मज्झिम निकाय

72. अग्गि-वच्छगोत्त-सुत्तन्त

ऐसा मैनें सुना—

एक समय भगवान् श्रावस्तीमें अनाथपिंडिकके आराम जेतवन में विहार करते थे—

तब वच्छ-गोत्त (= वत्सगोत्र) परिब्राजक जहाँ भगवान् थे, वहाँ गया। जाकर भगवान् के साथ…सम्मोदन (= कुशल प्रश्न पूछ) कर एक और बैठ गया। एक ओर बैठे वत्सगोत्र परिव्राजकने भगवान्से यह कहा—

(1) “भो गौतम। लोक शाश्वत ( =नित्य) है”—यही सत्य है, और (सब वाद) झूठ (= मोघ) हैः क्या आप गौतम इस दृष्टि (= मत ) वाले है?”

“वत्स! मैं इस दृष्टिवाला नहीं हूँ— लोक शाश्वत है, —यही सत्य है, और सब झूठ।”

(2) “भो गौतम! “लोक अशाश्वत (= अनित्य) है, — यही सत्य है, और झूठः क्या आप गौतम इसी दृष्टिवाले है?”

“वत्स! मै इस दृष्टिवाला नही हूँ— लोक अशाश्वत है, यही सत्य है, और झूठ।”

(3) “० अन्तवान् लोक है” ०?”—“० नही ०।”

(4) “० अन-अन्तवान् लोक है” ०?”—“० नही ०।”

(5) “० जीव शरीर एक है, ०?”—“० नही ०।”

(6) “० जीव दुसरा शरीर दुसरा है, ०?”—“० नही ०।”

(7) “० तथागत मरनेके बाद होते हैं ०?”—“० नही ०।”

(8) “० तथागत मरनेके बाद नही होते, ०?”—“० नही ०।”

(9) “० तथागत मरनेके बाद होते भी है, नही भी होते, ०?”—“० नही ०।”

(1०) “० तथागत मरनेेके बाद न-होते है, न-नही होते है,०?”—“० नही ०।”

“क्या है, भो गौतम! जो—लोक शाश्वत है” यही सत्य है, और सब झूठ, क्या आप गौतम इस दृष्टिवाले हैं?—पूछने परः “वत्स!मैं इस दृष्टिवाला नहीं हूँ — लोक शाश्वत है, यही सत्य है और झूठ—कहते है? ०। तथागत मरनेके बाद न-हाते है, न-नही-होते, यही सत्य है, और झूठ—क्या आप गौतम इस दृष्टिवाले हैं?—पूछने पर भी, —वत्स! मैं इस दृष्टि-वाला नहीं हूँ —०— कहते हैं? क्या बुराई देखकर आप गौतम! इस प्रकार इन सभी दृष्टियोको नहीं ग्रहण करते ?”

“वत्स! लोक शाश्वत है”—यह दृष्टि-गत (= दृष्टि) दृष्टि-गहन, दृष्टि-कान्तार (= मत का रेगिस्तान), दृष्टि-विशूक (= ० काँटा), दृष्टि-विस्पन्दित (= ० की चंचलता), दृष्टि-संयोजन (= ० बंधन) है, (यह) दुःखमय, विद्यात (= पीडा) भय, उपायास (= परेशानी) भय, परिदाह (= जलन) भय हैः (यह) न निर्वेदके लिये =न वैराग्यके लिये, न निरोधके लिये, न उपशम (= शांति) के लिये, न अभिज्ञाके लिये न संबोध (= परमज्ञान) के लिये न निर्वाण के लिये है। ०। “तथागत मरनेके बाद न-होते हैं, न-नहीं-होते”—दृष्टि-गत (= दृष्टि) दृष्टि गहन ० न निर्वाणके लिये है। वत्स! इस बराई (= आदिनव) को देख कर मैं इन सभी दृष्टियों को नही ग्रहण करता।

“भो गौतम! आप गौतमका कोई दृष्टि-गत (= दृष्टि) है ?”

“वत्स! तथागतका दृष्टि-गत दूर हो गया है। वत्स! तथागतका यह दृष्ट (= साक्षात्कृत) है—ऐसा रूप है, एकसा रूपका समुदय (= उत्पत्ति) है, ऐसा रूपका निरोध (= नाश) है। ऐसी वेदना है ०। ऐसी संज्ञा है ०। ऐसा संस्कार है ०। ऐसा विज्ञान है ०। सारी मान्यताओं = सारे मथितों = सारे अहंकार-ममंकार-मान (रूपी) अनुशयों (= चित्त दोषों) के क्षय, विराग, निरोध, त्याग और अनुत्पत्तिसे (भिक्षु) विमुक्त होता है— यह कहता हूँ।”

“भो गौतम! ऐसा विमुक्त-चित्त भिक्षु कहाँ उत्पन्न होता है ?”

“वत्स! उत्पन्न होता है, —यह नहीं (संभव ) पाता।”

“तो फिर मो गौतम! नही उत्पन्न होता, ?”

“वत्स! नहीं उत्पन्न होता”—यह नहीं पाता।”

“तो भो गौतम! उत्पन्न होता है, नही भी उत्पन्न होता है?”

“वत्स! उत्पन्न होता है, नहीं भी उत्पन्न होता है”—यह नही पाता।”

“तो भो गौतम! “न- उत्पन्न होता है, न-नही- उत्पन्न होता है, ।

“वत्स! न- उत्पन्न होता है, न-नही—उत्पन्न होता है—यह नही पाता।

“भो गौतम! ऐसा विमुक्त-चित्त भिक्षु कहाँ उत्पन्न होता हैं?—पूछने पर, आप “वत्स! उत्पन्न होता है”—यह नहीं पाता—कहते हैं। ०। भो गौतम! न-उत्पन्न होता है “न-नही उत्पन्न होता है, ?—पूछने पर, “वत्स! न उत्पन्न होता है, न-नही-उत्पन्न होता है, —यह नहीं पाता—कहते हैं। भो गौतम! यहाँ मुझे अज्ञान हो गया, मुझे संमोह (= भ्रम) हो गया। पिछले वार्तालापसे जो कुछ प्रसाद (= श्रद्धा) आपके संबंधमें मुझे था, वह भी अन्तर्धान (= लुप्त) हो गया।”

“वत्स! तुझे अज्ञानकी ज़रूरत नहीं, सम्मोहकी ज़रूरत नहीं। वत्स! यह धर्म गंभीर, दुदृश्य, दुर्-अनु-बोध (= दुज्र्ञेय), शांत, प्रणीत (= उत्तम), तर्कका-अविषय, निपुण (= सूक्ष्म) पंडित-वेदनीय (= पंडितों द्वारा जानने लायक) है। वत्स! यह (धर्म)अन्य-दृष्टिक (= दूसरे मतका आग्रह रखने वाले), =अन्य-रूचिक, अन्यत्र-योग(= संबंध ) वाले अन्यत्र-आचार्यक (= दूसरी जगहके ज्ञानवाले) तेरे लिये दुज्र्ञेय है। तो वत्स! तुझे ही पूछता हूंॅ, जैसा तुझे जॅंचे, वैसा उत्तर देना। यदि वत्स! तेरे सम्मुख आग जले, तो तू जानेगा—यह मेरे सन्मुख आग जल रही है?”

“भो गौतम! यदि मेरे सन्मुख आग जले, तो मैं जानूंगा, यह मेरे सन्मुख आग जल रही है।”

“यदि वत्स! तुझसे यह पूछें— यह जो तेरे सन्मुख आग जल रही है, वह किसको लेकर जल रही है ?”

“ऐसा पूछने पर भो गौतम! मैं कहूँगा—यह जो मेरे सन्मुख आग जल रही है, यह तृण-काष्ठ (रूपी) उपादानको लेकर जल रही है।”

“यदि वत्स! वह आग तेरे सन्मुख बुझ जाये, तो जानेगा तू—यह आग मेरे सन्मुख बुझ गई ?”

“भो गौतम! यदि मेरे सन्मुख वह आग बुझ जाये, तो मैं जानूगा—यह मेरे सन्मुख आग बुझ गई”।

“यदि वत्स! तुझसे यह पूछें—यह जो आग तेरे सन्मुख बुझ गई, वह आग किस दिशा को गई—पूर्वको, पश्चिमकेा उत्तरकेा या दक्षिणको?”—ऐसा पूछने पर वत्स!तू क्या उत्तर देगा?”

“नही (पता) मिलता, भो गौतम! जो वह आग तृण-काष्ठके उपादानको लेकर जली, उसके पर्यादान (= खतम कर लेने) से, और अन्य (तृण-काष्ठ )के अनुपहार (= न मिलने ) से, आहार विना “बुझ गई” (= निर्वृत= निर्वाण-प्राप्त) यही नाम होता है।

“ऐसे ही वत्स! तथागतको जतलाते वक्त जिस रूपसे (उन्हे) जतलाया जाता, वह रूप (ही) तथागतका प्रहीण (= नष्ट) हो गया, उच्छिन्न-मूल, शिर-कटे-ताड-जैसा, अभाव-प्राप्त, भविष्य में उत्पन्न-न-होने- लायक हो गया । वत्स! तथागत रूप-सेज्ञा (= रूपके नामसे) मुक्त, महासमुद्रकी तरह गंभीर, अ-प्रमेय, दुरवगाह्य (है)। (इसी लिये वहाँ) “उत्पन्न होता है—नहीं पाया जाता, ०: न-उत्पन्न-होता है, न-नही-उत्पन्न होता—नहीं पाया जाता। तथागतको जतलाते वक्त जिस वेदना द्वारा (उन्हे) जतलाया जाता, वह वेदना ही तथा-गतकी प्रहीण हो गई ० “न-उत्पन्न होता है, न-नही-उत्पन्न होता, —नही पाया जाता। ० संज्ञा ० ० । ० संस्कार ० ०। तथागतको जतलाते वक्त जिस विज्ञान द्वारा जतलाया जाता, वह विज्ञान ही तथागतका प्रहीण होगया, उच्छिन्नमूल, शिर-कटे-ताड-जैसा, अभाव-प्राप्त, भविष्य-में-उत्पन्न-न-होने-लायक होगया। वत्स! तथागत विज्ञान-संज्ञासे मुक्त हो, महासमुद्र की तरह गंभीर, अ-प्रमेय, दुरवगाह्य (है), (इसीलिये वहाँ) ‘उत्पन्न होता है’—नहीं पाया जाताः ० ‘न-उत्पन्न होता है, न-नहीं-उत्पन्न होता’—नहीं पाया जाता।

ऐसा कहने पर वत्स-गोत्र परिब्राजकने भगवान्से यह कहा—

“जैसे, भो गौतम! ग्राम या निगमके समीप (= अ-विदूर) महान् शाल (= साखू)-वृक्ष हो। अनित्य होनेसे उसके शाखा-पत्ते नष्ट हो जायेंः छाल-पपडी नष्ट हो जायें गुद्दा नष्ट हो जाये। बादमें वह शाखा-पत्र रहित, छाल-पपडी-रहित, गुद्दारहित, शुद्ध, सार मात्रमें अवस्थित रह जायेः ऐसे ही आप गौतमका यह प्रवचन (= उपदेश) शाखा-पत्र-रहित, छाल-पपडी-रहित, गुद्दा-रहित शुद्ध सारमात्रमें अवस्थित है। आश्चर्य! भो गौतम! आश्चर्य!! भो गौतम! जैसे औधेको सीधा कर दे ० आप गौतम आजसे मुझे अंजलिबद्ध शरणागत, उपासक स्वीकार करें।”