मज्झिम निकाय

8. सल्लेख-सुत्तन्त

ऐसा मैंने सुना—

एक समय भगवान् श्रावस्ती में अनाथपिंडिक के आराम जेतवन मे विहार करते थे।

तब आयुष्मान् महाचुन्द सायंकाल मे प्रतिसल्लयन (= ध्यान) से उठकर, जहाँ भगवान् थे, वहाँ गये। जाकर भगवान् को अभिवादन कर एक ओर बैठ गये। एक ओर बैठकर आयुष्मान् महाचुन्द ने भगवान् को यह कहा—

“भन्ते! जो यह आत्मवाद-संबन्धी था लोकवाद-संबन्धी अनेक प्रकार की दृष्टियाँ (= दर्शन, मत) दुनिया में उत्पन्न होती है; भन्ते! इस प्रकार (इनके) आदि को ही मन मे (विचार) करने से इन दृष्टियो का प्रहाण (= नाश) होता है, इन दृष्टियों का परित्याग होता है?”

“चुन्द! जो यह ॰ दृष्टियाँ दुनिया में उत्पन्न होती है; (उनको) जहाँ यह दृष्टियाँ उत्पन्न होती हैं, जहाँ यह आश्रय ग्रहण करती है, जहाँ पर व्यवहृत होती हैं, (वहाँ)—’यह मेरा नहीं’, ‘न यह मै हूँ’, ‘न मेरा यह आत्मा है’— इसे इस प्रकार यथार्थ तौर पर ठीक से जानकर देखने पर, इन दृष्टियों का प्रहाण होता है, इन दृष्टियों का परित्याग होता है।

“हो सकता है, चुन्द! यहाँ कोई भिक्षु कामों से विरहित॰ प्रथम-ध्यान को प्राप्त हो विहरे। उसके (मन में) ऐसा हो—’मैं सल्लेख (= तप) के साथ विहर रहा हूँ’। लेकिन, चुन्द! आर्य-विनय (= आर्यधर्म) में इन्हें सल्लेख नहीं कहा जाता; आर्यविनय में इन्हें दृष्टधर्म-सुखविहार (= इसी जन्म मे सुखपूर्वक विहार करना) कहते हैं।

“हो सकता है, चुन्द! यहाँ कोई भिक्षु वितर्क और विचार के शान्त होने पर ॰ द्वितीय ध्यान को प्राप्त हो विहरे। उसको ऐसा हो—॰। इन्हें आर्य विनय में दृष्टधर्म-सुखविहार कहते हैं।

“हो सकता है, चुन्द! यहाँ कोई भिक्षु प्रीति से विरक्त हो॰1 तृतीय-ध्यान को प्राप्त हो विहरे। ॰। ॰।

“हो सकता है, चुन्द! ॰ ॰ चतुर्थ-ध्यान को प्राप्त हो विहरे। ॰। इसे आर्य विनय मे दृष्टधर्म-सुखविहार कहते हैं।

“हो सकता है, चुन्द! यहाँ काई भिक्षु रूप-संज्ञा (= रूप के विचार) को सर्वथा छोडने से, प्रतिघ (= प्रतिहिंसा) की संज्ञाओं के सर्वथा अस्त हो जाने से, नानापन की संज्ञाओं को मन में न करने से, ‘आकाश अनन्त है’—इस आकाश-आनन्त्य-आयतन को प्राप्त हो विहरे। उसको ऐसा हो—’मैं सल्लेख के साथ विहर रहा हूँ’। लेकिन, चुन्द! आर्य विनय में इन्हें सल्लेख नहीं काहा जाता; आर्य विनय में इन्हें शान्त विहार कहते हैं।

“हो सकता है, चुन्द! ॰ आकाशानन्त्यायतान को सर्वथा अतिक्रमण कर ‘विज्ञान अनन्त है’—इस विज्ञान-आनन्त्य-आयतन को प्राप्त हो विहरे। ॰ इन्हें शान्त विहार कहते हैं।

“॰ ॰ विज्ञानानन्त्यायतन को सर्वथा अतिक्रमण कर, ‘कुछ नहीं’—इस आकिंचन्य (= न-कुछ-भी-पना) आयतन को प्राप्त हो विहरे। ॰ ॰।

“॰ ॰ अकिंचन्यायतन को सर्वथा अतिक्रमण कर, नैवसंज्ञा-नासंज्ञायतन (= जहाँ न संज्ञा ही हो न असंज्ञा ही) को प्राप्त हो विहरे। ॰ ॰।

“किन्तु, चुन्द! यहाँ सल्लेख (= तप) करना चाहिये—(1) दूसरे हिंसक (= विहिंसक) होंगे, हम यहाँ अहिंसक रहेंगे—यह सल्लेख करना चाहिये। (2) दूसरे प्राण मारने वाले होगे, हम यहाँ प्राण मारने से विरत रहेंगे—यह सल्लेख करना चाहिये। (3) दूसरे बिना दिया लेने वाले ॰। (4) दूसरे अ-ब्रह्मचारी ॰। (5) दूसरे मृषा (= झुठ)-वादी ॰। (6) दूसरे पिशुनभाषी (= चुगुलखोर) ॰। (7) दूसरे परूष (= कठोर)-भाषी ॰। (8) दूसरे संप्रलापी (= बकवादी) ॰। (9) दूसरे अभिध्यालु (= लोभी) ॰ हम यहाँ अनभिध्यालु रहेंगे। (10) दूसरे व्यापन्न (= हिंसक) चित्त ॰ अव्यापन्न चित्त ॰। (11) दूसरे मिथ्या-दृष्टि ॰ सम्यग्दृष्टि ॰। (12) दूसरे मिथ्या-संक्ल्प ॰ सम्यक्-संक्ल्प ॰। (13) दूसरे मिथ्याभापी ॰ सम्यग्-भापी ॰। (14) दूसरे मिथ्या-कर्मान्त (= कायिक कर्म) ॰ सम्यक्-कर्मान्त ॰। (15) ॰ मिथ्या-आजीव (= अनुचित रीति से रोजी कमाने वाले) सम्यग्-आजीव ॰। (16) ॰ मिथ्या-व्यायाम (= प्रयत्न) ॰ सम्यग् ॰ व्यायाम ॰। (17) ॰ मिथ्या (= अयुक्त) स्मृति ॰ सम्यक् स्मृति ॰। (18) ॰ मिथ्या-समाधि ॰ सम्यक्-समाधि ॰। (19) ॰ मिथ्या-ज्ञानी ॰ सम्यक्-ज्ञानी ॰। (20) ॰ मियिा-विमुक्ति ॰ सम्यग्-विमुक्ति (-मुक्ति) (21) ॰ स्त्यान ॰ मृद्ध (= शरीर और मन के आलस्य)-संयुक्त ॰ स्त्यान-मृद्ध-रहित ॰। (22) ॰ उद्धत ॰ अनुद्धत ॰। (23) ॰ विचिकित्सक (= सशयालु) ॰ विचिकित्सा पारंगत ॰। (24) ॰ क्रोधी ॰ अक्रोधी ॰। (25) ॰ उपनाही (= पाखंडी) ॰ अनुपनाही ॰। (26) ॰ भ्रक्षी (= कीनावाले) ॰ अभ्रक्षी ॰। (27) प्रदाशी (= निष्ठुर) ॰ अ-प्रदाशी ॰। (28) ॰ ईष्र्यालु ॰ ईष्र्यारहित ॰। (29) ॰ मत्सरी ॰ अ-मत्सरी ॰। (30) ॰ शठ ॰ अ-शठ ॰। (31) ॰ मायावी (= वंचक) ॰ अ-मायावी ॰। (32) ॰ स्तब्ध (= जड़) ॰ अ-स्तब्ध। (33) ॰ अतिमानी (= अभिमानी) ॰ अनतिमानी ॰। (34) ॰ दुर्वचा ॰ सुवचा ॰। (35) ॰ पाप-मित्र (= बुरों को दोस्त बनाने वाले) ॰ कल्याण-मित्र ॰। (36) ॰ प्रमत्त ॰ अ-प्रमत्त ॰। (37) ॰ अश्रद्धालु ॰ श्रद्धालु ॰। (38) ॰ निर्लज्ज ॰ लज्जावान् ॰। (39) ॰ अनपत्रपी (= उचित भय को भी न मानने वाले) ॰ अपत्रपी ॰। (40) अल्पश्रुत (= अशिक्षित) ॰ बहुश्रुत ॰। (41) ॰ कुसीद (= आलसी) ॰ उद्योगी ॰। (42) ॰ मूढ़-स्मृति ॰ उपस्थित-स्मृति ॰। (43) ॰ दुष्प्रज्ञ ॰ प्रज्ञा-सम्पन्न ॰। (44) दूसरे सान्दृष्टि (= ऐहिकलाभ)-परामर्षी (= सोच करने वाला) आधान-ग्राही (= हठी), दुष्प्रतिनिस्सर्गी (= कठिनाई से त्याग करने वाले) होंगे, हम यहाँ अ-सान्दृष्टि-परामर्षी अनाधान-ग्राही सुप्रतिनिस्सर्गी रहेंगे—यह सल्लेख करना चाहिये।

“चुन्द! अच्छी बातों (= धर्मों) के विषय में विचार के उत्पन्न होने को भी मैं हितकर कहता हूँ, काया और वचन से (उनके) अनुष्ठान के बारे में तो कहना ही क्या है? चुन्द! (1) दूसरे हिंसक हांेगे, और हम अहिंसक रहेंगे—यह विचार उत्पन्न करना चाहिये ॰। (44) दूसरे सान्दृष्टि-परामर्षी॰—यह विचार उत्पन्न करना चाहिये।

“जैसे; चुन्द! कोई! विषम (= कठिन) मार्ग है, और उसके परिक्रमण (= फेर खाने)— के लिये दूसरा सम-मार्ग हो; जैसे चुन्द! विषम तीर्थ (= नाव का घाट) हो, और उसके परिक्रमण के लिये दूसरा सम तीर्थ हो; ऐसे ही चुन्द! (1) हिसक पुरूष पुद्गल (= व्यक्ति) को अहिंसा परिक्रमण के लिये होती है। ॰। (44) सान्दृष्टि-परामर्षी आधान-ग्राही दुष्प्रतिनिस्सर्गी पुरूषपुद्गल को असान्दृष्टिता अ-परामर्षिता अनाधान-ग्राहिता सुप्रतिनिस्सर्गिता परिक्रमण के लिये होती है।

“जैसे चुन्द! जो कोई भी अकुशल धर्म (= बुरे काम) हैं, वह सभी अधोभाव (= अधोगति) को पहुँचाने वाले हैं; जो कोई भी कुशल धर्म (= अच्छे काम) हैं, वह सभी उपरि-भाव को पहुँचाने वाले हैं; वैसे ही चन्द! (1) हिंसक पुरूष = पुद्गल को अहिंसा ऊपर पहुँचाने वाली होती है। ॰। (44) सान्दृष्टिमर्षी आघात-ग्राही दुष्प्रतिनिस्सर्गी पुरूष = पुद्गल को असान्दृष्टिता, अ-परामर्षिता अनाधान-ग्राहिता सुप्रतिनिस्सर्गिता ऊपर पहुँचाने वाली होती है।

“चुन्द! जो स्वयं गिरा हुआ है, वह दूसरे गिरे हुये को उठायेगा, यह सम्भव नहीं है; किन्तु जो चुन्द! अपने गिरा हुआ नहीं है, वह दूसरे गिरे हुये को उठायेगा, यह सम्भव है। चुन्द! जो स्वयं अदान्त (= मन के संयम से रहित), अ-विनीत, अ-परिनिर्वृत (= निर्वाण को न प्राप्त) है, वह दूसरे को दान्त, विनीत, परिनिर्वृत करेगा, यह सम्भव नहीं; किन्तु, जो चुन्द! स्वयं दान्त, विनीत, परिनिर्वृत है, वह दूसरे को दान्त, विनीत, परिनिर्वृत करेगा, यह सम्भव है। ऐसे ही चुन्द! (1) हिंसक पुरूष के लिये अहिंसा पिरिनिर्वाण के लिये होती है। ॰। (44) सान्दृष्टि-परामर्षी आधानग्राही दुष्प्रतिनिस्सर्गी पुरूष-पुद्गल को असान्दृष्टिता-अपरामर्षिता अनाधान-ग्राहिता सुप्रतिनिस्सर्गिता परिनिर्वाण (= दुःख विनाश) के लिये होती है।

“यह मैने चुन्द! सल्लेख-पर्याय (= सल्लेख नाम धर्मोपदेश) उपदेशा, चित्तुप्पाद-पर्याय उपदेशा, परिक्रमण-पर्याय उपदेशा, उपरिभाव-पर्याय उपदेशा, परिनिर्वाण-पर्याय उपदेशा।

“चुन्द! श्रावकों (= शिष्यों) के हितैषीं, अनुकम्पक, शास्ता (= उपदेशक) को अनुकम्पा करके जो करना चाहिये, वह तुम्हारे लिये मैने कर दिया। चुन्द! यह वृक्षमूल हैं, यह सूने घर हैं, ध्यानरत होओ। चुन्द! मत प्रमाद (= गफलत) करो, मत पीछे अफसोस करने वाले बनना—यह तुम्हारे लिये हमारा अनुशासन (= उपदेश) है।”

भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो आयुष्मान् चुन्द ने भगवान् के भाषण का अनुमोदन किया। (चालीस पदों और पाच सधियों में (जो) उपदेशा गया। सागरसमान-गभीर (यह) सल्लेख नामक सूत्रान्त है।)