मज्झिम निकाय

68. नलकपान-सुत्तन्त

ऐसा मैने सुना

एक समय भगवान् कोसल (देश) में नलकपानके पलास-बन में विहार करते थे। उस समय बहुतसे कुलीन कुलीन कुल-पुत्र भगवान्के पास घरसे बे-घरहो प्रब्रजित हुये थे, (जैसे)—आयुष्मान् अनुरूद्ध, आयुष्मान् नन्दिय, आ‐ किम्बिल, आ‐ भृगु, आ‐ कुण्डधान, आ‐ रेवत, आ‐ आनन्द, तथा दूसरे भी कुलीन कुलीन कुल-पुत्र। उस समय भिक्षु-संघके सहित भगवान् खुले आंगनमें बैठे थे। तब भगवान्ने उन कुलपुत्रोंके संबंधमें भिक्षुओंको संबोधित किया—

“भिक्षुओ! जो वह कुल-पुत्र मेरे पास श्रद्धा-पूर्वक ० प्रब्रजित हुये हैः वह मनसे ब्रह्मचर्यमें प्रसन्न तो हैं?”

ऐसा कहनेपर भिक्षु चुप हो गये। दूसरी बार भी भगवान्ने उन कुलपुत्रोके संबंधसे भिक्षुओको संबोधित किया—“भिक्षुओ! ०?

दूसरी बार भी वह भिक्षु चुप हो गये।

तीसरी बार भी ० “भिक्षुओ! ० “तीसरी बार भी वह भिक्षु चुप हो गये।

तब भगवान्के (मन में) हुआ, “क्यो न मै उन्हीं कुलपुत्रोंसे पूंछूं ?” तब भगवान्ने आयुष्मान् अनुरूद्धकेा संबोधित किया —

“अनुरूद्धो! तुम (लोग) ब्रह्मचर्यमें प्रसन्न तो हो न ?”

“हाँ भन्ते! हम (लोग) ब्रह्मचर्यमें बहुत प्रसन्न है।”

“साधु, साधु, अनुरूद्धो! तुम जैसे’ श्रद्धा से ० प्रब्रजित कुल-पुत्रोके यह योग्य ही है, कि तुम ब्रह्मचर्यमें प्रसन्न हो। जो तुम अनुरूद्धो! उत्तम यौवन-सहित प्रथम वयस, बहुत ही काले केश वाले, कामोपभोग कर रहे थेः सो तुम अनुरूद्धो! उत्तम यौवन ० वाले, घरसे बे-घर हो प्रब्रजित हुये। सो तुम अनुरूद्धो! राजाकी जबर्दस्तीसे नही ० प्रब्रजित हुये। चोरके डरसे नही ०। ऋणसे पीडित होकर नही ०। भयसे पीडित होकर नही ०। ब-राजीके होने से नही ०। बल्कि, (यही सोच-) “जन्म, जरा, मरण, शोक, रोना-पीटना, दुःख, दुर्मनता, हैरानीमें फंसा हूं, दुःखमें गिरा दुःखमें लिपटा (हूंॅ), जो कहीं इस केवल दुःख-स्कंध (दुःखकी ढेरी) का विनाश मालूम होता )’। अनुरूद्धो!तुम तो इस प्रकार श्रद्धायुक्त ० प्रब्रजित हुये हो न ?”

“हाँ, भन्ते!”

“ऐसे प्रब्रजित हुये कुल-पुत्रको क्या करना चाहिये?—अनुरूद्धो! कामभोगो से, बुरे (= अकुशल) धर्मोसे, अलग होना चाहिये। (मनुष्य तब तक) विवेक=प्रीतिसुख या उससे भी अधिक शान्त (= सुख) को नही पाता, (जब तक कि) अभिष्या (= लोभ) उसके चित्तको पकडे रहती है। व्यापाद (= द्वेष) उसके चित्तको पकडे रहता है। औद्धत्य-कौकृत्य (= उच्छृ-खलता) ०। विचिकित्सा (= संदेह) ०। अरति (असंतोष) ०। तन्दी (= आलस्य) उसके चित्तको पकडे रहती हेै।…अनुरूद्धो! कामनाओसे, बुरे धर्मोसे विवेक प्रीति-सुख या उससे भी अधिक शान्त (= सुख) को पाता हैः (यदि) अभिध्या उसके चित्तको न पकडे रहे। व्यापाद ०, औद्धत्य-कौकृत्य ०, विचिकित्सा ०, अरति ०, तन्दी उसके उसके चित्तको न पकडे रहे।…

“क्यो अनुरूद्धो! मेरे विषयमें तुम्हारा क्या (विचार) होता है, कि जो आस्त्रव (= चित्त-मल) क्लेश (= मल)-देनेवाले, आवागमन-देनेवाले, समय (= सदर), भविष्यमें दुःख फलोत्पादक, जन्म-जरा-मरण-देनेवाले है: वह तथागतके नही छूटे, इसीलिये तथागत जान कर एकका सेवन करते है, ० एकको स्वीकार करते है, जान कर एकका त्याग करते है, जान कर एकको हटाते हैं?”

“नही भन्ते! हमको ऐसा नही होता कि, जो वास्त्रव ० क्लेश देनेवाले आवागमन देने वाले ० है, वह तथागतके नही छूटे ०। भन्ते! भगवान्के विषयमें हम (लोगा ) को ऐसा होता है, कि जो आस्त्रव जन्म-जरा-मरण देनेवाले है, वह तथगतके छूट गये हैं। इसलिये तथागत जान कर एकको सेवन करते हैं, जान कर एकको करते हैं, जान कर एकका त्याग करते है, जान कर एकको हटाते हैं।”

“साधु, साध, अनुरूद्धो! जो आस्त्रव ० क्लेश देनेवाले हैं, वह तथागतके छूट गये है, नष्ट मूल हो गये, डूंडे-ताडसे हो गये हैं, भविष्यमें न उत्पन्न वाले हो गये हैं। जैसे अनुरूद्धो! शिरमें कटे ताड (का वृक्ष) फिर नहीं पनप सकता, ऐसेही अनुरूद्धो! जो आस्त्रव ० क्लेश देनेवाले है, वह तथागतके छूट गये ०। इसलिये तथागत जान कर एकको सेवन करते है ०।”