यहाँ पूर्ण! कोई (पुरूष) व्यापाद-युक्त भी, अव्यापाद-युक्त भी काय-संस्कार ॰ वह व्यापाद-सहित से और व्यापाद-रहित स्पर्शो के लगने से व्यापाद-सहित, व्यापाद-रहित सुख-दुःख-मिश्रित वेदना को अनुभव करता है; जैसे कि मनुष्य, कोई कोई देवता, और कोई कोई विनिपातिक (= नीच योनि के प्राणी)। इस प्रकार पूर्ण! भूत से भूत ॰। पूर्ण! यह कृष्ण शुक्ल ॰।

“क्या है, पूर्ण! अकृष्ण-अशुक्ल अकृष्ण-अशुक्ल-विपाक कर्म (जो कि) कर्म-क्षय के लिये उपयेागी होता है?—वहाँ पूर्ण! कृष्ण-विपाक कृष्ण कर्म के क्षय के लिये (उपयोगी) जो चेतना (= मानस कर्म) है, ॰ शुक्ल कर्म ॰ के क्षय के लिये जो चेतना है, ॰ कृष्ण-शुक्ल कर्म ॰ के क्षय के लिये जो चतना है। पूर्ण यह ॰ अकृष्ण-अशुक्ल कर्म कहा जाता है। पूर्ण! मैंने इन चार कर्मो को स्वयं जानकर, साक्षात्कार कर अनुभव किया है।”

ऐसा कहने पर ॰ पूर्ण ने भगवान् से यह कहा—“आश्चर्य! भन्ते! अद्भूत!! भन्ते! जैसे औंधे को सीधा कर दे। ॰ यह मैं भगवान् की शरण जाता हूँ, धर्म और भिक्षु-संघ की भी। आज से भगवान् मुझे अंजलिबद्ध शरणागत उपासक स्वीकार करें।”

और कुक्कुर-व्रतिक अचेल सेनिय ने भगवान् से यह कहा—“आश्चर्य! भन्ते! अद्भूत!! भन्ते! जैसे औंधे को सीधा कर दे ॰ यह मैं भगवान् को शरण जाता हूँ, धर्म और भिक्षु-संघ की भी। भन्ते मैं भगवान् के पास प्रब्रज्या (= संन्यास) पाऊँ, उपसंपदा (= भिक्षु दीक्षा) पाऊँ।”

“सेनिय! जो कोई भूत-पूर्व अन्यतीर्थिक (= दूसरे पंथ का व्यक्ति) इस (= बुद्ध के) धर्म-विनय (= धर्म) में प्रब्रज्या उपसंपदा चाहता है; वह चार मास तक परिवास (= परीक्षार्थ वास) करता है; फिर पसन्द होने पर उसे भिक्षु, प्रब्रजित करते हैं, भिक्षु-भाव के लिये उपसम्पादित करते हैं; किन्तु यहाँ मुझे व्यक्ति व्यक्ति में भिन्न मत भी विदित है।”

“यदि, भन्ते! भूतपूर्व अन्य-तीर्थिक, इस धर्म-विनय में प्रब्रज्या उपसंपदा की इच्छा करने पर चार मास परिवास करते हैं, फिर पसंद होने पर ॰, तो मैं चार वर्ष परिवास करूँगां चार वर्षो के बाद पसन्द होने पर भक्षु मुझे प्रब्रजित करे ॰ख् उपसम्पादित करें।”

‘॰ सेनिय ने भगवान् के पास प्रब्रज्या पाई, उपसम्पदा पाई। आयुष्मान् सेनिय उपसम्पदा पाने के थोडे ही समय बाद; एकाकी, एकान्तवासी, प्रमाद-रहित, उद्योगी (और) आत्म-संयमी हो, विहरते; जल्दी ही, जिसके लिये कुल-पुत्र अच्छी तरह घर से बेघर हो प्रब्रजित होते हैं, उस अनुपम ब्रह्मचय्र-फल को इसी जन्म में जान कर=साक्षात्कार कर, प्राप्त कर विहरने लगे—‘जन्म क्षीण हो गया, ब्रह्मचर्य-वास (पूरा) हो गया, करना था सो कर लिया, और कुछ यहाँ करने को नहीं रहा—यह जान गये। आयुष्मान् सेनिय अर्हतों में से एक हुये।