मज्झिम निकाय

78. समण-मंडिक-सुत्तन्त

ऐसा मैंने सुना—

एक समय भगवान् श्रावस्ती में अनाथ-पिंडिक के आराम जेतवन में विहार करते थे।

उस समय समण-मंडिका-पुत्त उग्गहमाण परिब्राजक सात सौ परिब्राजकों की बडी जमात (= परिषद्) के साथ समय-प्रवादक तिन्दुकाचीर एकसालक (नामक) मल्लिका (देवी के बनवाये) आराम में रहता था।

तब पंचकंग (= पंचकांग) स्थपति (= थवई) मध्याह्न में भगवान् के दर्शन के लिये श्रावस्ती से निकला। तब पंचकांग स्थपति को यह हुआ—‘भगवान् के दर्शन का यह समय नहीं है, भगवान् ध्यान में होंगे; मनो-भावना करने वाले भिक्षुओं के भी दर्शन का यह समय नहीं, …(वह) भी ध्यान में होंगे। क्यों न मैं जहाँ समय-प्रवादक ॰ मल्लिकाराम हैं, जहाँ ॰ उग्गहमाण परिब्राजक हैं वहाँ चलूँ।’ तब पंचकांग स्थपति जहाँ समय-प्रवादक ॰ मल्लिकाराम था, जहाँ ॰ उग्गहमाण परिब्राजक था, वहाँ गया।

उस समय उग्गहमाण परिब्राजक ॰ आदि निरर्थक कथा कहती, नाद करती, शोर मचाती, बडी भारी परिब्राजक-परिषद् के साथ बैठा था। उग्गहमाण परिब्राजक ने दूर से ही पंचकांग स्थपति को आते देखा। देखकर अपनी परिषद् से कहा—

“आप सब चुप हों, आप सब शब्द मत करें। यह श्रमण गौतम का श्रावक पंचकांग स्थपति आ रहा है। श्रमण गौतम के जितने श्वेतवस्त्रधारी गृहस्थ श्रावक श्रावस्ती में बसते हैं, यह पंचकांग स्थपति उनमें से एक है। यह आयुष्मान् लोग स्वयं अल्पशब्द (= निःशब्द रहने वाले), अल्पशब्द के अभ्यासी, अल्प-शब्द-पे्रमी निःशब्द-प्रशंसक होते है। परिषद् को निःशब्द देख संभव हैं, (इधर) भी आयें।”

तब वह परिब्राजक चुप हो गये।

तब पंचकांग स्थपति जहाँ उग्गहमाण परिब्राजक था, वहाँ गया। जाकर उग्गहमाण परिब्राजक के साथ सम्मोदन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठ पंचकांग स्थपति से ॰ उग्गहमाण परिब्राजक ने यह कहा—

“स्थपति! मैं चार अंगो (= बातों) से युक्त पुरूष=पुद्गल को सम्पन्न-कुशल (= सुकर्म-युक्त), परम-कुशल, उत्तम-गति को-प्राप्त, श्रमण, अ-योध्य (जिससे लडा नहीं जा सके) कहता हूँ। कौन से चार (अंग)?—यहाँ स्थपति! (1) (पुरूष) काया से पापकर्म नहीं करता; (2) न पाप (= बुरी)-वाणी बोलता है; (3) न पाप-संकल्प चिन्ता है; (4) न पाप-आजी— विकासे रोजी कमाता है। स्थपति! मैं इन अंगो से युक्त ॰ को ॰ अ-योध्य कहता हूँ।”

तब पंचकांग स्थपति ने उग्गहमाण परिब्राजक के भाषण को न अभिनंदित किया, न खंडित किया। बिना अभिनंदित किये, बिना खंडन किये—भगवान् के पास इस भाषण का अर्थ पूछूँगा—(यह सोच) आसन से उठकर चला गया। तब पंचकांग स्थपति जहाँ भगवान् थे, वहाँ गया; जाकर भगवन् को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठ पंचकांग स्थपति ने जो कुछ उग्गहमाण परिब्राजक के साथ कथा संलाप हुआ था यह सब भगवान् से कह सुनाया। ऐसा कहने पर भगवान् ने पंचकांग स्थपति ने यह कहा—

“स्थपति! ऐसा होने पर तो उग्गहमाण परिब्राजक के वचनानुसार उतान (ही) सो सकने वाला अबोध छोटा बच्चा सम्पन्न-कुशल परमकुशल ॰ अयोध्य होगा। स्थपति! ॰ छोटे बच्चे के अंग (= काया) (पूरी सामथ्र्य-युक्त) भी नहीं होते; (= चलना छोड) वह कैसे काया से पाप कर्म करेगा?—स्थपति! ॰ छोटे बच्चे (= दहर-कुमार) को वाणी भी नहीं होती; रोना छोउ वह कैसे वाणी से पापकर्म करेगा? स्थपति! ॰ छोटे बच्चे को संकल्प ही नहीं होता; हँसना छोड, वह क्या संकल्प करेगा! स्थपति! ॰ छोटे बच्चे को आजीव (= रोजी कमाना) ही नहीं होता; माता के दूध के अतिरिक्त वह क्या पाप-आजीव करेगा? ऐसा होने पर तो ॰ उग्गहमाण परिब्राजक के वचनानुसार ॰ छोटा बच्चा ॰ अ-योध्य होगा।

“स्थपति! मैं (इन) चार अंगो से युक्त पुरूष=पुद्गल को न सम्पन्न कुशल, परमकुशल ॰ अयोध्य कहता हूँ; बल्कि ॰ छोटे बच्चे से विशेष कहता हूँ। कौन से चार?—स्थपति! (1) जो काया से पाप कर्म नहीं करता; ॰ (4) न पाप-आजीविका से रोजी कमाता है।

“स्थपति! मैं दश अंगो से युक्त पुरूष=पुद्गल को सम्पन्न-कुशल, परम-कुशल ॰ अयोध्य कहता हूँ। स्थपति! (1) यह अकुशल-शील (-दुराचार) कहाँ वेदितव्य (= भोगने योग्य) है—यह कहता हूँ। (2) स्थपति! यहाँ से उत्पन्न अकुशल-शील कहाँ वेदितव्य हैं—॰ यह कहता हूँ। (3) स्थपति! यहाँ सारे (= अशेष) अकुशल-शील विरूद्ध (= नष्ट) होते हैं, कहाँ वेदितव्य हैं—॰। (4) स्थपति!

इस प्रकार प्रतिपन्न (= मार्गारूढ) अकुशल-शीलों (= दुराचारों) के निरोध के लिये प्रतिपन्न होता हैं, कहाँ वेदितव्य है—॰। (5) स्थपति! यह कुशल शील (= सदाचार, सुकर्म) कहाँ कहाँ वेदितव्य हैं—॰। (6) स्थपति! यहाँ से उत्पन्न कुशलशील कहाँ वेदितव्य हैं—॰। (स्थपति)! यहाँ सारे कुशलशील निरूद्ध होते हैं—॰। (8) स्थपति! इस प्रकार प्रतिपन्न कुशल-शीलों के निरोध के लिये प्रतिपन्न होता है, कहाँ वेदितव्य है—॰

“स्थपति! (1) यह अकुशल-संकल्प (= बुरे संकल्प) कहाँ वेदितव्य हैं—यह कहता हूँ। (2) ॰ यहाँ से उत्पन्न अकुशल-संकल्प कहाँ वेदितव्यहे—॰। (3) यहाँ सारे अकुशल-संकल्प निरूद्ध होते हैं—॰। (4) ॰ इस प्रकार प्रतिपन्न अकुशल-संकल्पों के निरोध के लिये प्रतिपन्न होता है—॰। (5) यह कुशल-संकल्प कहाँ वेदितव्य हैं—॰। (6) ॰ यहाँ से उत्पन्न कुशल संकल्प कहाँ वेदितव्य हैं—॰। (7) यहाँ सारे कुशल-संकल्प निरूद्ध होते हैं—॰। (8) इस प्रकार प्रतिपन्न कुशल-संकल्पों के निरोध के लिए प्रतिपन्न होता है—॰।

“(1) स्थपति! अकुशल-शील (= दुष्कर्म) क्या हैं?—अ-अकुशल (= बुरा) कायकर्म, अकुशल वचनकर्म, पाप-आजीविका (= पापी की रोजी)—स्थपति! यह अकुशल-शील कहे जाते है। स्थपति! (2) यह अकुशल-शील कहाँ से उत्पन्न होते है?…चित्त से उत्पन्न कहना चाहिये। चित्त क्या है?—चित्त भी स्थपति! बहुत अनेक प्रकार=नाना प्रकार का हैं—(1) वह चित्त स-राग, स-द्वेष, स-मोह होता हैं। इन्हीं (राग-द्वेष-मोह-युक्त चित्तों) से अकुशलशील (= दुराचार) उत्पन्न होते है। (3) स्थपति! यह सारे अकुशल-शील कहाँ निरूद्ध होते हैं?—निरोध भी इन का, स्थपति! कह चुके हैं—यहाँ स्थपति! भिक्ष्ज्ञु, काय-दुश्चरित (= शरीर से होने वाले पाप) को छोड, काय-सुचरित की भावना (= अभ्यास) करता है; वचन दुश्चरित को छोड वचन-सुचरित की भावना करता है; मनो-दुश्चरित छोड, मनःसुचरित की भावना करता है। मिथ्या-आजीव (= पाप की रोजी) को छोड, सम्यग्-आजीव (= धर्म की रोजी) से जीविका चलाता है। यहाँ (= ऐसा करने पर) सारे अकुशल-शील निरूद्ध होते हैं। (4) स्थपति! कैसे प्रतिपन्न होने पर अकुशल शीलों के निरोध के लिये प्रतिपन्न होता है—स्थपति! यहाँ भिक्षु अनुत्पन्न पापों=अकुशल धर्मो के न उत्पन्न होने के लिये छन्द (= उद्योग) करता है=व्यायाम करता है=वीर्य-आरम्भ करता हैं, चित्त का निग्रह=रोकथाम, करता है। उत्पन्न पापों ॰ के प्रहाण (= विनाश) के लिये छन्द ॰ चित्त का निग्रह ॰ करता है। अनुत्पन्न कुशल-धर्मो की उत्पत्ति के लिये छन्द ॰। उत्पन्न कुशल धर्मो की स्थिति, अलोप, वृद्धि, विपुलता के लिये, भावना के लिये, पूर्ति के लिये छन्द ॰। स्थपति! इस प्रकार प्रतिपन्न होने पर अकुशल शीलों के निरोध के लिये प्रतिपन्न होता है।

“स्थपति! (5) क्या हैं कुशल-शील?—कुशल (= नेक) कायकर्म, कुशल-वचन कर्म, कुशल मनः=कर्म; स्थपति! इन्हें मैं कुशल शील कहता हूँ।…(6) स्थपति! यह कुशल शील कहाँ से उत्पन्न होते हैं?—…चित्त से उत्पन्न कहना चाहिये। क्या है चित्त?—चित्त भी स्थपति! बहुत अनेक प्रकार=नाना प्रकार का है—वह चित्त वीत-राग, वीत-द्वेष (= द्वेष-रहित) वीत-मोह होता है। इन्हीं से कुशल-शील उत्पन्न होते है। (7) स्थपति! यह सारे कुशल शील कहाँ निरूद्ध होते हैं?—निरोध भी इनका, स्थपति! कह चुके हैं—यहाँ स्थपति! भिक्षु शीलवान् होता है, किन्तु शील-समय (= शीलाभिमानी) नहीं; और उस चेतो-विमुक्ति, प्रज्ञा-विमुक्ति को ठीक से जानता है, जहाँ इसके सारे कुशल-शील निरूद्ध होते है। (8) स्थपति! कैसे प्रतिपन्न (= मार्गारूढ) होने पर, कुशल-शीलों के निरोध के लिये प्रतिपन्न होता है?—स्थपति! यहाँ भिक्षु अनुत्पन्न पापों ॰ के न उत्पन्न होने के लिये ॰ वीर्यारम्भ (= उद्योगारम्भ) करता है, चित्त का निग्रह=रोक-थाम करता है। ॰ उत्पन्न पापो ॰ के प्रहाण (= नाश) के लिये ॰। ॰ अनुत्पन्न कुशलों की उत्पत्ति के लिये ॰। ॰ उत्पन्न कुशलों की स्थिति ॰ पूर्ति के लिये ॰। स्थपति! इस प्रकार प्रतिपन्न होने पर ॰

“स्थपति! (1) क्या हैं अकुशल-संकल्प?—काम-संकल्प, व्यापाद-(= द्वेष)-संकल्प, विहिंसा (= हिंसा)-संकल्प। स्थपति! यह अकुशल-संकल्प कहे जाते हैं। (2) स्थपति! यह अकुशल-संकल्प कहाँ से उत्पन्न होते हैं?—…संज्ञा (= ख्याल) से उत्पन्न कहना चाहियें क्या है संज्ञा (= ख्याल)?—संज्ञा भी बहुत अनेकविध=नाना प्रकार की है—(जैसे) काम-संज्ञा, व्यापार संज्ञा, विहिंसा संज्ञा यहाँ से अकुशल-संकल्प उत्पन्न होते हैं। (3) स्थपति! यह सारे अकुशल-संकल्प कहाँ निरूद्ध होते हैं?—यहाँ, स्थपति! भिक्षुकामों से विरहित ॰ प्रथम ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। यहाँ यह सारे अकुशल-संकल्प निरूद्ध होते हैं। (4) स्थपति! कैसा प्रतिपन्न अकुशल संकल्पों के निरोध के लिये प्रतिपन्न होता है?—यहाँ, स्थपति! भिक्षु अनुत्पन्न पाप=अकुशल धर्मों के अनुत्पाद के लिये ॰। ॰ उत्पन्न ॰ अकुशल धर्मो के प्रहाण के लिये ॰। ॰ अनुत्पन्न कुशल-धर्मो (= भलाइयों) की उत्पत्ति के लिये ॰। ॰ उत्पन्न कुशल-धर्मों की स्थित ॰ पूर्ति के लिये ॰। स्थपति! इस प्रकार प्रतिपन्न अकुशल-संकल्पों के निरोध के लिये प्रतिपन्न होता है।

“स्थपति! (5) क्या है कुशल-संकल्प (= अच्छा संकल्प)?—नैष्काम्य (= काम रहित होने का)-संकल्प, अ-व्यापाद-संकल्प, अ-विहिंसा-संकल्प।…(6) स्थपति! यह कुशल संकल्प कहाँ से उत्पन्न होते है?—…संज्ञा से उत्पन्न कहना चाहिये। क्या है, संज्ञा?—संज्ञा भी बहुत अनेकविध=नाना प्रकार की है—(जैसे) नैष्काम्य-संज्ञा, अव्यापाद-संज्ञा, अ-विहिंसा (= अहिंसा)-संज्ञा। यहाँ से कुशल संकल्पों की उत्पत्ति होती है। (7) स्थपति! यह सारे कुशल-संकल्प कहाँ निरूद्ध होते हैं?—…यहाँ स्थपति! भिक्षु वितर्क और विचार के शान्त होने पर ॰ द्वितीय ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। यहाँ यह सारे कुशल संकल्प निरूद्ध होते हैं। (8) स्थपति! कैसा प्रतिपन्न कुशल संकल्पों के निरोध के लिये प्रतिपन्न होता है?—यहाँ स्थपति भिक्षु अनुत्पन्न पाप=अकुशल धर्मो के अनुत्पादक के लिये ॰। ॰ उत्पन्न ॰ अकुशल धर्मो के प्रहाण के लिये ॰। ॰ अनुत्पन्न कुशलधर्मो की उत्पत्ति के लिये ॰। उत्पन्न कुशल धर्मो की स्थिति ॰ पूर्ति के लिये ॰। स्थपति! इस प्रकार प्रतिपन्न कुशल-संकल्पों के निरोध के लिये प्रतिपन्न होता है।

“स्थपति! किन दश धर्मो से युक्त पुरूष=पुद्गल को मैं सम्पन्न कुशल। ॰ अ-योध्य कहता हूँ?—यहाँ स्थपति! भिक्षु (1) अशैक्ष्य (= अर्हत् की) सम्यग्-दृष्टि ॰ से युक्त होता है; (2) अशैक्ष्य सम्यग्-संकल्प ॰; (3) अशैक्ष्य सम्यग्-वचन ॰; (4) अशैक्ष्य सम्यक्-कर्मान्त ॰; (5) अशैक्ष्य सम्यग्-आजीव ॰; (6) अशैक्ष्य सम्यग्-व्यायाम ॰; (7) अशैक्ष्य सम्यक्-स्मृति ॰; (8) अशैक्ष्य सम्यक्-समाधि ॰; (9) अशैक्ष्य सम्यग्-ज्ञान ॰; (10) अशैक्ष्य सम्यग-विमुक्ति से युक्त होता है। स्थपति! इन दश धर्मो से युक्त पुरूष=पुद्गल को मैं सम्पन्न-कुशल ॰ कहता हूँ।”

भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो पंचकांग स्थपति ने भगवान् के भाषण को अभिनंदित किया।