मज्झिम निकाय

59. बहु-वेदनीय-सुत्तन्त

ऐसा मैंने सुना—

एक समय भगवान् श्रावस्ती के अनाथ-पिंडिक के आराम जेतवन में विहार करते थे।

तब पंचकंग (= पचकांग) स्थपति (= थपति=थवई) जहाँ आयुष्मान् उदायी थे, वहाँ गया, जाकर आयुष्मान् उदायी को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया! एक ओर बैठै पंचकांग स्थपति ने आयुष्मान् उदायी से यह कहा—

“भन्ते उदायी! भगवान् ने कितनी वेदनायें (= अनुभव), कही हैं?”

“स्थपति! भगवान् ने तीन वेदनायें की है—(1) सुखा वेदना (2) दुःखा वेदना, (3) अदुःख-असुखा वेदना।…”

“भन्ते उदायी! भगवान् ने तीन वेदनायें नहीं कहीं, दो वेदनायें भगवान् ने कही हैं—सुखा वेदना और दुःखा वेदना। भन्ते! जो यह अदुःख्ज्ञ-असुखा वेदना है उसे भगवान् ने शान्त उत्तम सुख के विषय में कहा है।”

दूसरी बार भी आयुष्मान् उदायी ने पंचकांग स्थपति से यह कहा—“स्थपति! भगवान् ने दो वेदनायें नहीं कही हैं। भगवान् ने तीन वेदनायें कही हैं—॰।”

दूसरी बार भी पंचकांग स्थपति ने आयुष्मान् उदायी से यह कहा—“नहीं’ भन्ते उदायी! ॰ शान्त उत्तम सुख के विषय में कहा है।”

तीसरी बार भी आयुष्मान् उदायी ने ॰।

तीसरी बार भी पंचकांग स्थपति ने ॰।

न आयुष्मान् उदायी पंचकांग स्थपति को समझा सके, न पंचकांग स्थपति आयुष्मान् उदायी को समझा सका।

आयुष्मान् आनंद ने आयुष्मान् उदायी के पंचकांग स्थपति के साथ (होते) इस कथा संलाप को सुन लिया। तब आयुष्मान् आनन्द जहाँ भगवान् थे, वहाँ गये; जाकर भगवान् को अभिवादन कर एक ओर बैठ गये। एक ओर बैठे आयुष्मान् आनन्द ने जो कुछ आयुष्मान् उदायी का पंचकांग स्थपति के साथ कथा-संलाप हुआ था, सब भगवान् से कह दिया। ऐसा कहने पर भगवान् ने आयुष्मान् आनंद से यह कहा—

“आनन्द! पंचकांग स्थपति ने उदायी का कथन (= पर्याय) ठीक होते (उसे) अनुमोदित नहीं कियां आनन्द! उदायी ने पंचकांग स्थपति का कथन ठीक होते (उसे) अनुमोदित नहीं किया। आनन्द! पर्याय (= मतलब) से मैंने दो वेदनायें भी कहीं हैं, पर्याय से मैंने तीन वेदनायें भी कही है, ॰ पाँच वेदनायें ॰, ॰ अठारह वेदनायें ॰, ॰ एक सौ, आठ वेदनायें भी ॰। इस प्रकार आनन्द! पर्याय से मैंने धर्म को उपदेशा है। इस प्रकार पर्याय से उपदेशे धर्म में जो एक दूसरे के सुभाषित=सु-लपित को नहीं स्वीकार करते, नहीं मानते, नहीं अनुमोदन करते, उनके लिये यही आशा करनी होगी, कि वह भंडन=कलह, विवाद करने वाले हो एक दूसरे को मुख (रूपी) शक्ति (= हथियार) से बेधते फिरेंगे। आनन्द! इस प्रकार पर्याय से उपदेशे धर्म में जो एक दूसरे के सुभाषित=सु-लपित को स्वीकारते, मानते, अनुमोदन करते हैं, उनके लिये यही आशा करनी होगी, कि वह एक हो सम्मोदन (= खुशी) करते, विवाद-रहित हो, दूध-जल हो, एक दूसरे को प्रिय नेत्रो से देखते विहरेगे।

“आनन्द! यह पाँच काम-गुण (= भोग) हैं। कौन से पाँच?—इष्ट=कांत मनाप=प्रिय स्वरूप भोग-युक्त रंजनीय चक्षु से विज्ञेय (= ज्ञेय) रूप; ॰ श्रोत्र से विज्ञेय शब्द; ॰ घ्राण-विज्ञेय गंध; ॰ जिह्वा-विज्ञेय रस; ॰ काय-विज्ञेय स्प्रष्टव्य। आनन्द! यह पाँच काम-गुण हैं। आनन्द! इन पाँच कामगुणों के आश्रय से जो सुख=सोमनस्य उत्पन्न होना है, उसे काम-सुख कहा जाता है।

“आनन्द! यदि कोई यह कहे—प्राणी इतना तक ही सुख=सौमनस्य का अनुभव करते हैं; तो उसके इस कथन को मैं अनुमोदित नहीं करता। सो किस हेतु?—आनन्द! इस सुख से अधिक अच्छा=प्रणीततर दूसरा सुख है। आनन्द! कौन सुख इस सुख से अधिक अच्छा=प्रणीततर है?—यहाँ आनन्द! भिक्षु ॰ प्रथम-ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। यह आनन्द! उस सुख से ॰ प्रणीततर दूसरा सुख है।

“आनन्द! यदि कोई यह कहे ॰ मैं अनुमोदित नहीं करता। ॰। ॰ द्वितीय-ध्यान को प्राप्त हो विहरता है।॰

“आनन्द! यदि कोई यह कहे ॰ मैं अनुमोदित नहीं करता। ॰। ॰ तृतीय-ध्यान को प्राप्त हो विहरता है।॰

“आनन्द! यदि कोई यह कहे ॰ मैं अनुमोदित नहीं करता। ॰। ॰ चतुर्थ-ध्यान को प्राप्त हो विहरता है।॰

“॰। ॰। ॰ आकाशानन्त्यायतन को प्राप्त हो विहरता है। ॰

“॰। ॰। ॰ विज्ञानानन्त्यायतन को प्राप्त हो विहरता है। ॰

“॰। ॰। ॰ आकिंचन्यायतन को प्राप्त हो विहरता है। ॰

“॰। ॰। ॰ नैव-संज्ञा-नासंज्ञायतन को प्राप्त हो विहरता है। ॰

“॰। ॰। यहाँ आनन्द! भिक्षु नैव-संज्ञा-नासंज्ञायतन को सर्वथा अतिक्रमण कर संज्ञा-वेदित-निरोध को प्राप्त हो विहरता है। यह आनन्द! उस सुख से ॰ प्रणीततर दूसरा सुख है।

“हो सकता है आनन्द! अन्य-तीर्थिक (= पंथाई) परिब्राजक यह कहें—श्रमण गौतम संज्ञा-वेदिन-निरोध को कहता, और उसे सुखमय बतलाता है। सो वह क्या है, सो वह कैसा है?” ऐसा कहने वाले अन्य-तीर्थिक परिब्राजको से ऐसा कहना चाहिये—‘आवुसो! भगवान् सुखा वेदना ही का ख्याल करके (उसे) सुख में नहीं बतलाते; बल्कि जहाँ जहाँ सुख उपलब्ध होता है, उस उसको ही तथागत सुख में बतलाते है।”

भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो आयुष्मान् आनन्द ने भगवान् के भाषण को अभिनंदित किया।