मज्झिम निकाय

6. आकङ्खेय्य-सुत्तन्त

ऐसा मैने सुना—

एक समय भगवान् श्रावस्ती में अनाथपिंडिक के आराम जेतवन में विहार करते थे। वहाँ भगवान् ने भिक्षुओं को संबोधित किया—“भिक्षुओ!”

“भदन्त!” (कह) उन भिक्षुओं ने भगवान् को उत्तर दिया।

भगवान् ने यह कहा—“भिक्षुओ! शील सम्पन्न होकर विहरो; प्रतिमोक्ष-संवर (= सदाचार-नियम रूपी संरक्षण) से संरक्षित हो विहरो; आचार-गोचर (= धर्माचरण) से संयुक्त हो, छोटी सी भी बुराई से भय खाते शिक्षापदों (= आचार-नियमो) को ग्रहणकर, उनका अभ्यास करो। भिक्षुओ! यदि भिक्षु चाहता है कि वह सब्रह्मचारी (= गुरूभाई) भिक्षुओं का प्रिय=मनाप और सम्मान-भाजन होवे; तो वह शीलों का पूरा करने वाला बने, भीतर से चित्त को शमन करने मे तत्पर, अखंडित ध्यान (तथा) विपश्यना (= प्रज्ञा) से युक्त हो, सूने घरो की शरण ले।

“भिक्षुओ! यदि भिक्षु चाहता है, कि चीवर (= वस्त्र), पिडपात (= भिक्षान्न), शयनासन (= वासस्थान) (और) ग्लान-प्रत्यय-भैषज्य-परिष्कार (रोगी पथ्य और औषध की चीज़ें) का पाने वाला हो, तो वह शीलों का ही पूरा करने वाला बने ॰।

“भिक्षुओं! यदि भिक्षु चाहता है, कि जिनके चीवर, पिंडपात, शयनासन, ग्लान-प्रत्यय-भैपज्य-परिष्कार का मै उपयोग करता हूँ, उनके वह (दान-) कार्य महाफल वाले=महानृशंस वाले हों, तो वह शीलों का ही पूरा करने वाला बने ॰।

“॰ जो मेरे जाति वाले रक्त-संबंधी मृत-प्रेत (लोकान्तर-प्राप्त) हैं। (और जो कि) प्रसन्न-चित्त से मेरी याद करते हैं, उनका वह कर्म महाफल=महानृशंस होवे, तो वह ॰।

“॰ मै अ-रति (= उचाट) को हराने वाला होऊँ, अ-रति मुझे न हरा सके, उत्पन्न अ-रति को मै पराजित करके विहरूँ; तो वह ॰।

“॰ मै भय-भैरव को हराने वाला होऊँ ॰; तो वह ॰।

“॰ इसी जन्म में सुख-पूर्वक विहार करने वाला, चित्त-सम्बन्धी चारों ध्यानों का पूर्णतया बिना दिक्कत और कठिनाई के लाभी (= पाने वाला) होऊँ; तो वह ॰।

“॰ जो वह रूप् (-लोक)1 से परे आरूप्य (= लोक-संबंधी) शान्त विमोक्ष (= मुक्ति) हैं, उन्हें मैं काया से प्राप्त कर विहरूँ; तो वह ॰।

“॰ तीनों संयोजनों1 के क्षय से स्रोत-आपन्न बन पतन-रहित, नियत, संबोधि (= परमज्ञान)-परायण होऊँ, तो वह ॰।

“॰ तीनों संयोजनों के क्षय से, राग-द्वेष-मोह के क्षीण होने से सकृदागामी होऊँ, इस लोक में एक ही बार और आकर दुःख का अन्त करूँ; तो वह ॰।

“॰ पाँच अवरभागीय संयोजनों के क्षय से औपपातिक (= दिव्ययोनि-उत्पन्न) उस (अगले जन्म लेने वाले) लोक में निर्वाण प्राप्त करने वाला होऊँ, उस लोक से फिर लौटकर (यहाँ) आने वाला न होऊँ, तो वह ॰।

“॰ मै अनेक प्रकार की ऋद्धियों का अनुभव करूँ—एक होकर अनेक हो जाऊँ, आविर्भाव, तिरोभाव, दीवार-प्राकार-पर्वत में निर्लिप्त हो वैसे ही चलूँ, जैसे आकाश में पक्षी उडते हैं; पृथिवी में वैसे ही डूबूँ उतराऊँ, जैसे पानी में; पानी पर (भी) वैसे ही बिना भीगे चलूँ, जैसे पृथिवी पर; आकाश में आसान मारकर वैसे ही चलूँ, जैसे पक्षी=शकुन; ऐसे महाऋद्धिवाले=महानुभाव इन चाँद और सूर्य को भी हाथ से छूऊँ, परिमार्जन करूँ; (इसी) काया से ब्रह्मलोकपर्यन्त (सब) को अपने वश मे कर लूँ; तो वह ॰।

“॰ मैं अ-मानुष विशुद्ध दिव्य श्रोत्र-इन्द्रिय से उभय प्रकार के शब्दो को सुनूँ—दिव्य (शब्दों) को भी, और मानुष (शब्दों) को भी, दूरवाले को भी और समीप वाले (शब्द) को भी; तो वह ॰।

“॰ मैं दूसरे सत्वों दूसरी व्यक्तियो के चित्तों को (अपने) चित्त से देखकर जान लूँ—सराग चित्त होने पर ‘सराग चित्त है’—जान जाऊँ, वीतराग चित्त॰, स-द्वेषचित्त॰, वीतद्वेष चित्त॰, स-मोह चित्त॰, वीत-मोह चित्त॰, संक्षिप्त (= एकाग्र)-चित्त॰, विक्षिप्त चित्त॰, महद् गत (= विशाल) चित्त॰, अ-महद्गत चित्त॰, स-उत्तर (= जिससे बढकर भी कोई हो) चित्त॰, अनुत्तर (= अनुपम) चित्त॰, समाहित चित्त॰, अ-समाहित चित्त॰, चित्त॰, विमुक्त चित्त॰, अ-विमुक्त चित्त॰; तो वह ॰।

“॰ अनेक प्रकार के पूर्व-निवासों (= पूर्वजन्मों) को जानूँ, जैसे कि—एक जन्म को भी ॰ 2; तो वह ॰।

“॰ मैं अ-मानुष विशुद्ध दिव्य चक्षु से अच्छे-बुरे, सुवर्ण-दुर्वर्ण॰2 प्राणियों को ॰ 3 देखूँ—यह आप प्राणी ॰ ; तो वह ॰।

“॰ मैं आस्रवों के क्षय से जो आस्रव-रहित चित्त की विमुक्ति है, प्रज्ञाद्वारा विसुक्ति (= मुक्ति) है, उसे इसी जन्म में स्वयं जान कर, साक्षात्कार कर, प्राप्त कर, विहार करूँ; तो वह ॰।

“भिक्षुओ! शील4—सम्पन्न हो विहरो ॰3।

भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो उन भिक्षुओं ने भगवान् के भाषण का अनुमोदन किया।