मज्झिम निकाय

69. गुलिस्सानि-सुत्तन्त

ऐसा मैने सुना —

एक समय भगवान् राजगृहमें वेणुधन कलन्दक-निवापमें विहार करते थे।

उस समय दुर्बल-आचारवान् गुलिस्सानि नामक आरण्यक भिक्षु किसी कार्यसे संघके मध्यमें उपस्थित था। तब आयुष्मान् सारिपुत्रने गुलिस्सानि भिक्षुको लेकर भिक्षुओंको सम्बो-धित किया—

“आवुसो!संघमें आये, संघमें रहते आरण्यक (= जंगलमें रहनेवाले) भिक्षुको सब्रह्म-चारियों (= गुरू भाइयों) में गौरव युक्त रहना चाहियेः सम्मान-भाव-युक्त होना चाहिये। यदि आवुसो। सघमें आया, संघमें रहता आरण्यक भिक्षु सब्रह्मचारियोमें गौरवयुक्त=सन्मान-भावयुक्त नही होताः तो उसके लिये बात मारनेवाले होते हैं—“इन आरण्यक आयुष्मान् के अकेले अरण्यमें स्वैरी (= स्वेच्छाचारी)-विहारका क्या (फल)ः जब यह आयुष्मान् सब्रह्मचारियोमें गौरवयुक्त=सन्मान-भावयुक्त नही हैं। “इसलिेय संघमें ० सन्मान-भाव-युक्त होना चाहिये।

“आवुसो! संघमें ० आरण्यक भिक्षुको बैठनेमें चतुर (= आसन-कुशल) होना चाहिये—स्थविर (= वृद्ध) भिक्षुओंके बिना बैठे (या उन्हे रगडते) न बैठना चाहिये, नये भिक्षुओंको आसनसे हटाना न चाहिये। यहि आवुसो! सघमें आरण्यक भिक्षु आसन-कुशल नही होता, तो उसके लिये बात मानेवाले होते हैं—‘इन आरण्यक आयुष्मान्के अकेले स्वैरी-विहारका क्या (फल): जब कि यह आयुष्मान् स्थविर भिक्षुओंके बिना बैठे बैठते हैं, नये भिक्षुओंको आसनसे हटातें हैं।… इसलिये संघमें ०।

“आवुसो! ० आरण्यक भिक्षुको अतिकाल (= अतिप्रातः) को ग्राममें प्रविष्ट नही होना चाहिये, न अति दिवा (= बहुत पहिले ही) निकलना चाहिये। यदि आवुसो!०।

“० ० आरण्यक भिक्षुको अन्-उद्धत =अ-चपल होना चाहिये। यदि आवुसो! ०।

“० ० अ-मुखर = अ-बकवादी होना चाहिये। यदि आवुसो! ०।

“० ० सु-वचनी, कल्याण-मित्र होना चाहिये। यदि आवुसो! ०।

“० ० इन्द्रियोंमे गुप्त-द्वार (= संयमी) ०। ०।

“० ० भोजन में मात्रा (= परिमाण)-ज्ञ ०। ०।

“० ० जागरणमें तत्पर ०। ०।

“० ० आरब्ध-वीर्य (= उद्योगी) ०। ०।

“० ० उपस्थित-स्मृति (= होश रखनेवाला) ०। ०।

“० ० समाहित (= एकाग्र-चित्त) ०। ०।

“० ० प्रज्ञावान् ०। ०।

“० ० अभिधर्म (= धर्ममें, बुद्धोपदेशमें ), अभि-विनय (= विनयमें, भिक्षु-नियमों) में (मनो-) योग देना चाहिये। आवुसो! धर्म और विनयके विषयमें आरण्यक भिक्षुसे प्रश्न पूछनेवाले (लोग) भी है। यदि आवुसो ०।

“० ० रूपोंको अतिक्रमण कर जो आरूप्य (= रूप-रहित-लोक-सम्बन्धी) शान्त-विमोक्ष (= ध्यान) हैं, उनमें (मनो-) योग देना चाहिये। आवुसो! ० शान्त विमोक्षांेके विषयमें आरण्यक भिक्षुसे प्रश्न पूछनेवाले भी हैं। यदि आवुसो! ०।

“० ० उत्तर-मनुष्य-धर्म (= लोकोत्तर शक्ति) में (मनो-) योग देना चाहिये। आवुसो! उत्तर-मनुष्य-धर्मे के विषयमें आरण्यक भिक्षुसे प्रश्न करनेवाले भी है। यदि आवुसो! आरण्यक भिक्षु उत्तर-मनुष्य-धर्म के विषयमें प्रश्न पूछने पर (प्रश्न-कर्ता को) सन्तुष्ट नही कर सकताः तो उसको बात मारनेवाले होते हैं—“इन आरण्यक आयुष्मान्के जंगलमें अकेले स्वैरी विहारसे क्या (फल)ः जब कि यह आयुष्मान्, जिसके अर्थ प्रब्रजित हुये, उसी अर्थ (= वस्तु) को नही जानते। “इस-लिये, आरण्यक भिक्षुको उत्तर-मनुष्य-धर्ममें (मनो-) योग देना चाहिये।”

ऐसा कहने पर आयुष्मान् महामौद्गल्यायनने आयुष्मान् सारिपुत्रसे यह कहा—

“आवुस सारिपुत्र! आरण्यक भिक्षुको ही इन धर्मोको ग्रहण कर वर्तना चाहिये, या ग्राम समीप-वासी (भिक्षु) को भी ?”

“आवुस मौद्गल्यायन! आरण्यक भिक्षुको भी इन धर्मोको ग्रहण कर वर्तना चाहिये, ग्राम-समीप-वासी (भिक्षुओं ) के लिये तो कहना ही क्या ?”