मज्झिम निकाय

70. किटागिरी-सुतन्त

ऐसा मैने सुना —

एक समय बडे़ भारी भिक्षु-संघके साथ भ्ज्ञगवान् काशी-देश में चारिका करते थे। वहाँ भगवान्ने भिक्षुओंको आमंत्रित किया—

“भिक्षुओ! मैं रात्रि-भोजनसे विरत हो भोजन करता हूँ।…रात्रि-भोजन छोडकर भोजन करनेसे “आरोग्य, उत्साह, बल, सुख-पूर्वक विहार अनुभव करता हूँ। आओ, भिक्षुओ! तुम भ्ज्ञी रात्रि-भोजन-विरत हो भोजन करो, …रात्रि भोजन छोडकर भोजन करनेसे तुम भी…अनुभव करोगे।

“अच्छा भन्ते!” उन भिक्षुओंने भगवान् से कहा।

तब भगवान् काशी (देश) में क्रमशः चारिका करते, जहाँ काशियोंका निगम (= कस्बा) किटागिरि था, वहाँ पहूँचे। वहाँ काशियोंके निगम कीटागिरिमें भगवान् विहार करते थे।

उस समय अश्वजित्, और पुनर्वसु नामक (दो) आवासिक भिक्षु कीटज्ञगिरिमे रहते थे। तब बहुतसे भिक्षु जहाँ अश्वजित् पुनर्वसु थे, वहाँ गये। जाकर बोले—

“आवुसो! भगवान् रात्रि-भोजन-विरत हो भोजन करते है, और भिक्षु-संघ भी। रात्रि भोजन-विरत हो भोजन करनेसे आरोग्य ०। आओ, तुमभी आवुसो! रात्रि-भोजन-विरत हो भोजन करो…।”

ऐसा कहनेपर अश्वजित्-पुनर्वसुओंने उन भिक्षुओं से कहा—

“हम आवुसो! शामको भी खाते है, प्रातः, दिन (= मध्याहृ) और विकालको (= दोपहर बाद) भी। सो हम सायं, प्रातः, मध्याहृ विकालको भोजन करते भी आरोग्य ० हो विहरते हैं। सो हम क्यों प्रत्यक्ष (= सांदृष्टिक) को छोडकर, कालान्तर के (= कालिक) लिये दौडे़ं। हम सायं भी खायेंगे, प्रातः भी, दिनमेंभी, विकालमें भी।”

जब वह भिक्षु अश्वजित्-पुनर्वसु “को न समझा सके, तो जहाँ भगवान् थंे, वहाँ गये। जाकर भगवान्को अभिवादन कर एक ओर बैठ गये। एक ओर बैठ कर उन भ्ज्ञिक्षुओंने भगवान् से कहा —

“भन्ते! हमने''’ अश्वजित्-पुनर्वसु'''के पास'''जा'''यह कहा—“भगवान् रात्रि-भोजन-विरत ०”। एकसा कहने पर, भन्ते! अश्वजित्-पुनर्वंसु भिक्षुओंने कहा—“हम आवुसो! शामको भी खाते है०।“जब हम भन्ते! अश्वजित्-पुनर्वसु भिक्षुओको न समझा सके, तब हम यह बात भगवान्से कह रहे है।”

जब वह भिक्षु अश्वजित्-पुनर्वसु…को न समझा सके, तो जहाँ भगवान् थंे, वहाँ गये। जाकर भगवान्को अभिवादन कर एक ओर बैठ गये। एक ओर बैठ कर उन भिक्षुओंने भगवान् से कहा —

“भन्ते! हमने''' अश्वजित्-पुनर्वसु'''के पास'''जा'''यह कहा—“भगवान् रात्रि-भोजन-विरत०”। एकसा कहने पर, भन्ते! अश्वजित्-पुनर्वंसु भिक्षुओंने कहा—“हम आवुसो! शामको भी खाते है०।“जब हम भन्ते! अश्वजित्-पुनर्वसु भिक्षुओको न समझा सके, तब हम यह बात भगवान्से कह रहे है।”

तब भगवान्ने एक भिक्षुको आमंत्रित किया —

“आ भिक्षु! तू मेरी बातसे अश्वजित् पुनर्वसु भिक्षुओको कह—“शास्ता आयुष्मानोंको बुलाते है।”

“अच्छा आवुस!”—कह…अश्वजित् पुनर्वसु भिक्षु…जहा भगवान् थे, वहा गये। जाकर भगवान्को अभिवादन कर एक ओर बैठ गये। एक ओर बैठे अश्वजित्, पुनर्वसु भिक्षुओसे भगवान्ने कहा—

“सचमुच भिक्षुओ! बहुतसे भिक्षु तुम्हारे पास जाकर बोले (थे)—आवुसो! भगवान् रात्रि-भोजन-विरत हो ०। ऐसा कहने पर भिक्षुओ! तुमने….कहा ०?”

“हाँ भन्ते!”

“क्या भिक्षुओ! तुम मुझे ऐसा धर्म उपदेश करते जानते हो—जो कुछ यह पुरूष=पुद्गल सुख, दुःख, या असुख-अदुःख अनुभव करता है, (उससे) उसके अकुशल (= बुरे) धर्म नष्ट हो जाते हैं, और कुशल धर्म बढते हैं ?”

“नही भन्ते!”

“क्या भिक्षुओ! तुम मुझे ऐसा धर्म उपदेश करते जानते हो—एक के इस प्रकारकी सुख वेदना (= अनुभव) अनुभव करते अकुशल-धर्म बढते हैं, कुशल-धर्म नष्ट होते हैं। किन्तु एक के इस प्रकारकी सुख-वेदनाको अनुभव करते अ-कुशल-धर्म नष्ट होते हैं, कुशल-धर्म बढते हैं। ० दुःख वेदनाको अनुभव करते अ-कुशल धर्म बढते हैं, कुशल-धर्म नष्ट होते हैं। अकुशल-धर्म नष्ट होते हैं ०। एकको इस प्रकारकी असुख-अदुःख वेदनाको अनुभव करते ०? ०?

“हाँ, भन्ते!”

“साधु, भिक्षुओ! यदि मै अ-ज्ञात, अ-दृष्ट, अ-विदित=अ-साक्षात्कृत=अ-स्पर्शितको ( कहता )— यहाँ किसीको इस प्राकरकी सुख-वेदानाको अनुभव करते अकुशल धर्म बढते हैं, और कुशल-धर्म नष्ट होते हैं ०।

ऐसा न जानते, यदि मैं “इस प्रकारकी सुख-वेदनाको छोडो “बोलता। तो क्या भिक्षुओ! यह मेरे लिये उचित होता ?”

“नही, भन्ते!”

“चूंकि भिक्षुओ! मैने इसको देखा, जाना, साक्षात् किया, स्पर्श किया, ० जानकर इसलिये मै कहता हूँ—“इस प्रकारकी सुख-वेदनाको छोडो”। और यदि-मुझे यह अज्ञात, अदृष्ट० होता, ऐसा न जाने यदि मैं कहता—“इस प्रकारकी सुख-वेदनाको प्राप्तकर विहार करो, तो क्या भिक्षुओ! यह मेरे लिये उचित होता ?”

“नही, भन्ते!”

“चूंकि भिक्षुओ! यह मुझे ज्ञात, दृष्ट, विदित, साक्षात्कृत, प्रज्ञासे स्पर्शित (है)—“यहाँ एकके० अकुशल-धर्म नष्ट होते हैं, कुशल-धर्म बढ़ते हैं। इसलिये मै कहता हूँ—“इस प्रकारकी सुख-वेदनाको प्राप्त कर विहार करो”।'''

“भिक्षुओ! मै सभी भिक्षुओंको नही कहता कि—“प्रमादरहित हो करो”। और न मैं सभी भिक्षुओको—“अप्रमाद रहित हो न करो, कहता हूँ। भिक्षुओ! जो भिक्षु अर्हत्=क्षीण-आस्त्रव (ब्रह्मचर्य-) पूरा-कर-चुके, कृत-कृत्य, भार-मुक्त, सच्चे-अर्थको-प्राप्त, भव-संयोजन (= बंधन)- रहित, अच्छी तरह जान कर मुक्त (= सम्यक्-आज्ञा-विमुुक्त) है। भिक्षुओ! वैसोको मैं “प्रमाद रहितहो करो, नहीं कहता। सो किस हेतु?—उन्होने प्रमाद-रहित हो (करणीय) कर लिया, वह प्रमाद (= आलस्य, भूल) कर नहीं सकते। भिक्षुओ! जो शैक्ष्य=न-प्राप्त-चित्त है, अनुपम योग-क्षेम (= निर्वाण) के इच्छुक हो विहरते हैं। भिक्ष्ुाओ! वैसेही भिक्षुओंको मैं “प्रमाद रहितहो करो” कहता हूँ। सो किस हेतु?—शायद वह आयुष्मान् अनुकूल शयन-आसनको सेवन करते, क्ल्याण-मित्रो (= सुमित्रों) को सेवन करते, इन्द्रियोंका संयम करतेः जिसके लिये कुल-पुत्र अच्छी तरह घरसे बेघर हो प्रब्रजित होते हैं, उस अनुत्तर (= सर्वाेत्तम) ब्रह्मचर्य-फलको इसी जन्ममें स्वयं जान कर, साक्षात् कर, प्राप्त कर विहरें। भिक्षुओ! उन भिक्षुओंको अप्रमादका यह फल देखते हुये मैं “प्रमाद-रहित हो करो” कहता हूँ।

“भिक्षुओ! सात पुद्गल (= पुरूष) लोकमें विद्यमान हैं। कौनसे सात? (1) अभय-तो-भाग-विमुक्त (2) प्रज्ञाविमुक्त, (3) काया-साक्षी, (4) दृष्टि-प्राप्त, (5) श्रद्धा-विमुक्त, (6) धर्म-अनूसारी, (7) श्रद्धा-अनुसारी।

“भिक्षुओ! कौन पुद्गल (= पुरूष) उभयतो-भाग-विमुक्त है?—भिक्षुओ! जो प्राणी कि विमोक्षको अतिक्रमण कर रूप (-धातु) में आरूप्य (धातु) को प्राप्त हैं, उन्हे कोई पुद्गल कायासे स्पर्श कर विहार करता है। (उन्हे) प्रज्ञासे देख कर उसके आस्त्रव (= चित्तमल) नष्ट होजाते हैं। भिक्षुओ! यह पुद्गल उपयतो-भाग-विमुक्त कहा जाता है। भिक्षुओ! इस भिक्षुको उप्रमादसे करो, मैं नही कहता। किस हेतु?— क्योकि वह प्रमाद-रहितहो (करणीय ) कर चुका। वह प्रमाद नहीं कर सकता।

“भिक्षुओ! कौन पुद्गल प्रज्ञा-विमुक्त हैं?—भिक्षुओ! जो प्राणी कि विमोक्षको पार कर, रूप (-धातु) में आरूप्यको प्राप्त हैं, उन्हें कोई पुद्गल कायासे छूकर नहीं विहरते, (किंतु) प्रज्ञासे देख कर उनके आस्त्रव नाश होजाते है। ० यह पुद्गल प्रज्ञा-विमुक्त कहे जाते हे। ० ऐसे भिक्षुको भी “अप्रमादसे करो” मैं नही कहता। ०।

“भिक्षुओ! कौन पुद्गल काय-साक्षी है?—भिक्षुओ! जो एक पुद्गल उन्हे कायासे छूकर नहीं विहरता, प्रज्ञासे देख कर उसके कोई कोई आस्त्रव नष्ट होजाते है। ० यह ० काय-साक्षी है। इस भिक्षुको भिक्षुओ! “अप्रमादसे करो”, मै कहता हूँ। सो किस हेतु?—शायद यह आयुष्मान् ० प्राप्त कर विहार करे ०।

“भिक्षुओ! कौन पुद्गल दृष्टि-प्राप्त है?—भिक्षुओ! ० कायासे छूकर नहीं विहरता, ० कोई कोई आस्त्रव नष्ट होगये है। प्रज्ञा द्वारा तथागतके बतलाये धर्म उसके जाने “होते है। ० यह दृष्टि-प्राप्त ० है। ० । ०।

“भिक्षुओ! कौन पुद्गल श्रद्धाविमुक्त है?—०, ० प्रज्ञासे कोई कोई आस्त्रव उसके नष्ट होगये है, तथागतमे उसकी श्रद्धा प्रतिष्ठित=जड-पकडी=निविष्ट होती है। ० यह श्रद्धा- विमुक्त ०। ०। ०।

“भिक्षुओ! कौन पुद्गल धर्मानुसारी है?—०, ०, प्रज्ञाद्वारा तथागतके बतलाये धर्म उसके लिये मात्रशः (= कुछ मात्रा में) निध्यायन (= निदिध्यासन के योग्य होगये हैं। ओर उसको यह धर्म (= बातें) प्राप्त हैं, जैसे कि—श्रद्धा-इन्द्रिय, वीर्य-इन्द्रिय, स्मृति-इन्द्रिय, समाधि, इन्द्रिय प्रज्ञा-इन्द्रिय। ० यह धर्मानुसारी ० है। ०। ०।

“भिक्षुओ! मैं आदिसे ही “आज्ञा” (= आ) की आराधना नहीं कहता, बल्कि भिक्षुओ! क्रमशः शिक्षासे, क्रमशः क्रियासे, क्रमशः प्रतिपद्से आज्ञाकी आराधना होती है। भिक्षुओ! क्रमशः प्रतिपद्से कैसे आज्ञाकी आराधना होती है?— भिक्षुओ! श्रद्धावान् हो (ऐसे ज्ञानी के) समीप जाता है, समीप जानेसे, परि-उपासना करता है। परि-उपासना करनेसे कान लगाता है। कान लगानेसे धर्म सुनता है। धर्म सुनकर धारण करता है। धारण किये धर्मा की परीक्षा करता है। अर्थकी उप-परीक्षा करनेपर धर्म निध्यायन (= निदिध्यासन के योग्य होते हैं। धर्मके निध्यायन के योग्य होनेपर, छन्द (= रूचि) उत्पन्न होता है। छंद होनेपर उत्साह करता है। उत्साह करनेपर उत्थान करता है (= तुलेति)। उत्थान कर प्रधान (= समाधि) करता है। प्रधानात्म (= समाहित-चित्त) हो, (इस) कायासेही परम-सत्यका, साक्षात्कार करता है। प्रज्ञासे उसे बेधता है। भिक्षुओ! वह श्रद्धा भी यदि न हुई। ० वह पास जानाभी (= उप-संक्रमण) न हुआ ०। ०। ० वह प्रधानभी न हुआ। (तो) विप्रतिपन्न (= अमार्गा-रूढ) हो भिक्षुओ! मिथ्या-प्रतिपन्न ०, भिक्षुओ! यह मोघपुरूष (= नालायक) इस धर्म-विनयसे बहुत दूर चले गये है।

“भक्षुओ! चतुष्पद व्याकरण होता है, जिसके अर्थको करने पर विज्ञपुरूष जल्द ही (उसे) प्रज्ञासे जानता है। “भिक्षुओ! तुम इसे समझते हो?”

“भन्ते! कहाँ हम और कहाँ धर्माका जानना?”

“भिक्षुओ! जो वह शास्ता (= गुरू) आमिष-गुरू (= धन, भेगमें बडा़), आमिष-दायाद (= भोगोंका लेनेवाला), आमिषों से लिप्त हो विहरता हैः वह भी इस प्रकारकी वाजी (= पण) नहीं लगाता—“यदि हमें ऐसा हो, तो इसे करेंगे, यदि हमें ऐसा न हो, तो नहीं करेंगे। फिर भिक्षुओ! तथागतका तो क्या (कहना है), (जो कि) सर्वथा आमिष (= धन, भोग) से अ-लिप्तहो विहार करते हैं। भिक्षुओ! श्रद्धालु श्रावकको शास्ताके शासन (= धर्म) में परियोग (= योग) के लिये वर्ताव करते हुये यह अनु-धर्म होता है—“भगवान् शास्ता (= गुरू) है, मैं श्रावक ( =शिष्य) हूँ”, “भगवान् जानते हैं, मैं नहीं जानता, । भिक्षुओ! श्रद्धालु श्रावक के लिये शास्ताके शासनमें परियोगके लिये वर्तते समय, शास्ताका शासन'''ओज-वान् होता है।, श्रद्धालु श्रावको ० यह दृढता होती है—“चाहे चमडा, नस, और हड्डी ही यच रहे, शरीरका रक्त-मांस सूख (क्यो न) जाये, (किंतु), पुरूषके स्थाम=पुरूष-वीर्य=पुरूष-पराक्रम से जो (कुछ) प्राप्य है, उसे बिना पाये (मेरा) उद्योग न रूकेगा।“भिक्षुओ! श्रद्धालु श्रावक को शास्ताके शासनमें परियोगके लिये वर्तते समय, दो फलोंमेंसे एक फलकी उमेद (अवश्य) रखनी चाहिये—इसी जन्ममें (परम-ज्ञान) जानूॅंगा, या उपाधि (= मल) रखनेपर अनागामि-पन (पाऊॅंगा)।”

भगवान् ने यह कहा। संतुष्ट हो, उन भिक्षुओने भगवान् के भाषणका अनुमोदन किया।